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Tuesday, June 9, 2020

Linguistic Society of India 2018-20

The office bearers of the Linguistic Society of India for the period 2018-2020 are as follows:
I. President (One post) Panchanan Mohanty, University of Hyderabad, Hyderabad
II. Vice- President (One post) A.R. Fatihi, Aligarh Muslim University, Aligarh
III. Treasurer (One post from Pune) Rahul Mhaiskar, Deccan College, Pune
IV. Secretary (One post from Pune) Shailendra Mohan, Deccan College, Pune
V. Joint Secretary (One post from Pune) Pradnya Kulkarni, Deccan College, Pune
VI. Joint Secretary (One post from Kolkata) Mina Dan, University of Calcutta, Kolkata
VII. Trustee (One post from Pune) Prasad Joshi, Deccan College, Pune
VIII. Trustee (One post from outside Pune) Vijay Kumar Kaul, MGAHV, Wardha
IX. Executive Committee Members: (Nine posts from outside Pune)
(Elected unopposed)
i) Aadil A. Kak, University of Kashmir, Srinagar
ii) Abhinav Kumar Mishra, BHU, Varanasi
iii) Veerendra Mishra, Banasthali University,Banasthali
iv) Mona Parakh, MSU Baroda, Vadodara
v) Haokip Pauthang, JNU, New Delhi
vi) Suhnu Ram Sharma, Hamirpur, Himachal Pradesh
vii) K. Srikumar, University of Lucknow,Lucknow
viii) Bablu Ray, HGCU, Sagar
ix) K.L. Verma,Pt. Ravishankar Shukla University, Raipur
X. EXECUTIVE COMMITTEE MEMBERS (Two posts from Pune)
1. Thite , Ganesh , Pune
2. Khare, Ambarish, Pune
XI.
1. EDITOR OF PUBLICATIONS: (One Post): Umarani Pappuswamy, CIIL, Mysore
2. MEMBERS OF PUBLICATION COMMITTEE (One post from Pune): Rita Mathur, Pune
3. MEMBERS OF PUBLICATION COMMITTEE :
1. Prasannanshu, NLW, New Delhi
2. A.M Raina, IIT, Kanpur

Source:  http://www.lsi.org.in/bearers.php 

Out of these the following are the members of this group (Please correct me if I have missed someone) 

1. VIII. Trustee (One post from outside Pune)
1. Aadil A. Kak, University of Kashmir, Srinagar
2. viii) Bablu Ray, HGCU, Sagar
3. A.R. Fatihi, Aligarh Muslim University, Aligarh
4. Vijay Kumar Kaul, MGAHV, Wardha
5. ii) Abhinav Kumar Mishra, BHU, Varanasi
6. Prasannanshu, NLU, Delhi

Sunday, June 7, 2020

मूडल (Moodle) साइट का निर्माण और शिक्षण में प्रयोग


मूडल (Moodle) साइट का निर्माण और शिक्षण में प्रयोग
(1) मूडल : एक परिचय
मूडल एक विश्वप्रसिद्ध learning management system है। इसके द्वारा हम online learning site का निर्माण करते हैं, जिसके माध्यम से विभिन्न प्रकार की शैक्षिक सामग्री ऑनलाइन बिना किसी बाधा के अध्येताओं को उपलब्ध कराई जा सकती है। यह एक तरह से ऑनलाइन क्लासरूम बनाने की सुविधा प्रदान करता है। इसकी प्रमुख बातों को वेबसाइट पर इस प्रकार से रेखांकित किया गया है-
·       Build your site easily
·       Choose from a range of activities and educational tools
·       Add assessments and custom certificates
·       Communicate with your students in real-time with a powerful video conference tool
·       Mobile-ready, so your students can learn from their mobile devices
यह एक paid प्लेटफॉर्म है, जहाँ प्रतिवर्ष के हिसाब से निर्धारित शुल्क चुकाकर आप अपना क्लासरूम बना सकते हैं। मूडल का प्रयोग समझने के लिए अथवा इस पर अपना क्लासरूम बनाने के लिए एक महीने की निःशुल्क सुविधा मिलती है। अतः आप पहले उसके माध्यम से सीख सकते हैं।
(2) मूडल में लर्निंग साइट का निर्माण-
इस पर अपनी लर्निंग साइट के निर्माण के लिए सबसे पहले इस लिंक पर जाएँ-
(या गूगल सर्च इंजन में moodle सर्च भी कर सकते हैं)
इस पर जाने के बाद होम विंडो इस प्रकार खुलती है-

इसमें GET STARTED TODAY पर क्लिक करें। क्लिक करने के बाद अगली विंडो खुलती है, जिसमें Start building your online learning site in minutes नाम से खुलता है। इसमें भी GET STARTED को क्लिक करें। चूँकि मूडल का प्रयोग करने के लिए पैसे चुकाने पड़ते हैं। इसलिए GET STARTED पर क्लिक करने पर वह यहाँ ले जाएगा, जहाँ चार अलग-अलग प्लॉन हैं-
Choose the plan that's right for you
Starter
$80 AUD /Year
50 users
200MB storage
Mini
$250 AUD /Year
100 users
200MB storage
Small
$500 AUD /Year
200 users
400MB storage
Medium
$1000 AUD /Year
500 users
1GB storage
एक महीने के निःशुल्क ट्रायल का प्रयोग करने के लिए यहाँ क्लिक करें-
इसे क्लिक करने के बाद खुलने वाली विंडो में तीन विकल्प इस प्रकार मिलते हैं-

इसमें Create a new account पर क्लिक करें। इसके बाद आवश्यक चरणों का पालन करते हुए अपना एकाउंट बनाएँ। इसके पाँच चरण होते हैं-
  • पहले चरण में अपना व्यक्तिगत विवरण भरें।
  • दूसरे चरण में अपनी MoodleCloud site का नाम और अन्य विवरण भरें। जब आप साइट का नाम लिखते हैं तो यह बताता है कि वह नाम उपलब्ध है या नहीं। यह वैसे ही है जैसे हम कोई ईमेल एकाउंट या फेसबुक आदि का एकाउंट बनाते हैं।
  • तीसरे चरण में Verification code डालकर वेरिफाई करते हैं।
  • चौथे चरण में अपने एकाउंट का पासवर्ड डालते हैं।
  • पाँचवे चरण में आपकी साइट बन जाने की सूचना प्राप्त होती है।

मैंने उपर्युक्त चरणों का प्रयोग करते हुए जो साइट बनाई है, उसका एड्रेस इस प्रकार है-
इसके बाद Thanks Take me to my moodle site को क्लिक करके अपनी मूडल साइट पर जाएँ।
इसके बाद आपकी साइट का एडिटर इस प्रकार खुलता है-

अब आप इसमें अपनी इच्छानुसार नए-नए कोर्स और स्टडी मैटिरियल जोड़ सकते हैं। इसमें Add a new course को क्लिक करने पर उससे संबंधित अनेक सूचनाएँ जोड़नी पड़ती हैं, जैसे-


कोर्स संबंधी सभी सूचनाएँ भरने और आवश्यका सामग्री अपलोड करने के पश्चात आपकी साइट पर आपका कोर्स पाठकों के लिए उपलब्ध हो जाएगा।

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान


भाषा और भाषाविज्ञान (Language and Linguistics)
भाषा की सर्वसामान्य परिभाषा इस प्रकार दी गई है-
भाषा यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसके माध्यम से मनुष्य विचार करता है तथा अपने भाषायी समाज में विचारों का आदान-प्रदान करता है।
इस परिभाषा में कुछ शब्दों को बोल्ड किया गया है। जिन्हें समझने के बाद इस परिभाषा को सरलता से समझा जा सकता है। बोल्ड किए गए पारिभाषिक शब्द इस प्रकार है-
·       यादृच्छिक
·       ध्वनि-प्रतीक
·       व्यवस्था
·       मनुष्य
·       विचार करना
·       अपना भाषायी समाज
·       विचारों का आदान-प्रदान
भाषा की परिभाषा और इनकी व्याख्या को इस लिंक पर जाकर देखा जा सकता है-
हम विचारों की अभिव्यक्ति के लिए ध्वनि-प्रतीकों का प्रयोग करते हैं, जि निरर्थक होते हैं। भाषा उन्हें वाक्य या पाठ (प्रोक्ति) के रूप में गठित कर देती है। इस कारण वे अर्थ को धारण करने में सक्षम हो जाते हैं। किंतु ऐसा नहीं होता है कि भाषा ध्वनियों से सीधे-सीधे वाक्य (या प्रोक्ति) बना दे, बल्कि इसके नियम कई स्तरों पर कार्य करते हैं। इन सभी स्तरों पर भाषाविज्ञान भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। बढ़ते हुए क्रम में भाषिक स्तर इस प्रकार हैं:
     स्वनिम       रूपिम         शब्द       पदबंध      उपवाक्य        वाक्य       प्रोक्ति
उपर्युक्त इकाइयों में प्रत्येक बड़ी इकाई एक से अधिक छोटी इकाइयों (या कम से कम एक) के परस्पर मिलने से बनी होती है। भाषावैज्ञानिक उन नियमों और स्थितियों को खोजने का प्रयास करते हैं जिनमें छोटी इकाइयों को मिलाकर बड़ी इकाई का निर्माण किया जाता है और व्यवहार में लाया जाता है। सामान्य भाषिक व्यवहार में ‘स्वन’ भाषा की सबसे छोटी इकाई है। जब स्वनों का प्रयोग वाक्यात्मक और अर्थपूर्ण ढंग से किया जाता है तब ये संप्रेषणात्मक हो जाते हैं और इनका प्रयोग ‘अर्थ’ (अर्थपूर्ण विचारों) के प्रेषण और ग्रहण हेतु किया जाता है। यहाँ पर एक बात महत्वपूर्ण है कि न तो ‘स्वन’ भाषा हैं और न ही ‘अर्थ। भाषा एक व्यवस्था है जो स्वनों को अर्थ से जोड़ती है। यह अमूर्त होती है और मानव मस्तिष्क में पाई जाती है। भाषाविज्ञान में इसी व्यवस्था का अध्ययन विभिन्न शाखाओं के माध्यम से किया जाता है, जिन्हें इस प्रकार से देख सकते हैं-
भाषाविज्ञान की उक्त शाखाओं का विवेच्य विषय सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। यहाँ हम अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की चर्चा करने जा रहे हैं।
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान (Applied Linguistics)
भाषाविज्ञान मानव भाषाओं का वैज्ञानिक दृष्टि से सैद्धांतिक अध्ययन करता है। किंतु आप एक प्रश्न कर सकते हैं कि उस अध्ययन का हम करेंगे क्या? इस प्रश्न के उत्तरस्वरूप उन क्षेत्रों की चर्चा की जाती है, जिनमें भाषा के सैद्धांतिक ज्ञान का उपयोग किया जाता है। उन सभी क्षेत्रों को अनुप्रयोग क्षेत्र कहते हैं और उन्हें सामूहिक रूप से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत रखा जाता है। इन क्षेत्रों के प्रयोग, रूप और प्रकृति के अनुसार निम्नलिखित तीन वर्गों में रखा जा सकता है :
1.   व्यावहारिक अनुप्रयोग
2.   अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग
3.   तकनीकी अनुप्रयोग
(1) व्यावहारिक अनुप्रयोग (Practical Application)
यहाँ पर व्यावहारिक शब्द का तात्पर्य वास्तविक जीवन में सीधे-सीधे अनुप्रयोग से है। मानव जीवन के अनेक कार्य ऐसे हैं जिनमें भाषावैज्ञानिक ज्ञान की आवश्यकता होती है। ये कार्य मुख्यत: भाषा और अध्ययन-अध्यापन से जुड़े हैं; जैसे : अनुवाद का कार्य, कोश निर्माण का कार्य आदि। इन सभी क्षेत्रों में भाषावैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग करते हुए ऐसी वस्तुओं का निर्माण या विकास किया जाता है जिन्हें वास्तविक जीवन में देखा जाता है और प्रयोग में लाया जाता है। जैसे : अनुवाद में दो भाषाओं के भाषावैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग किया जाता है और इसके माध्यम से लक्ष्यभाषा में एक अनूदित पाठ प्राप्त होता है। कोशविज्ञान में विभिन्न भाषाओं के कोशों का निर्माण किया जाता है।

(2) अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग
इस प्रकार के अनुप्रयोगों को ज्ञानार्जन आधारित अनुप्रयोग भी कहा जा सकता है। भाषाविज्ञान के अंतरानुशासनिक या ज्ञानार्जन आधारित अनुप्रयोग का तात्पर्य भाषावैज्ञानिक ज्ञान का प्रयोग अन्य शास्त्रों के साथ मिलकर करते हुए भाषा के सभी पक्षों के बारे में अधिक से अधिक ज्ञान अर्जित करने से है।

इस आधार पर बनने वाले अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग के क्षेत्र इस प्रकार हैं-

तकनीकी अनुप्रयोग (Technological Application
भाषावैज्ञानिक ज्ञान का तकनीकी क्षेत्र में अनुप्रयोगात्मक पक्ष मुख्यतः तकनीकी क्षेत्र के आधुनिक अविष्कारों संगणक, मोबाइल और अन्य स्वचलित मशीनों के विकास से संबंधित है। दूसरे शब्दों में भाषाविज्ञान का तकनीकी अनुप्रयोग डिजिटल मशीनों मुख्यतः संगणक से जुड़ा हुआ है। आज अनेक सॉफ्टवेयरों और अनुप्रयोग प्रणालियों (Softwares and Application systems) का विकास संगणक द्वारा किया जा रहा है। ये हमारे जीवन के सभी क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। इनका प्रयोग करते हुए आज हम पहले की अपेक्षा अधिक सरलता से और तेजी से अपने दैनिक, कार्यालयी एवं व्यवसायिक कार्यों को कर लेते हैं। किंतु यह सत्य है कि हमारे सभी कार्य किसी न किसी रूप में भाषा से जुड़े हुए हैं। इसीलिए संगणक को और अधिक उपयोगी बनाने के लिए इसमें भाषिक ज्ञान को स्थापित करना आवश्यक हो जाता है।






Thursday, June 4, 2020

internet of things (IoT)

 ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो इंटरनेट के माध्यम से संचालित होती हैं किंतु हमारे दैनिक जीवन में प्रयोग में आ रही हैं और उनका उपयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। इस प्रकार की सभी चीजों को सामूहिक रूप से इंटरनेट आफ थिंग्स कहते हैं। इसके उदाहरण के रूप में हम गूगल, एलेक्सा और श्री जैसे स्मार्ट डिवाइसों के साथ-साथ सामान्य डिवाइस से जैसे सीसीटीवी कैमरे और घर में लगाए जाने वाले इस प्रकार के उपकरण आदि आते हैं।
इसके अंदर आप एटीएम मशीनों जैसी चीजों को भी रख सकते हैं जो इंटरनेट के माध्यम से संचालित होती हैं और हमारे लिए काम करती हैं।