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Friday, April 23, 2021

भाषा अर्जन (Language Acquisition)

 भाषा अर्जन (Language Acquisition)

मानव शिशु द्वारा अपने परिवेश में प्रयुक्त भाषा को स्वयं से प्रयास से सीखने की प्रक्रिया भाषा अर्जन कहलाती है। हम देखते हैं कि जन्म लेने के लगभग 06 महीने बाद से मानव शिशु ध्वनियों का उच्चारण आरंभ कर देता है। इस दौरान वह अपने आस-पास के लोगों द्वारा बोली जा रही ध्वनियों को ध्यान से सुनता है तथा उनका अनुकरण करने का प्रयास करता है। इस क्रम में धीरे-धीरे वह भाषायी ध्वनियों का उच्चारण सीखने लगता है और  समय के साथ एक से अधिक ध्वनियों को मिलाकर शब्दों और उसके बाद छोटे-छोटे वाक्यों, फिर बड़े वाक्यों का उच्चारण तथा प्रयोग सीख लेता है। इस प्रक्रिया में परिवार के लोग सहायक होते हैं, क्योंकि वे बच्चे की समझ के अनुसार सरल शब्दों का चयन करते हैं और बार-बार उच्चारण अभ्यास भी कराते हैं।

मानव शिशु जन्म लेने के बाद अपने परिवेश की भाषा को सीखता है, जिसे उसका मातृभाषा अर्जन (Mother Language Acquisition-MLA) या प्रथम भाषा अर्जन (first language acquisition (FLA)) कहते हैं। यदि शिशु के परिवेश में एक से अधिक भाषाएँ प्रचलित होती हैं, तो वह दो भाषाओं को भी सीख लेता है। इसे द्विभाषी प्रथम भाषा अर्जन (bilingual first language acquisition (BFLA)) कहते हैं।

आगे हम भाषा अर्जन के प्रमुख सिद्धांतों को देखेंगे। 

वाक् उत्पादन (Speech Production) & वाक् बोधन (Speech Perception)

वाक् उत्पादन (Speech Production) & वाक् बोधन (Speech Perception)

वाक् उत्पादन (Speech Production)

भाषा उत्पादन से तात्पर्य है- मन में कोई विचार या भाव उत्पन्न होने के बाद उसे ध्वनि-प्रतीकों में ढालने और अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया। इस कारण सामान्यतः इसे वाक् उत्पादन’(Speech Production) कहा जाता है। इसमें हम यह देखने का प्रयास करते हैं कि मन में कोई विचार आने के बाद वक्ता उसे कैसे ध्वनियों में ढालता है तथा अभिव्यक्त करता है। हम प्रतिदिन हजारों बार यह कार्य अत्यंत स्वाभाविक रूप से करते हैं, किंतु इसके पीछे एक बड़ी प्रक्रिया या प्रणाली कार्य करती है। इसे निम्नलिखित प्रकार से समझ सकते हैं-

विचार या भाव उत्पन्न होना

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विचार को अभिव्यक्त करने के लिए मानसिक संकल्पनाओं का चयन

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उन मानसिक संकल्पनाओं के लिए शब्दों और वाक्य साँचे का चयन

ध्वनियों का चयन

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वाक् उत्पादन अंगों का प्रयोग करते हुए ध्वनियों का उच्चारण

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वाक्/वाक्य की अभिव्यक्ति

इसे एक उदाहरण द्वारा समझते हैं। मान लीजिए किसी को प्यास लगी हो और उसे किसी से पानी माँगकर पीना हो। तो इसके लिए जो वाक् उत्पादनकी आवश्यकता होगी, उसे देखेंगे। यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि प्यास लगने पर स्वयं पानी खोजकर पी लेने में वाक् उत्पादन की आवश्यकता नहीं होती। यहाँ हम भाषिक अभिव्यक्ति (वाक्य) के प्रयोग की आवश्यकता को ध्यान में रखकर बात कर रहे हैं-

प्यास लगना और पानी माँगने का विचार उत्पन्न होना

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संबोधित व्यक्ति का चयन;(नाम लेना है या नहीं), + पानी के लिए संकल्पना +माँगने के लिए संकल्पना

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संबोधित व्यक्ति का चयन; पानी के लिए शब्द का चयन (जैसे- पानी, जल, वाटर, बोतल या पानी का गिलास, या एक गिलास पानी आदि); माँगने के लिए क्रिया का चयन (जैसे- दीजिए, दो, चाहिए, है क्या, मिलेगा क्या आदि) और वाक्य साँचे का चयन (जैसे- आदेशात्मक, निवेदनसूचक, ‘चाहिएवाला वाक्य आदि)

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ध्वनियों का चयन (मान लीजिए पानी दीजिएकहना है, तो प, , , , , , , , ए ध्वनियाँ चुनेंगे)

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वाक् उत्पादन अंगों का प्रयोग करते हुए ध्वनियों का उच्चारण

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पानी दीजिएवाक्य की वाचिक अभिव्यक्ति होगी

 

 

2. वाक् बोधन (Speech Perception)

ऊपर हम लोगों ने वक्ता द्वारा वाक्का उत्पादन किए जाने की प्रक्रिया को देखा। जब कोई वाक्य बोला जाता है तो वह ध्वनि तरंगों के माध्यम से श्रोता के कानों तक पहुँचता है। इसके पश्चात श्रोता के मन या मस्तिष्क में वाक् बोधन की प्रक्रिया संपन्न होती है, जिसे चरणबद्ध रूप से इस प्रकार से देख सकते हैं-

कर्णेंद्रिय अंगों द्वारा ध्वनियों का श्रवण

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सामान्यीकरण- अतिरिक्त ध्वनियों को हटाना (noise removal), कम सुनाई पड़ी ध्वनियों या खंडित शब्दों को अपने सामान्य ज्ञान तथा संदर्भ के आधार पर जोड़कर वाक्य पूरा करना

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वाक्य का खंडीकरण करना (शब्दों में)

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आवश्यक संदर्भ आदि का प्रयोग करते हुए वाक्य के अर्थ को ग्रहण करना

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इस प्रकार से किसी वाक् में निहित अर्थ का बोधन संपन्न हुआ

भाषा और मन का संबंध (Relation of Language and Mind)

 भाषा और मन का संबंध (Relation of Language and Mind)

भाषा और मन किस प्रकार से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं?

·      मन भाषा को धारण करने वाली इकाई है-

भाषा अमूर्त होती है। यह एक व्यवस्था के रूप में मानव मन में ही रहती है। किसी भाषा के किसी व्यक्ति के मन में होने को दो भागों में विभाजित करके देख सकते हैं-

शब्दकोश- मन में उस भाषा का शब्दकोश होना, जो शब्दकोश मन में रहता/निर्मित होता है, उसे मानसिक शब्दकोश (mental lexicon) कहते हैं। इस शब्दकोश में ध्वनि-समुच्चय, उपसर्ग-प्रत्यय आदि का समुच्चय, शब्द समुच्चय, रूढ़ पदबंध (मुहावरे, लोकोक्तियाँ) आदि सभी आ जाते हैं।

नियमों की व्यवस्था- शब्दकोश के अलावा में मानव मन में संबंधित भाषा के नियमों की व्यवस्था होती है। यह व्यवस्था भाषा के सभी स्तरों पर (स्वनिम से प्रोक्ति तक) होती है।

यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि किसी व्यक्ति विशेष के मन में किसी भाषा के सभी शब्दों का शब्दकोश या सभी नियमों का होना आवश्यक नहीं है, और न ही यह व्यावहारिक है। प्रत्येक व्यक्ति के मन में शब्दों (अन्य इकाइयों) और नियमों की संख्या की उतनी ही होती है, जितने से उसका प्रत्यक्षण हुआ रहता है। साथ ही समय के साथ सीखने और भूलने की प्रक्रिया भी चलती रहती है। इसलिए मानसिक शब्दकोश या नियमों की व्यवस्था में समय के साथ-साथ परिवर्तन भी होता रहता है। यह बात व्यक्ति के मातृभाषा, द्वितीय भाषा और अन्य भाषा (यदि वह उसका प्रयोग करता है), सभी पर लागू होती है।

·      भाषा अधिकांश प्रगत (advance) मानसिक प्रक्रियाओं का आधार है-

प्रत्येक प्राणी के पास मन जैसी इकाई होती है, जो उसकी जैविक और मस्तिष्कीय क्षमताओं के अनुरूप विकसित होती है। मनुष्य में मन नामक इकाई सर्वाधिक विकसित अवस्था में होती है। मन में होने वाली प्रक्रियाओं को मूलतः दो भागों में विभक्त कर सकते हैं- जैविक और विचारपरक। जैविक प्रक्रियाओं में शरीर संबंधी सहजात प्रक्रियाएँ आती हैं, जैसे- भूख लगना, प्यास लगना, नींद आना, दर्द होना, भयभीत होना, क्रोध आना आदि। इनकी अभिव्यक्ति के लिए भाषा का होना आवश्यक नहीं है। सभी प्राणी किसी-न-किसी रूप में इन जैविक प्रक्रियाओं की अभिव्यक्ति या आदान-प्रदान करते हैं।

विचारपरक प्रक्रियाएँ केवल मनुष्यों में ही संपन्न होती हैं और उनके लिए भाषा का होना आवश्यक है। ध्वनि-प्रतीकों या किसी भी प्रकार के भाषिक प्रतीकों के माध्यम सेकिसी संदेशको अभिव्यक्त करना, किसी दूसरे व्यक्ति या समूह को संप्रेषित करना, विचार करना आदि इसके अंतर्गत आते हैं। भाषा के बिना इनका संपादन संभव नहीं है।

मन और संज्ञान (Mind and Cognition)

 मन और संज्ञान (Mind and Cognition)

संज्ञानमनोविज्ञान के क्षेत्र में अपेक्षाकृत एक नई अवधारणा है। इसे मन के ही एक भाग के रूप में माना गया है। संज्ञान को https://www.verywellmind.com/what-is-cognition-2794982. पर निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित या व्याख्यायित किया गया है-

Cognition is a term referring to the mental processes involved in gaining knowledge and comprehension. These cognitive processes include thinking, knowing, remembering, judging, and problem-solving. 1 These are higher-level functions of the brain and encompass language, imagination, perception, and planning.

हम देख सकते हैं कि प्रक्रिया के स्तर पर इसमें भी लगभग वही बातें आई हैं, जिन्हें हम पारंपरिक रूप से मनके अंतर्गत पढ़ते या समझते-समझाते रहे हैं। संज्ञानमन की ही एक इकाई है और इसके अध्ययन के लिए मनोविज्ञान की ही एक शाखा के रूप में संज्ञानात्मक मनोविज्ञान(Cognitive Psychology) का विकास हुआ है।

चूँकि भाषामन के साथ-साथ संज्ञानसे भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है, इसलिए भाषाविज्ञानके अंतर्गत भी अंतरानुशासनिक अध्ययन क्षेत्र के रूप में संज्ञानात्मक भाषाविज्ञानका विकास हुआ है।

संज्ञान और भाषा के विविध पक्षों को इस चित्र में देखा जा सकता है-

 


इसके बारे में अंग्रेजी में विस्तार से https://www.researchgate.net/publication/286313223_Language_and_cognition पर पढ़ सकते हैं।