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Thursday, March 12, 2026
चैटजीपीटी और गूगल gemini पर प्रो. धनजी प्रसाद
प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
Professor, Kendriya Hindi Sansthan, Agra
(Managing Director : Ms. Ragini Kumari)
Thursday, February 26, 2026
पद परिचय
परीक्षा
1. आज डाइट, लेह में *व्याख्यान* का अंतिम दिन होगा।
2. 12 *दिनों* के लिए आयोजित यह कार्यक्रम *अत्यंत उपयोगी* रहा।
3. सभी *प्रतिभागियों* ने इसमें *अवश्य* कुछ ना कुछ नया सीखा है।
4. जिस *तन्मयता* से आप लोगों ने *सीखा* है उसी तन्मयता से अपने विद्यार्थियों को भी *सिखाएँ* ।
5. आप *सभी* के साथ *मिलकर* मुझे बहुत अच्छा लगा।
ऊपर दिए गए वाक्यों में बोल्ड किए हुए शब्दों का पद परिचय लिखें।
प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
Professor, Kendriya Hindi Sansthan, Agra
(Managing Director : Ms. Ragini Kumari)
Thursday, February 12, 2026
अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान (Interdisciplinary Linguistics) क्या है?
भाषा मानव बुद्धि के साथ सहजात रूप से जुड़ी हुई शक्ति है। यह शक्ति बुद्धि का
एक भाग भी है और बुद्धि विकास तथा संचरण की वाहक भी। भाषा ही मानव मस्तिष्क को
विचार करने तथा उसे एक-दूसरे के साथ संप्रेषित करने की क्षमता प्रदान करती है। इस
कारण भाषा को जानने-समझने का कार्य स्वतंत्र विषय मात्र के रूप में नहीं रहता, बल्कि यह मानव बुद्धि और ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों से सहज रूप से जुड़
जाता है। भाषाविज्ञान में मानव भाषाओं की व्यवस्था, संरचना और प्रकार्य का जो आधारभूत अध्ययन किया जाता है, उसे हम सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के रूप में जानते हैं। इस अध्ययन का अनुप्रयोग
जिन विविध क्षेत्रों में होता है, वे अनुप्रयोग क्षेत्र
कहलाते हैं। इस आधार पर भाषाविज्ञान के मूलत: दो प्रकार किए जाते हैं- सैद्धांतिक
भाषाविज्ञान और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान। सैद्धांतिक भाषाविज्ञान मानव भाषाओं का
केवल सैद्धांतिक अध्ययन करता है। इससे हम भाषायी इकाइयों और नियमों को तो जान लेते
हैं, किंतु उसका प्रकार्यात्मक और व्यावहारिक पक्ष अभी भी अधूरा रहता है। भाषा मानव
मस्तिष्क,
समाज और ज्ञान-विज्ञान के जिन क्षेत्रों से अपने आप को
जोड़ती है,
उनके साथ मिलकर किया जाने वाला अध्ययन ही इसे संपूर्णता
प्रदान करता है। इस कारण भाषा अध्ययन का एक अन्य पक्ष भी उभर कर सामने आता है-
जिसे हम अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान के रूप में जानते हैं। पारंपरिक रूप से इसे
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत ही रखा जाता रहा है। रवींद्रनाथ श्रीवास्तव
आदि भारतीय भाषावैज्ञानिकों ने भी अपनी पुस्तकों में इस पद्धति का अनुसरण किया है।
इस वर्णन में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के ही दो पक्ष किए जाते हैं- व्यावहारिक
अनुप्रयोग तथा अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग। किंतु यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि
भाषाविज्ञान का अंतरानुशासनिक पक्ष कोई अनुप्रयोग नहीं है बल्कि यह अन्य विषयों के
साथ जुड़कर भाषा के बारे में जानने का ही एक विस्तृत उपक्रम है। यही कारण है कि यह
सैद्धांतिक भाषाविज्ञान और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के बीच में स्थापित होने वाली
एक कड़ी के रूप में प्राप्त होता है। अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान (Interdisciplinary
Linguistics) नाम इसके लिए सर्वोपयुक्त है। इसके अंतर्गत समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान,
संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान,
गणितीय भाषाविज्ञान, फॉरेंसिक
भाषाविज्ञान जैसे दर्जन भर से अधिक विषय आ जाते हैं। इन विषयों की अपनी अध्ययन
पद्धति है और इनके स्वयं के अनुप्रयुक्त पक्ष भी हैं, जैसे- क्षेत्र भाषाविज्ञान, भाषा नियोजन और भाषा
सर्वेक्षण जैसे कार्य सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के साथ-साथ समाजभाषाविज्ञान के
अनुप्रयुक्त पक्ष हैं। इसी प्रकार भाषा संबंधी विकारों का विवेचन एवं निवारण
संबंधी उपायों की खोज मनोभाषाविज्ञान का अनुप्रयुक्त पक्ष है। इससे स्पष्ट होता है
कि अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान को सैद्धांतिक और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के
समानांतर एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में ही व्याख्यायित किया जाए।
(संदर्भ : गवेषणा, 142 की भूमिका)
प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
Professor, Kendriya Hindi Sansthan, Agra
(Managing Director : Ms. Ragini Kumari)
अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान (Interdisciplinary Linguistics) का अर्थ
अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान (Interdisciplinary Linguistics) का अर्थ है–
भाषा और संबद्ध क्षेत्रों के बारे में ‘भाषाविज्ञान’ और ‘अन्य विषयों’ के साथ मिलकर अध्ययन करना। इसमें भाषा केवल एक स्वायत्त तंत्र (Independent
System) के रूप में नहीं देखी जाती, बल्कि यह समझने का प्रयास किया जाता है कि भाषा मानव मस्तिष्क, समाज और जीवन के विभिन्न पहलुओं से किस प्रकार संबंधित है और
ये एक-दूसरे को किस प्रकार से प्रभावित करते हैं।
सरल शब्दों में- जब भाषाविज्ञान को
मनोविज्ञान,
समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, नृविज्ञान,
कंप्यूटर विज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान, शिक्षा आदि अन्य संबंधित विषयों के साथ जोड़कर अध्ययन किया जाता है, तो इस प्रकार विकसित भाषाविज्ञान के क्षेत्र को ‘अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान’ कहते हैं।
इसमें भाषा को केवल व्याकरण और संरचना तक सीमित न मानकर, मानव जीवन और ज्ञान-विज्ञान के अन्य क्षेत्रों से जोड़कर व्यापक दृष्टिकोण से
समझने का प्रयास किया जाता है।
उदाहरण –
§ मनोभाषाविज्ञान (Psycholinguistics):
भाषा और मानव मस्तिष्क का संबंध।
§ समाजभाषाविज्ञान (Sociolinguistics):
भाषा और समाज का संबंध।
§ नृभाषाविज्ञान (Anthropological
linguistics): भाषा और संस्कृति/नृविज्ञान का अध्ययन।
§ तंत्रिका-भाषाविज्ञान (Neurolinguistics): भाषा और मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं का अध्ययन।
§ संगणनात्मक भाषाविज्ञान (Computational linguistics): भाषा और कंप्यूटर/कृत्रिम बुद्धि का संबंध।
आदि।
प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
Professor, Kendriya Hindi Sansthan, Agra
(Managing Director : Ms. Ragini Kumari)

