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Wednesday, November 17, 2021

पिजिन और क्रियोल (Pidgin and Creole)

 पिजिन और क्रियोल (Pidgin and Creole)

पिजिन (Pidgin)

जब दो या दो से अधिक भिन्न भाषाओं के लोग व्यापार आदि उद्देश्य के लिए किसी स्थान पर मिलते हैं और उनके मिलने से उनकी भाषाओं के संयोग (combination) से एक मिश्रित भाषा विकास होता है, तो उस भाषा को पिजिन कहते हैं। जब एक से अधिक भाषाओं के लोग व्यापार आदि सामान्य उद्देश्यों के लिए मिलते हैं तो सीमित मात्रा में शब्दावली (vocabulary) तथा व्याकरणिक प्रयोगों का सम्मिश्रण करते हुए परस्पर संप्रेषण करते हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे एक नई मिश्रित भाषा का विकास हो जाता है। उस नई भाषा को ही पिजिन कहते हैं।

अतः पिजिन संप्रेषण की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भाषाओं के मिश्रण से विकसित नवीन भाषा रूप है। यह एकाधिक व्यक्तियों या समूहों के बीच किसी क्षेत्र विशेष में प्रयोग में आता है। जिस भी व्यक्ति को उस क्षेत्र विशेष में व्यापार आदि करना होता है उसे इस पिजिन का ज्ञान होना आवश्यक होता है। चूँकि पिजिन किसी की मातृभाषा नहीं होती, इस कारण लोग उसे द्वितीय भाषा के रूप में सीखते हैं।

पिजिन के विकास की पृष्ठभूमि उपनिवेशवादी काल से जुड़ी हुई है, जब व्यापार के लिए पुर्तगाली, डच, फ्रेंच, अंग्रेज आदि लोग विभिन्न देशों में गए तथा वहाँ इनके और स्थानीय लोगों/व्यापारियों के साथ मिलने से नई-नई भाषाओं का विकास हुआ।

क्रिओल (Creole)

पिजिन ही जब किसी समूह या समुदाय की मातृभाषा बन जाती है तो वह क्रिओल कहलाने लगती है। जब किसी स्थान पर लंबे समय तक व्यापार चलता है तो कुछ लोग वहाँ जीवन-यापन व्यापार आदि में सुविधा की दृष्टि से बस जाते हैं। ऐसी स्थिति में उनके बच्चे उस पिजिन को ही अपनी मातृभाषा के रूप में सीखते हैं। अतः इन लोगों की मातृभाषा होने के साथ ही वह भाषा क्रिओल बन जाती है।

भाषा द्वैत (Diglossia)

 भाषा द्वैत (Diglossia)

जब किसी भाषा के एक से अधिक रूप उसी भाषायी समाज में प्रचलित हो जाते हैं तो इस स्थिति को भाषा द्वैत कहते हैं। यह स्थिति किसी भाषा के दो बोली रूपों या भाषा रूपों में हो सकती है। जब किसी भाषा के ऐसे दो रूप विकसित हो जाते हैं तो उन्हें सामान्यतः उच्च और निम्न के रूप में अलग-अलग दर्शाया जाता है। इन्हें इस प्रकार से दिखा सकते हैं-

§  उच्च ("H" or "high")

§  निम्न ("L" or "low")

इन रूपों के प्रयोग क्षेत्रों में अंतर होता है-

§  उच्च ("H" or "high") रूप के प्रयोग क्षेत्र – इस रूप का प्रयोग विशिष्ट प्रयोजन, औपचारिक शिक्षा, साहित्य आदि क्षेत्रों में होता है। सामान्य बातचीत या व्यवहार में सामान्यतः इस रूप का प्रयोग नहीं होता।

§  निम्न ("L" or "low") रूप के प्रयोग क्षेत्र – इस रूप का प्रयोग सामान्य बातचीत या व्यवहार में प्रयोग होता है। विशिष्ट प्रयोजन, औपचारिक शिक्षा, साहित्य आदि क्षेत्रों में इसका प्रयोग नहीं होता।

यूरोपीय भाषाओं में उच्च जर्मन और निम्न जर्मन इसका उदाहरण है। इसी प्रकार भारतीय भाषाओं में बंगाली में साधु बंगाली और चालित बंगाली को भी देखा जा सकता है। कुछ विद्वान संस्कृतनिष्ठ हिंदी और हिंदुस्तानी को भी इसी प्रकार से देखते हैं। वर्तमान संदर्भ में विशुद्ध हिंदी और हिंग्लिश को इसी प्रकार से देखा जा सकता है, यद्यपि यह अन्य भाषा के प्रभाव से विकसित रूप है।

Thursday, November 11, 2021

हिंदी की दुर्दशा

 प्रश्न संख्या 96 और 98 इस बात के उदाहरण हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में कितने बड़े-बड़े मूर्खों को हिंदी के प्रश्नपत्र बनाने को दिए जाते हैं-


संदर्भ-

शीघ्र ही देता हूँ...

Saturday, October 30, 2021

विभेदक अभिलक्षण (Distinctive Features)

 विभेदक अभिलक्षण (Distinctive Features)

विभेदक  = भेद उत्पन्न करने वाला

विभेदक का शाब्दिक अर्थ है- भेद उत्पन्न करने वाला। किसी भाषा की ध्वनि व्यवस्था में दो ध्वनियों में भेद उत्पन्न करने वाले अभिलक्षणों को विभेदक अभिलक्षण कहते हैं। भेद उत्पन्न करने से यहाँ तात्पर्य है कि उस अभिलक्षण के साथ जुड़कर बनने वाली दूसरी ध्वनि में अर्थभेद की क्षमता हो।

अर्थभेद की क्षमता का अर्थ है- नई ध्वनि से निर्मित शब्द का पुरानी ध्वनि से निर्मित शब्द के अर्थ से अलग अर्थ हो।

उदाहरण-

ध्वनि + अभिलक्षण      = नई ध्वनि

    + प्राणत्व   = 

  + घोषत्व               = ग

अब इन ध्वनियों से बनने वाले शब्दों को देखते हैं-

क से = कल, काल ; ख से खल, खाल

क से = कल, काल ; ग से गल, गाल

इनमें खल, खाल अथवा गल, गाल शब्दों के अर्थ कल, काल शब्दों के अर्थ से भिन्न हैं। अतः प्राणत्व और घोषत्व विभेदक अभिलक्षण हैं।