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Tuesday, June 16, 2026

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics)

 


ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में भाषा में होने वाले परिवर्तनों अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है। भाषाविज्ञान के इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो 18वीं शताब्दी के अंत में सर विलियम जोंस के  विचारों के प्रभाव से ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का ही सर्वप्रथम विकास हुआजिसे अंग्रेजी में ‘फिलोलॉजी’ (Philology) कहते हैं। इसका उद्देश्य विश्व की भाषाओं में हुए परिवर्तनों की खोज करना तथा भाषा-परिवारों के स्थापना करना रहा है।

 किसी  एक भाषा या एक से अधिक भाषाओं में हुए भाषा परिवर्तनों की खोज उसके विभिन्न स्तरों पर की जा सकती है,  जिन्हें इस प्रकार से नाम दिया जाता है-

§  ध्वनि परिवर्तन

§  रूप परिवर्तन

§  वाक्य परिवर्तन

§  अर्थ परिवर्तन

इनमें होने वाले परिवर्तनों की खोज भिन्न-भिन्न प्रकार से की जाती है तथा नियम दिए जाते हैं। इसके अलावा एक से अधिक भाषाओं की तुलना करते हुए उनके पुराने रूपों की खोज करना तथा भाषा परिवारों का निर्माण करना भी ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का एक महत्वपूर्ण कार्य रहा है। इस दृष्टि से देखा जाए तो दुनिया की भाषाओं का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है-

§  आकृति मूलक वर्गीकरण

 इसमें वर्गीकरण का आधार भाषाओं के रूपरचना को बनाया जाता है।

§  पारिवारिक वर्गीकरण

इसमें भाषाओं की उत्पत्ति और समानताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न भाषा-परिवारों का निर्माण किया जाता हैजैसे- भारोपीय भाषा परिवारआर्य भाषा परिवारचीनी तिब्बती भाषा परिवार आदि ।

भाषा परिवारों की स्थापना में ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के साथ-साथ तुलनात्मक भाषाविज्ञान भी काम करता है ।

तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Linguistics)

 


तुलनात्मक भाषाविज्ञान में एक से अधिक भाषाओं की तुलना की जाती है तथा उनमें मिलने वाली समानताओं और असमानताओं की खोज की जाती है। प्रारंभ से ही इसे ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के साथ एक घटक के रूप में देखा गया हैजिसका उद्देश्य भाषाओं की तुलना के माध्यम से उनमें पाई जाने वाली समानताओं के आधार पर भाषाओं का वर्गीकरण किया जा सके तथा भाषा परिवारों के स्थापना की जा सके।

 वर्तमान में तुलनात्मक भाषाविज्ञान अपने उस सीमित अर्थ से ऊपर उठकर एक से अधिक भाषाओं  की तुलना तथा उनमें पाई जाने वाली समानताओं और असमानताओं की खोज से संबंधित हो गया है। इस क्रम में एक नया नाम व्यतिरेकी भाषाविज्ञान (Contrastive Linguistics) भी जुड़ गया हैजिसका उद्देश्य भाषा-शिक्षण और अनुवाद की दृष्टि से दो भिन्न-भिन्न भाषाओं में पाई जाने वाली समानताओं और समानता ओं की खोज करना है। यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि भले ही इन दोनों में भाषाओं के बीच तुलना ही की जाती है, किंतु उद्देश्य और कार्यपद्धति की दृष्टि से दोनों अलग-अलग विषय हैं। 

भाषाविज्ञान में समकालिक (synchronic) और कालक्रमिक (diachronic) अध्ययन

भाषाविज्ञान के उपर्युक्त प्रकारों को ‘समकालिक और कालक्रमिक अध्ययन’ के रूप में भी जाना जाता है। इस दृष्टि से हम कहते हैं कि भाषा का भाषवैज्ञानिक अध्ययन मुख्यत: तीन विधियों से किया जाता है – समकालिककालक्रमिक और तुलनात्मक (synchronic, diachronic and comparative)। भाषा अध्ययन के इतिहास को देखें तो मुख्यत: कालक्रमिक पद्धति आरंभ से चली आ रही थी। इसे ही मूल भाषाविज्ञान के रूप में देखा जाता था। कालक्रमिक और समकालिक अध्ययन में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं था। बीसवीं सदी के आरंभ में सस्यूर द्वारा किए गए चिंतन में इनका स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। कालक्रमिक भाषा अध्ययन में विभिन्न काल बिंदुओं पर किसी भाषा के विकास को देखा जाता है। समकालिक भाषा अध्ययन में एक ही काल बिंदु पर किसी भाषा की स्थिति की विवेचना की जाती है।

वैसे देखा जाए तो ‘समकालिक अध्ययन’ (वर्णनात्मक भाषाविज्ञान) कालक्रमिक और तुलनात्मक दोनों ही अध्ययन प्रणालियों का मूल है। इसका प्रयोग करते हुए ये दोनों प्रकार के अध्ययन अत्यंत सरलतापूर्वक किए जा सकते हैं। इस कारण सस्यूर द्वारा समकालिक अध्ययन पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने कहा है –

"Synchronic linguistics will concern the logical and psychological relations that bind together co-existing terms and from a system in the collective mind of speakers. Diachronic linguistics, on the contrary, will study relations that bind together successive terms, not perceived by the collective mind but substituted for each other without forming a system."

इस प्रकार देख सकते हैं कि सस्यूर द्वारा समकालिक अध्ययन को भाषाभाषी के मन:मस्तिष्क के अधिक समीप माना गया है।

 

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान और तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics and Comparative Linguistics)

 


ऐतिहासिक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics) और तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Linguistics) भाषाविज्ञान की ऐसी परस्पर संबद्ध शाखाएँ हैं, जिनका उद्देश्य एक है। दोनों का संबंध भाषा के विकास, परिवर्तन तथा भाषाओं के पारस्परिक संबंधों के अध्ययन से है, किंतु इनकी प्रकृति और कार्यक्षेत्र में अंतर है। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषा में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करता है, तो तुलनात्मक भाषाविज्ञान इस कार्य हेतु दो या अधिक भाषाओं की तुलना करने के उपकरण और प्रविधियाँ प्रदान करता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि दोनों विषय एक ही व्यापक विषय के अंग हैं, जिसे हम ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञानकह सकते हैं।

फिर भी यदि हम दोनों को अलग-अलग ही देखना चाहें तो इन्हें निम्नलिखित प्रकार से समझ सकते हैं-

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics)

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषा के विकास और परिवर्तन का अध्ययन करता है। इसमें ध्वनि, रूप, शब्दार्थ और वाक्य-संरचना में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण किया जाता है। इसका उद्देश्य यह जानना है कि कोई भाषा अपने प्राचीन रूप से आधुनिक रूप तक कैसे विकसित हुई।

उदाहरण के लिए, संस्कृत के शब्द "सप्त" का हिंदी में "सात" और अंग्रेज़ी में "seven" रूप में विकसित होना ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अध्ययन का विषय है।

अध्ययन के प्रमुख क्षेत्र

·       ध्वनि-परिवर्तन (Sound Change)

·       शब्दार्थ-परिवर्तन (Semantic Change)

·       व्याकरणिक परिवर्तन (Grammatical Change)

·       भाषा-विकास और भाषा-विभाजन

·       भाषा-संपर्क (Language Contact)

तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Linguistics)

तुलनात्मक भाषाविज्ञान ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की एक विशिष्ट शाखा है। इसमें दो या अधिक भाषाओं की तुलना करके उनके पारिवारिक संबंधों तथा आदिभाषा (Proto-language) का पुनर्निर्माण किया जाता है।

उदाहरण:

संस्कृत

लैटिन

अंग्रेज़ी

पितृ (pitṛ)

pater

father

मातृ (mātṛ)

mater

mother

त्रि (tri)

tres

three

इन शब्दों की समानता से विद्वानों ने निष्कर्ष निकाला कि ये भाषाएँ एक ही भाषा-परिवार, अर्थात् Indo-European Language Family, से संबंधित हैं।

अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य

·       भाषाओं के पारिवारिक संबंधों का निर्धारण

·       आदिभाषा (Proto-language) का पुनर्निर्माण

·       नियमित ध्वनि-समानताओं की खोज

·       भाषा-परिवारों का वर्गीकरण

इनमें हम देख सकते हैं कि दोनों शाखाओं का उद्देश्य एक ही है। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics) भाषा के पुराने रूपों की खोज करता है तो तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Linguistics) उसे सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है।

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान और व्यतिरेकी भाषाविज्ञान (Historical Linguistics and Contrastive Linguistics)

 


पिछले आलेख में बताया गया है कि ऐतिहासिक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics) और तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Linguistics) भाषाविज्ञान की ऐसी परस्पर संबद्ध शाखाएँ हैं, जिनका उद्देश्य एक है। दोनों का संबंध भाषा के विकास, परिवर्तन तथा भाषाओं के पारस्परिक संबंधों के अध्ययन से है, किंतु इनकी प्रकृति और कार्यक्षेत्र में अंतर है। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषा में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करता है, तो तुलनात्मक भाषाविज्ञान इस कार्य हेतु दो या अधिक भाषाओं की तुलना करने के उपकरण और प्रविधियाँ प्रदान करता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि दोनों विषय एक ही व्यापक विषय के अंग हैं, जिसे हम ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञानकह सकते हैं।

अब ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञान को एक इकाई मानते हुए इसमें और व्यतिरेकी भाषाविज्ञान में संबंध और अंतर निम्नलिखित लिंक पर देख सकते हैं-

 https://lgandlt.blogspot.com/2024/07/comparative-linguistics-contrastive.html

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का क्षेत्र-विस्तार (Scope of Historical Linguistics)

 


ऊपर किए गए वर्णन से स्पष्ट हो चुका है कि ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाविज्ञान की वह शाखा है जो भाषाओं की उत्पत्ति, विकास, परिवर्तन तथा उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि समय के साथ भाषाओं में ध्वनि, शब्द, अर्थ और व्याकरण के स्तर पर किस प्रकार परिवर्तन होते हैं। इस कार्य के लिए यह तुलनात्मक भाषाविज्ञान को भी अपने साथ लेकर चलती है। इन दोनों के योग से किए जाने वाले कार्य ही ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के क्षेत्र-विस्तार (Scope) के अंतर्गत आते हैं, जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं-

1. भाषा-परिवर्तन का अध्ययन

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का मूलभूत कार्य भाषा में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करना है। यह अध्ययन भाषा के सभी स्तरों पर देखा जाता है, जिन्हें पर निम्नलिखित प्रकार से विभाजित करते हैं-

§  ध्वन्यात्मक परिवर्तन (Sound Change)

§  रूपात्मक परिवर्तन (Morphological Change)

§  वाक्यात्मक परिवर्तन (Syntactic Change)

§  अर्थगत परिवर्तन (Semantic Change)

2. आदिभाषाओं (Proto-Languages) का पुनर्निर्माण

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान विश्व की भाषाओं में हुए परिवर्तनों के आधार पर यह जानने का प्रयास करता है कि भाषाओं का प्राचीन रूप क्या था तथा उनसे क्रमशः आधुनिक रूप कैसे विकसित हुए हैं? इस क्रम में यह शाखा उन भाषाओं के पूर्वरूपों का पुनर्निर्माण करने का प्रयास करती है जिनके प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान द्वारा तुलनात्मक पद्धति के माध्यम से प्रोटो-इंडो-यूरोपीय भाषा जैसी आदिभाषाओं के पुनर्निर्माण का प्रयास किया गया है।

3. भाषा-परिवारों का निर्धारण

मानव विकास की अवधारणा के अनुसार जिस प्रकार एक विशेष भूखंड से समस्त विश्व में मनुष्य का प्रसार हुआ है, उसी प्रकार मानव भाषाओं का भी एक स्थान से ही समस्त विश्व में प्रसार हुआ है। ऐसी स्थिति में बहुत-सी भाषाओं के बीच समानता पाई जाती है। उन समानताओं को आधार बनाकर भाषा परिवारों की बात की जाती है। भाषा परिवारों के निर्धारण का यह कार्य ऐतिहासिक भाषाविज्ञान द्वारा किया जाता है। इसके अंतर्गत ऐतिहासिक भाषाविज्ञान यह बताने का प्रयास करता है कि कौन-सी भाषाएँ एक ही पूर्वज भाषा से विकसित हुई हैं। उदाहरण के लिए-

§  हिंदी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, ग्रीक और लैटिन इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार से संबंधित हैं।

§  तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम द्रविड़ भाषा परिवार की भाषाएँ हैं।

4. तुलनात्मक अध्ययन

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics) भाषा के पुराने रूपों की खोज करता है, और तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Linguistics) उसे सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है। इन दोनों के योग से विभिन्न सह-संबंधित भाषाओं की तुलना करके उनकी समानताओं और भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। इससे भाषाओं के ऐतिहासिक विकास का पता चलता है। अतः तुलनात्मक अध्ययन ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अंतर्गत किया जाने वाला आधारभूत कार्य है।

5. आंतरिक पुनर्निर्माण (Internal Reconstruction)

आंतरिक पुनर्निर्माण ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की एक महत्वपूर्ण पद्धति है, जिसके द्वारा किसी एक भाषा के वर्तमान या उपलब्ध रूप में पाए जाने वाले अनियमितताओं, वैकल्पिक रूपों तथा संरचनात्मक भिन्नताओं के आधार पर उसके पूर्ववर्ती स्वरूप (earlier stage) का पुनर्निर्माण किया जाता है। इस पद्धति में अन्य संबंधित भाषाओं की सहायता नहीं ली जाती; बल्कि केवल एक ही भाषा के आंतरिक साक्ष्यों का विश्लेषण किया जाता है।

Lyle Campbell के अनुसार, "Internal reconstruction is a method for recovering information about a language's earlier stage from evidence found within the language itself."

6. व्युत्पत्ति-विज्ञान (Etymology)

शब्दों की उत्पत्ति, विकास और अर्थ-परिवर्तन का अध्ययन ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। इससे यह ज्ञात होता है कि किसी शब्द का मूल स्रोत क्या है और वह समय के साथ कैसे परिवर्तित हुआ।

7. अर्थ-परिवर्तन का अध्ययन

शब्दों के अर्थ समय के साथ बदलते रहते हैं। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषा के अन्य स्तरों के साथ-साथ अर्थ-परिवर्तन के विविध रूपों का भी अध्ययन करता है, जो इस प्रकार हैं-

§  अर्थ-विस्तार (Broadening)

§  अर्थ-संकोच (Narrowing)

§  अर्थोत्कर्ष (Amelioration)

§  अर्थापकर्ष (Pejoration)

§  रूपकात्मक परिवर्तन (Metaphorical Change)

8. भाषा-संपर्क और आदान (Language Contact and Borrowing‌)

जब दो भाषाएँ संपर्क में आती हैं, तो वे एक-दूसरे से शब्द और संरचनाएँ ग्रहण करती हैं। उदाहरणतः हिंदी में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी से अनेक शब्द आए हैं। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान ऐसे प्रभावों का अध्ययन करता है। इस अध्ययन के माध्यम से यह आदान (Borrowing) के कारण मिलने वाली समानता को भाषा परिवार के निर्माण से दूर रखता है।

9. प्राचीन अभिलेखों और ग्रंथों का अध्ययन

शिलालेखों, पांडुलिपियों तथा प्राचीन साहित्यिक ग्रंथों का अध्ययन करके भाषाओं के पुराने रूपों का पता लगाया जाता है।

 

संदर्भ ग्रंथ :

§  Lyle Campbell (2013). Historical Linguistics: An Introduction (3rd ed.). Edinburgh University Press.

§  Hans Henrich Hock & Brian D. Joseph (2009). Language History, Language Change, and Language Relationship: An Introduction to Historical and Comparative Linguistics (2nd ed.). Mouton de Gruyter.

§  R. H. Robins (1997). A Short History of Linguistics (4th ed.). Longman.

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का इतिहास और विकास (History and Development of Historical Linguistics)

 


ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाओं के इतिहास, उनके विकास और परिवर्तन का अध्ययन करने वाली भाषाविज्ञान की शाखा है। इसका विकास अनेक शताब्दियों में हुआ और इसमें भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों परंपराओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में ऐतिहासिक भाषाविज्ञान ही मूल भाषाविज्ञान के रूप में विकसित हुआ था। इसका मूल कारण सर विलियम जोंस (1786) के विचार थे, जिसमें उन्होंने संस्कृत, ग्रीक और लैटिन में समानताओं की बात की थी। सस्यूर (1916) के विचारों के प्रभाव से आधुनिक संरचनात्मक या वर्णनात्मक भाषाविज्ञान के विकास के बाद यह शाखा गौण हो गई।

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के विकासक्रम की प्रमुख बातों निम्नलिखित प्रकार से देख सकते हैं-

1. प्राचीन काल

भाषा के ऐतिहासिक अध्ययन की शुरुआत प्राचीन भारत में मानी जाती है। इस काल में वैदिक संस्कृत के मूलरूपों तथा उसमें हुए क्रमशः विकास का परिचय व्याकरणाचार्यों द्वारा दिया जाता था। स्वयं आचार्य पाणिनि (लगभग 5वीं–4थी शताब्दी ईसा पूर्व) ने अष्टाध्यायी में भाषा की संरचना और परिवर्तन का कई स्थानों पर उल्लेख किया है। बाद में कात्यायन और पतञ्जलि ने भी कुछ स्थानों पर भाषा के ऐतिहासिक स्वरूप और प्रयोगगत परिवर्तनों पर विचार किया है। यद्यपि उनका मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक भाषाविज्ञान नहीं था, फिर भी उनके कार्यों ने इसके विकास की आधारभूमि तैयार की।

प्राचीन यूनान में प्लेटो और अरस्तू ने भाषा की प्रकृति पर विचार किया, किंतु भाषाओं के ऐतिहासिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया गया। ग्रीक और लैटिन परंपरा में इस क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं प्राप्त होता है।

2. पुनर्जागरण और प्रारंभिक तुलनात्मक अध्ययन

15वीं और 16वीं शताब्दी में यूरोप में पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप विभिन्न भाषाओं के अध्ययन में रुचि बढ़ी। यूरोपीय विद्वानों ने संस्कृत, ग्रीक, लैटिन तथा अन्य भाषाओं के बीच समानताओं को पहचानना प्रारंभ किया। इससे भाषाओं के ऐतिहासिक संबंधों के अध्ययन की नींव पड़ी।

3. तुलनात्मक भाषाविज्ञान का उदय (18वीं शताब्दी)

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के विकास में सबसे महत्वपूर्ण घटना 1786 में Sir William Jones का प्रसिद्ध व्याख्यान था। उन्होंने संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, गोथिक और सेल्टिक भाषाओं के बीच गहरी समानताओं की ओर संकेत करते हुए कहा कि ये सभी किसी एक सामान्य स्रोत से विकसित हुई हैं। इस विचार ने तुलनात्मक भाषाविज्ञान और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की नींव रखी।

4. उन्नीसवीं शताब्दी : ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का स्वर्णकाल

उन्नीसवीं शताब्दी में ऐतिहासिक भाषाविज्ञान एक स्वतंत्र वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में स्थापित हुआ। इस काल के प्रमुख विद्वानों में निम्नलिखित विद्वान उल्लेख्य हैं-

·       Franz Bopp

·       Rasmus Rask

·       Jacob Grimm

·       August Schleicher

इन विद्वानों ने तुलनात्मक पद्धति (Comparative Method) का विकास किया तथा भाषाओं के बीच नियमित ध्वनि-संबंधों की खोज की। Jacob Grimm द्वारा प्रतिपादित Grimm's Law ऐतिहासिक ध्वनि-परिवर्तन के अध्ययन में मील का पत्थर माना जाता है।

5. नवव्याकरणवादी (Neogrammarian) आंदोलन

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जर्मनी के नवव्याकरणवादियों ने यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि ध्वनि-परिवर्तन नियमित और नियमबद्ध होते हैं। इस आंदोलन ने ऐतिहासिक भाषाविज्ञान को अधिक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।

6. बीसवीं शताब्दी : संरचनावाद का उदय

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में Ferdinand de Saussure ने भाषा के समकालिक (Synchronic) अध्ययन पर बल दिया। इसके परिणामस्वरूप कुछ समय के लिए ऐतिहासिक अध्ययन का महत्व कम हुआ, किंतु ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का विकास जारी रहा। बाद में संरचनात्मक और ऐतिहासिक दृष्टिकोणों के समन्वय से नए विकास भी देखे जा सकते हैं।

संदर्भ ग्रंथ :

§  Lyle Campbell (2013). Historical Linguistics: An Introduction (3rd ed.). Edinburgh University Press.

§  Hans Henrich Hock & Brian D. Joseph (2009). Language History, Language Change, and Language Relationship: An Introduction to Historical and Comparative Linguistics (2nd ed.). Mouton de Gruyter.

§  R. H. Robins (1997). A Short History of Linguistics (4th ed.). Longman.