ऊपर किए गए वर्णन से स्पष्ट हो चुका है कि ‘ऐतिहासिक भाषाविज्ञान’ भाषाविज्ञान की वह शाखा है जो भाषाओं की उत्पत्ति, विकास,
परिवर्तन तथा उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करती है।
इसका मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि समय के साथ भाषाओं में ध्वनि, शब्द,
अर्थ और व्याकरण के स्तर पर किस प्रकार परिवर्तन होते हैं। इस
कार्य के लिए यह तुलनात्मक भाषाविज्ञान को भी अपने साथ लेकर चलती है। इन दोनों के योग
से किए जाने वाले कार्य ही ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के क्षेत्र-विस्तार (Scope) के अंतर्गत आते हैं, जिनमें से प्रमुख इस
प्रकार हैं-
1. भाषा-परिवर्तन का अध्ययन
ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का मूलभूत कार्य भाषा में होने वाले परिवर्तनों का
अध्ययन करना है। यह अध्ययन भाषा के सभी स्तरों पर देखा जाता है, जिन्हें पर निम्नलिखित प्रकार
से विभाजित करते हैं-
§ ध्वन्यात्मक परिवर्तन (Sound Change)
§ रूपात्मक परिवर्तन (Morphological Change)
§ वाक्यात्मक परिवर्तन (Syntactic Change)
§ अर्थगत परिवर्तन (Semantic Change)
2. आदिभाषाओं (Proto-Languages) का पुनर्निर्माण
ऐतिहासिक भाषाविज्ञान विश्व की भाषाओं में हुए परिवर्तनों के आधार पर यह जानने
का प्रयास करता है कि भाषाओं का प्राचीन रूप क्या था तथा उनसे क्रमशः आधुनिक रूप
कैसे विकसित हुए हैं? इस क्रम में यह शाखा उन भाषाओं के पूर्वरूपों का पुनर्निर्माण करने का प्रयास
करती है जिनके प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान द्वारा तुलनात्मक
पद्धति के माध्यम से ‘प्रोटो-इंडो-यूरोपीय भाषा’ जैसी आदिभाषाओं के पुनर्निर्माण का प्रयास किया गया है।
3. भाषा-परिवारों का निर्धारण
मानव विकास की अवधारणा के अनुसार जिस प्रकार एक विशेष भूखंड से समस्त विश्व
में मनुष्य का प्रसार हुआ है, उसी प्रकार मानव भाषाओं का भी एक स्थान से ही समस्त विश्व में प्रसार हुआ है।
ऐसी स्थिति में बहुत-सी भाषाओं के बीच समानता पाई जाती है। उन समानताओं को आधार
बनाकर भाषा परिवारों की बात की जाती है। भाषा परिवारों के निर्धारण का यह कार्य
ऐतिहासिक भाषाविज्ञान द्वारा किया जाता है। इसके अंतर्गत ऐतिहासिक भाषाविज्ञान यह बताने
का प्रयास करता है कि कौन-सी भाषाएँ एक ही पूर्वज भाषा से विकसित हुई हैं। उदाहरण
के लिए-
§ हिंदी,
संस्कृत, अंग्रेज़ी, ग्रीक और लैटिन इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार से संबंधित हैं।
§ तमिल,
तेलुगु, कन्नड़ और
मलयालम द्रविड़ भाषा परिवार की भाषाएँ हैं।
4. तुलनात्मक अध्ययन
ऐतिहासिक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics) भाषा के पुराने रूपों की खोज करता है, और तुलनात्मक
भाषाविज्ञान (Comparative
Linguistics) उसे सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है।
इन दोनों के योग से विभिन्न सह-संबंधित भाषाओं की तुलना करके उनकी समानताओं और
भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। इससे भाषाओं के ऐतिहासिक विकास का पता चलता है।
अतः तुलनात्मक अध्ययन ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अंतर्गत किया जाने वाला आधारभूत कार्य
है।
5. आंतरिक पुनर्निर्माण (Internal Reconstruction)
आंतरिक पुनर्निर्माण ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की एक महत्वपूर्ण पद्धति है, जिसके द्वारा किसी एक
भाषा के वर्तमान या उपलब्ध रूप में पाए जाने वाले अनियमितताओं, वैकल्पिक रूपों तथा
संरचनात्मक भिन्नताओं के आधार पर उसके पूर्ववर्ती स्वरूप (earlier stage) का पुनर्निर्माण किया जाता है। इस पद्धति में अन्य संबंधित भाषाओं की सहायता
नहीं ली जाती; बल्कि केवल एक ही भाषा के आंतरिक साक्ष्यों का विश्लेषण किया जाता है।
Lyle Campbell के अनुसार, "Internal reconstruction
is a method for recovering information about a language's earlier stage from
evidence found within the language itself."
6. व्युत्पत्ति-विज्ञान (Etymology)
शब्दों की उत्पत्ति, विकास और
अर्थ-परिवर्तन का अध्ययन ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। इससे यह ज्ञात
होता है कि किसी शब्द का मूल स्रोत क्या है और वह समय के साथ कैसे परिवर्तित हुआ।
7. अर्थ-परिवर्तन का अध्ययन
शब्दों के अर्थ समय के साथ बदलते रहते हैं। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषा के अन्य
स्तरों के साथ-साथ अर्थ-परिवर्तन के विविध रूपों का भी अध्ययन करता है, जो इस प्रकार हैं-
§ अर्थ-विस्तार (Broadening)
§ अर्थ-संकोच (Narrowing)
§ अर्थोत्कर्ष (Amelioration)
§ अर्थापकर्ष (Pejoration)
§ रूपकात्मक परिवर्तन (Metaphorical Change)
8. भाषा-संपर्क और आदान (Language
Contact and Borrowing)
जब दो भाषाएँ संपर्क में आती हैं, तो वे एक-दूसरे से शब्द और संरचनाएँ ग्रहण करती हैं। उदाहरणतः हिंदी में
संस्कृत,
फ़ारसी, अरबी और
अंग्रेज़ी से अनेक शब्द आए हैं। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान ऐसे प्रभावों का अध्ययन करता
है। इस अध्ययन के माध्यम से यह आदान (Borrowing) के कारण मिलने वाली समानता को भाषा परिवार के निर्माण
से दूर रखता है।
9. प्राचीन अभिलेखों और ग्रंथों का अध्ययन
शिलालेखों,
पांडुलिपियों तथा प्राचीन साहित्यिक ग्रंथों का अध्ययन करके
भाषाओं के पुराने रूपों का पता लगाया जाता है।
संदर्भ ग्रंथ :
§ Lyle Campbell (2013). Historical Linguistics: An Introduction (3rd ed.). Edinburgh University Press.
§ Hans Henrich Hock & Brian D. Joseph (2009). Language History, Language Change, and Language
Relationship: An Introduction to Historical and Comparative Linguistics (2nd ed.). Mouton de Gruyter.
§ R. H. Robins (1997). A Short History of Linguistics
(4th ed.). Longman.
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