ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाओं के इतिहास, उनके विकास और परिवर्तन का अध्ययन करने वाली भाषाविज्ञान की
शाखा है। इसका विकास अनेक शताब्दियों में हुआ और इसमें भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों
परंपराओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में ऐतिहासिक भाषाविज्ञान
ही मूल भाषाविज्ञान के रूप में विकसित हुआ था। इसका मूल कारण सर विलियम जोंस (1786)
के विचार थे, जिसमें उन्होंने संस्कृत, ग्रीक और लैटिन में समानताओं
की बात की थी। सस्यूर (1916) के विचारों के प्रभाव से आधुनिक संरचनात्मक या वर्णनात्मक
भाषाविज्ञान के विकास के बाद यह शाखा गौण हो गई।
ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के विकासक्रम की प्रमुख बातों निम्नलिखित प्रकार से देख सकते
हैं-
1. प्राचीन काल
भाषा के ऐतिहासिक अध्ययन की शुरुआत प्राचीन भारत में मानी जाती है। इस काल में
वैदिक संस्कृत के मूलरूपों तथा उसमें हुए क्रमशः विकास का परिचय व्याकरणाचार्यों द्वारा
दिया जाता था। स्वयं आचार्य पाणिनि (लगभग 5वीं–4थी शताब्दी ईसा पूर्व) ने अष्टाध्यायी में भाषा की संरचना और परिवर्तन का कई स्थानों पर उल्लेख
किया है। बाद में कात्यायन और पतञ्जलि ने भी कुछ स्थानों पर भाषा के ऐतिहासिक स्वरूप और प्रयोगगत परिवर्तनों पर
विचार किया है। यद्यपि उनका मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक भाषाविज्ञान नहीं था, फिर भी उनके कार्यों ने
इसके विकास की आधारभूमि तैयार की।
प्राचीन यूनान में प्लेटो और अरस्तू ने भाषा की प्रकृति पर विचार किया, किंतु भाषाओं के ऐतिहासिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन नहीं
किया गया। ग्रीक और लैटिन परंपरा में इस क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं प्राप्त
होता है।
2. पुनर्जागरण और
प्रारंभिक तुलनात्मक अध्ययन
15वीं और 16वीं शताब्दी में यूरोप
में पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप विभिन्न भाषाओं के अध्ययन में रुचि बढ़ी। यूरोपीय
विद्वानों ने संस्कृत, ग्रीक, लैटिन तथा अन्य भाषाओं के बीच समानताओं को पहचानना प्रारंभ किया। इससे भाषाओं
के ऐतिहासिक संबंधों के अध्ययन की नींव पड़ी।
3. तुलनात्मक
भाषाविज्ञान का उदय (18वीं शताब्दी)
ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के विकास में सबसे महत्वपूर्ण घटना 1786 में Sir
William Jones का प्रसिद्ध व्याख्यान था। उन्होंने संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, गोथिक और सेल्टिक
भाषाओं के बीच गहरी समानताओं की ओर संकेत करते हुए कहा कि ये सभी किसी एक सामान्य
स्रोत से विकसित हुई हैं। इस विचार ने तुलनात्मक भाषाविज्ञान और ऐतिहासिक
भाषाविज्ञान की नींव रखी।
4. उन्नीसवीं
शताब्दी : ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का स्वर्णकाल
उन्नीसवीं शताब्दी में ऐतिहासिक भाषाविज्ञान एक स्वतंत्र वैज्ञानिक अनुशासन के
रूप में स्थापित हुआ। इस काल के प्रमुख विद्वानों में निम्नलिखित विद्वान उल्लेख्य
हैं-
· Franz Bopp
· Rasmus Rask
· Jacob Grimm
· August Schleicher
इन विद्वानों ने तुलनात्मक पद्धति (Comparative
Method) का विकास किया तथा भाषाओं के बीच नियमित ध्वनि-संबंधों की खोज की। Jacob
Grimm द्वारा प्रतिपादित Grimm's Law ऐतिहासिक
ध्वनि-परिवर्तन के अध्ययन में मील का पत्थर माना जाता है।
5. नवव्याकरणवादी (Neogrammarian) आंदोलन
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जर्मनी के नवव्याकरणवादियों ने यह
सिद्धांत प्रस्तुत किया कि ध्वनि-परिवर्तन नियमित और नियमबद्ध होते हैं। इस आंदोलन
ने ऐतिहासिक भाषाविज्ञान को अधिक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
6. बीसवीं शताब्दी
: संरचनावाद का उदय
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में Ferdinand de Saussure ने भाषा के समकालिक (Synchronic) अध्ययन पर बल दिया। इसके परिणामस्वरूप कुछ समय के लिए ऐतिहासिक अध्ययन का
महत्व कम हुआ, किंतु ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का विकास जारी रहा। बाद में संरचनात्मक और
ऐतिहासिक दृष्टिकोणों के समन्वय से नए विकास भी देखे जा सकते हैं।
संदर्भ ग्रंथ :
§ Lyle Campbell (2013). Historical Linguistics: An Introduction (3rd ed.). Edinburgh University Press.
§ Hans Henrich Hock & Brian D. Joseph (2009). Language History, Language Change, and Language
Relationship: An Introduction to Historical and Comparative Linguistics (2nd ed.). Mouton de Gruyter.
§ R. H. Robins (1997). A Short History of Linguistics
(4th ed.). Longman.
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