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Tuesday, December 13, 2022

अर्थ के 07 प्रकार (07 Types of Meaning)

 अर्थ के 07 प्रकार (07 Types of Meaning)

 सुप्रसिद्ध अर्थवैज्ञानिक Geoffrey Leech (1974, 1981) द्वारा अर्थ के निम्नलिखित 07 प्रकारों की बात की गई है-

v संकल्पनात्मक (conceptual)

v लाक्षणिक (connotative)

v सहप्रयोगात्मक (collocative)

v reflective

v प्रभावपरक (affective)

v सामाजिक (social)

v thematic

आगे संक्षेप में इन्हें इस प्रकार से देख सकते हैं-

§  संकल्पनात्मक (conceptual)

यह किसी शब्द के उच्चारण से मन में उत्पन्न होने वाले वाला आधारभूत या प्रारंभिक अर्थ है, जो बाह्य संसार की वस्तु का बिंब अथवा संबंधित संकल्पना के रूप में होता है। इसे  cognitive या denotative meaning भी कहते हैं।

उदाहरण-

गधा = एक पालतू जानवर

शेर = एक जंगली जानवर

§  लाक्षणिक (connotative)

यह किसी शब्द के उच्चारण से मन में उत्पन्न होने वाले वाला आधारभूत या प्रारंभिक अर्थ से बाद का अर्थ है, जो उस वस्तु के किसी गुण या लक्षण (feature) विशेष पर आधारित होता है। भारतीय परंपरा के अनुसार इसे 'लक्षणा' शब्दशक्ति से उत्पन्न अर्थ के रूप में समझा जा सकता है।

उदाहरण-

गधा = मूर्ख

शेर = बहुत अधिक शक्तिशाली

§  सहप्रयोगात्मक (collocative)

जब कोई शब्द किसी दूसरे शब्द विशेष के साथ प्रयुक्त होकर कोई विशेष अर्थ देता है, तो उस अर्थ को सहप्रयोगात्मक अर्थ कहते हैं, तथा इस प्रकार बनने वाली भाषिक इकाई को सहप्रयोग (Collocation) कहते हैं। उदाहरण-

हिंदी उदाहरण-

v बरस पड़ना (व्यक्ति का)

v उठा लेना (भगवान द्वारा)

v आँखों में चुभना

अंग्रेजी उदाहरण-

v "pay attention", "fast food", "make an effort", "powerful engine".

 

§  reflective

इसका संबंध किसी शब्द के एकाधिक अर्थ होने से है। अर्थात उस शब्द का ऐसा प्रयोग हो कि वह एक अर्थ के साथ-साथ दूसरा अर्थ भी देता हो।

उदाहरण-

v डियर फ्रैंड्स

में डियर मित्रता के साथ-साथ सामान्य बोलचाल में ऐसे ही किए जाने वाले प्रयोग का भी भाव दे रहा है।

§  प्रभावपरक (affective)

वक्ता द्वारा वार्तालाप में कुछ विशेष प्रकार की भावनात्मक स्थितियों के लिए कुछ उक्तियों का प्रयोग करने पर जिस प्रकार के अर्थ का बोध होता है, वे प्रभावपरक के अंतर्गत आते हैं। इनका संबंध वक्ता या श्रोता की व्यक्तिगत भावनाओं से भी हो सकता है। इनका प्रयोग insults, flattery, hyperbole या sarcasm आदि के लिए भी हो सकता है। इसे Emotive Meaning भी कहा जाता है।

उदाहरण-

v कि घर कब आओगे (बार्डर)

v गीत में 'घर' शब्द का अर्थ प्रभावपरक है।

v चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है में 'चिट्ठी शब्द का अर्थ

 

§  सामाजिक (social)

विविध सामाजिक क्रियाकलापों, जैसे- greetings, apologies, blessings या condolences आदि में प्रयुक्त भाषिक अभिव्यक्तियों का अर्थ उनका सामाजिक अर्थ कहलाता है।

उदाहरण-

v जुग-जुग जियो

 

§  thematic

इसका संबंध वाक्यात्मक प्रयोग में विविध प्रकार्य-स्थानों अथवा वाक्य रूपों के प्रयोग से अर्थ में या इसके प्रभाव में होने वाले अंतर से है, जैसे-

v उसने गिलास तोड़ दिया।

v उससे गिलास टूट गई।

v डॉक्टर साहब आज चाकलेट बाँटेंगे।

v आज डॉक्टर साहब द्वारा चॉकलेट बाँटा जाएगा।

 

संदर्भ-

Leech, G. 1974. Semantics. New York, U.S.A: Penguin.

Leech, Geoffrey. 1981. Semantics : The Study of Meaning. Second ed. Great Britain:Penguin Books.

Lyons, J. 1997. Semantics Volume I. Great Britain: University Press, Cambridge.

http://universeofenglish.blogspot.com/2009/02/seven-types-of-meaning-in-semantics.html

 

अर्थ प्रतिपादन के स्तर

 अर्थ प्रतिपादन के स्तर

अर्थ प्रतिपादन से तात्पर्य यह है कि किसी ध्वनि समूह के माध्यम से हम अर्थ को कैसे अभिव्यक्त करते हैं। जैसा कि हम जानते हैं स्वतंत्र इकाई के रूप में अर्थ को धारण करने  वाला भाषिक स्तर शब्द है, किंतु सदैव केवल शब्द में ही अर्थ नहीं होता, बल्कि शब्द के अलावा कुछ उसके छोटे स्तर और उससे बड़े स्तर पर भी अर्थ देखा जा सकता है। मोटे तौर पर इसे 03 वर्गों में वर्गीकृत करके समझ सकते हैं -

(1) शब्द   ( Word)

(2) प्रकृति और प्रत्यय  (Base and Suffix)

(3) बहुशब्दीय  अभिव्यक्तियाँ (Multiple Word Expressions)

इन्हें संक्षेप में इस प्रकार से समझ सकते हैं-

(1) शब्द   ( Word)

 शब्द अर्थ को धारण करने वाली मूलभूत इकाई है। शब्द की संरचना इस प्रकार होती है कि इसमें एक ओर ध्वनि समूह होता है तो दूसरी ओर अर्थ होता है जिसे चित्र रूप में इस प्रकार से दर्शाया जा सकता है -


इस उदाहरण में हम देख सकते हैं कि गाय एक शब्द है, जिसमें एक ओर ग+आ+यध्वनि समूह है तो दूसरी ओर इसका एक चित्रात्मक अर्थ हमारे मस्तिष्क में संकल्पना के रूप में है। किसी भी भाषा में इसी प्रकार से लाखों की संख्या में शब्द होते हैं, जिनका स्वतंत्र इकाई के रूप में अर्थ होता है।

शब्द कई प्रकार के होते हैं, जैसे- मूल शब्द और निर्मित शब्द। निर्मित शब्द भी उपसर्ग, प्रत्यय योग, संधि, समास द्विरुक्ति आदि अनेक प्रक्रियाओं से बनते हैं, जिनके बारे में विस्तार से इस लिंक पर पढ़ सकते हैं-

इसी प्रकार हिंदी में शब्द से पद निर्माण की प्रक्रिया को विस्तार से इस लिंक पर पढ़ सकते हैं-

इन सभी रूपों में शब्द के स्तर पर अर्थ का धारण होता है।

(2) प्रकृति और प्रत्यय  (Base and Suffix)

शब्द दो प्रकार के होते हैं- मूल और निर्मित शब्द। वे सभी मूल शब्द जिनमें किसी भी प्रकार (उपसर्ग, प्रत्यय योग, संधि, समास द्विरुक्ति आदि) शब्द निर्माण की प्रक्रिया न की गई हो, प्रकृति कहलाते हैं। आचार्यों द्वारा प्रकृति के दो प्रकार किए गए हैं-  धातु और प्रातिपदिक। क्रियाओं के मूल रूप को धातु कहते हैं तथा इसके अलावा अन्य प्रकार के शब्दों, जैसे- संज्ञा, विशेषण, क्रियाविशेषण के मूल रूप को प्रतिपदिक कहते हैं। इन सभी  को सामूहिक रूप से प्रकृति के अंतर्गत रखा जाता है। अतः प्रकृति मूल शब्दों का सामूहिक रूप से दिया गया नाम है। प्रकृति के रूप में आने वाला शब्दमूल अर्थ को धारण करने वाली सबसे छोटी और स्वतंत्र इकाई होती है, जो सभी प्रकार के उपसर्ग प्रत्यय आदि से मुक्त होती है। अतः यह भी शब्द का एक प्रकार ही है, जो स्वतंत्र रूप से अर्थ को धारण करता है, किंतु इसमें सभी प्रकार के शब्द नहीं आते, बल्कि केवल मूल शब्द आते हैं।

प्रत्यय वे शब्दांश हैं, जो स्वतंत्र इकाई के रूप में अर्थ को धारण करने की क्षमता तो नहीं रखते, किंतु उनके माध्यम से नए शब्दों या शब्दरूपों का निर्माण किया जाता है। इसमें जब नए शब्दों को निर्माण किया जाता है तो इस प्रक्रिया को व्युत्पादन तथा जब शब्दरूपों का निर्माण किया जाता है तो इस प्रक्रिया को रूपप्रसाधन कहते हैं। अतः निर्मित शब्दों के संबंध में हम कह सकते हैं कि किसी भी निर्मित शब्द के दो अर्थपूर्ण खंड किए जा सकते हैं- प्रकृति और प्रत्यय। प्रत्यय को यहाँ अंग्रेजी के Affix के पर्याय के रूप में समझना चाहिए, जिसमें उपसर्ग (Prefix), मध्य प्रत्यय (Infix) और प्रत्यय (Suffix) तीनों आ जाते हैं।

उदाहरण-

उपकार = उप + कार

मानवता = मानव + ता

 

संक्षेप में, प्रकृति और प्रत्यय में अंतर करते हुए हम कह सकते हैं कि 'प्रकृति' शब्द का वह लघुतम भाग है जिसका अपना कोशीय अर्थ’ (Lexical Meaning) होता है। आधुनिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से इसे हम मुक्त रूपिम’ (Free Morpheme) के रूप में समझ सकते हैं । इसी प्रकार प्रत्यय शब्द यहां पर बद्ध रूपिम (Bound Morpheme) का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका स्वतंत्र अर्थ को धारण करने वाली इकाई के रूप में प्रयोग नहीं होता, बल्कि अर्थपूर्ण शब्दों से ही नए शब्दों या शब्दरूपों का निर्माण करने में प्रयोग होता है। हिंदी के संदर्भ में इसमें उपसर्ग और प्रत्यय दोनों आ जाते हैं।

प्रकृति के अंतर्गत आने वाले कुछ शब्द इस प्रकार से देखे जा सकते हैं-

गाय, आना, खाना, चल, तुम, कुत्ता, पर आदि।

प्रत्यय के अंतर्गत उपसर्ग और प्रत्यय दोनों प्रकार के शब्दांश आते हैं, जैसे-

उपसर्ग - अ, अन, कु, वि, उप ... आदि।

प्रत्यय - इया, , करण, आवट, आहट आदि।

(3) बहुशब्दीय  अभिव्यक्तियाँ (Multiple Word Expressions)

इसके बारे में निम्नलिखित लिंक पर विस्तार से पढ़ें -

बहुशब्दीय  अभिव्यक्तियाँ (Multiple Word Expressions)


प्रकृति और प्रत्यय (Base and Suffix)

 प्रकृति और प्रत्यय  (Base and Suffix)

शब्द दो प्रकार के होते हैं- मूल और निर्मित शब्द। वे सभी मूल शब्द जिनमें किसी भी प्रकार (उपसर्ग, प्रत्यय योग, संधि, समास द्विरुक्ति आदि) शब्द निर्माण की प्रक्रिया न की गई हो, प्रकृति कहलाते हैं। आचार्यों द्वारा प्रकृति के दो प्रकार किए गए हैं-  धातु और प्रातिपदिक। क्रियाओं के मूल रूप को धातु कहते हैं तथा इसके अलावा अन्य प्रकार के शब्दों, जैसे- संज्ञा, विशेषण, क्रियाविशेषण के मूल रूप को प्रतिपदिक कहते हैं। इन सभी  को सामूहिक रूप से प्रकृति के अंतर्गत रखा जाता है। अतः प्रकृति मूल शब्दों का सामूहिक रूप से दिया गया नाम है। प्रकृति के रूप में आने वाला शब्दमूल अर्थ को धारण करने वाली सबसे छोटी और स्वतंत्र इकाई होती है, जो सभी प्रकार के उपसर्ग प्रत्यय आदि से मुक्त होती है। अतः यह भी शब्द का एक प्रकार ही है, जो स्वतंत्र रूप से अर्थ को धारण करता है, किंतु इसमें सभी प्रकार के शब्द नहीं आते, बल्कि केवल मूल शब्द आते हैं।

प्रत्यय वे शब्दांश हैं, जो स्वतंत्र इकाई के रूप में अर्थ को धारण करने की क्षमता तो नहीं रखते, किंतु उनके माध्यम से नए शब्दों या शब्दरूपों का निर्माण किया जाता है। इसमें जब नए शब्दों को निर्माण किया जाता है तो इस प्रक्रिया को व्युत्पादन तथा जब शब्दरूपों का निर्माण किया जाता है तो इस प्रक्रिया को रूपप्रसाधन कहते हैं। अतः निर्मित शब्दों के संबंध में हम कह सकते हैं कि किसी भी निर्मित शब्द के दो अर्थपूर्ण खंड किए जा सकते हैं- प्रकृति और प्रत्यय। प्रत्यय को यहाँ अंग्रेजी के Affix के पर्याय के रूप में समझना चाहिए, जिसमें उपसर्ग (Prefix), मध्य प्रत्यय (Infix) और प्रत्यय (Suffix) तीनों आ जाते हैं।

उदाहरण-

उपकार = उप + कार

मानवता = मानव + ता

 

संक्षेप में, प्रकृति और प्रत्यय में अंतर करते हुए हम कह सकते हैं कि 'प्रकृति' शब्द का वह लघुतम भाग है जिसका अपना कोशीय अर्थ’ (Lexical Meaning) होता है। आधुनिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से इसे हम मुक्त रूपिम’ (Free Morpheme) के रूप में समझ सकते हैं । इसी प्रकार प्रत्यय शब्द यहां पर बद्ध रूपिम (Bound Morpheme) का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका स्वतंत्र अर्थ को धारण करने वाली इकाई के रूप में प्रयोग नहीं होता, बल्कि अर्थपूर्ण शब्दों से ही नए शब्दों या शब्दरूपों का निर्माण करने में प्रयोग होता है। हिंदी के संदर्भ में इसमें उपसर्ग और प्रत्यय दोनों आ जाते हैं।

प्रकृति के अंतर्गत आने वाले कुछ शब्द इस प्रकार से देखे जा सकते हैं-

गाय, आना, खाना, चल, तुम, कुत्ता, पर आदि।

प्रत्यय के अंतर्गत उपसर्ग और प्रत्यय दोनों प्रकार के शब्दांश आते हैं, जैसे-

उपसर्ग - अ, अन, कु, वि, उप ... आदि।

प्रत्यय - इया, , करण, आवट, आहट आदि।

Sunday, December 11, 2022

गुस्सा और रिएक्शन

दैनिक भास्कर से साभार...