तुलनात्मक भाषाविज्ञान में एक से अधिक भाषाओं की तुलना की जाती है तथा उनमें
मिलने वाली समानताओं और असमानताओं की खोज की जाती है। प्रारंभ से ही इसे ऐतिहासिक
भाषाविज्ञान के साथ एक घटक के रूप में देखा गया है, जिसका उद्देश्य भाषाओं की तुलना के माध्यम से उनमें पाई जाने वाली समानताओं के
आधार पर भाषाओं का वर्गीकरण किया जा सके तथा भाषा परिवारों के स्थापना की जा सके।
वर्तमान में तुलनात्मक भाषाविज्ञान अपने उस सीमित अर्थ से ऊपर उठकर एक से अधिक भाषाओं की तुलना तथा उनमें पाई जाने वाली समानताओं और असमानताओं की खोज से संबंधित हो गया है। इस क्रम में एक नया नाम व्यतिरेकी भाषाविज्ञान (Contrastive Linguistics) भी जुड़ गया है, जिसका उद्देश्य भाषा-शिक्षण और अनुवाद की दृष्टि से दो भिन्न-भिन्न भाषाओं में पाई जाने वाली समानताओं और समानता ओं की खोज करना है। यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि भले ही इन दोनों में भाषाओं के बीच तुलना ही की जाती है, किंतु उद्देश्य और कार्यपद्धति की दृष्टि से दोनों अलग-अलग विषय हैं।
भाषाविज्ञान में समकालिक (synchronic) और कालक्रमिक (diachronic) अध्ययन
भाषाविज्ञान के उपर्युक्त प्रकारों को ‘समकालिक और कालक्रमिक अध्ययन’ के रूप में भी जाना जाता है। इस दृष्टि से हम कहते हैं कि
भाषा का भाषवैज्ञानिक अध्ययन मुख्यत: तीन विधियों से किया जाता है – समकालिक, कालक्रमिक और तुलनात्मक
(synchronic, diachronic and
comparative)। भाषा अध्ययन के इतिहास को देखें तो मुख्यत: कालक्रमिक
पद्धति आरंभ से चली आ रही थी। इसे ही मूल भाषाविज्ञान के रूप में देखा जाता था।
कालक्रमिक और समकालिक अध्ययन में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं था। बीसवीं सदी के आरंभ
में सस्यूर द्वारा किए गए चिंतन में इनका स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। कालक्रमिक
भाषा अध्ययन में विभिन्न काल बिंदुओं पर किसी भाषा के विकास को देखा जाता है।
समकालिक भाषा अध्ययन में एक ही काल बिंदु पर किसी भाषा की स्थिति की विवेचना की
जाती है।
वैसे देखा जाए तो ‘समकालिक अध्ययन’ (वर्णनात्मक भाषाविज्ञान) कालक्रमिक और तुलनात्मक दोनों ही अध्ययन प्रणालियों
का मूल है। इसका प्रयोग करते हुए ये दोनों प्रकार के अध्ययन अत्यंत सरलतापूर्वक
किए जा सकते हैं। इस कारण सस्यूर द्वारा समकालिक अध्ययन पर विशेष बल दिया गया है।
उन्होंने कहा है –
"Synchronic linguistics will
concern the logical and psychological relations that bind together co-existing
terms and from a system in the collective mind of speakers. Diachronic
linguistics, on the contrary, will study relations that bind together successive
terms, not perceived by the collective mind but substituted for each other
without forming a system."
इस प्रकार देख सकते हैं कि सस्यूर द्वारा समकालिक अध्ययन को भाषाभाषी के
मन:मस्तिष्क के अधिक समीप माना गया है।
No comments:
Post a Comment