अधिक से अधिक संख्या में इस कार्यक्रम में जुड़ें।
व्हाट्सएप समूह का लिंक :
https://chat.whatsapp.com/HI9JbDd8UV42rL5XALje3K?s=cl&p=a&ilr=1
व्हाट्सएप समूह का लिंक :
https://chat.whatsapp.com/HI9JbDd8UV42rL5XALje3K?s=cl&p=a&ilr=1
प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
Professor, Kendriya Hindi Sansthan, Agra
(Managing Director : Ms. Ragini Kumari)
पूरा पढ़ें:
प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
Professor, Kendriya Hindi Sansthan, Agra
(Managing Director : Ms. Ragini Kumari)
अष्टाध्यायी पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का मूल और अत्यंत व्यवस्थित ग्रंथ है। इसका नाम ही इसकी संरचना बताता है—यह आठ अध्यायों (अष्ट + अध्याय) में विभाजित है। प्रत्येक अध्याय आगे चार-चार पादों में विभक्त है। इस प्रकार कुल 32 पाद हैं।
| स्तर | संख्या | विवरण |
|---|---|---|
| अध्याय (अध्याय) | 8 | प्रत्येक अध्याय में 4 पाद |
| पाद | 32 | प्रत्येक अध्याय के 4 खंड |
| सूत्र | लगभग 4,000 | परंपरागत रूप से लगभग 3959 सूत्र माने जाते हैं |
| मुख्य उद्देश्य | — | संस्कृत के रूप, शब्द और वाक्य-व्यवहार के नियमों का निरूपण |
इसकी संरचना को संक्षेप में ऐसे समझ सकते हैं:
अष्टाध्यायी → 8 अध्याय → प्रत्येक में 4 पाद → कुल 32 पाद → लगभग 4000 सूत्र
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अष्टाध्यायी को आधुनिक पाठ्यपुस्तक की तरह विषयवार अध्यायों में नहीं बाँटा गया है। एक ही व्याकरणिक प्रक्रिया के नियम अलग-अलग अध्यायों में आ सकते हैं, और पूर्ववर्ती सूत्रों का अधिकार/अनुवृत्ति बाद के सूत्रों तक चलता है।
प्रथम अध्याय में पाणिनि व्याकरण की आधारभूत तकनीकी संज्ञाएँ और नियम स्थापित करते हैं।
महत्त्वपूर्ण विषय:
उदाहरण:
1.1.1 वृद्धिरादैच्।
1.1.2 अदेङ् गुणः।
इनसे वृद्धि और गुण जैसी पाणिनीय संज्ञाएँ निर्धारित होती हैं।
द्वितीय अध्याय में मुख्यतः पदों के पारस्परिक संबंध, कारक और समास से संबंधित नियम आते हैं।
प्रमुख विषय:
इस अध्याय का एक अत्यंत प्रसिद्ध सूत्र है:
2.1.1 समर्थः पदविधिः।
यह समास-प्रक्रिया की आधारभूत अवधारणा से संबंधित है।
तृतीय अध्याय पाणिनीय व्याकरण में शब्द-निर्माण (derivation) की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
प्रमुख विषय:
उदाहरण के लिए:
पठ् + ति → पठति
जैसी क्रिया-व्युत्पत्तियों को समझने में इस अध्याय के नियम महत्त्वपूर्ण हैं।
चतुर्थ अध्याय में मुख्यतः तद्धित प्रत्ययों का विधान है।
तद्धित प्रत्यय प्रातिपदिक से नए शब्द बनाने में प्रयुक्त होते हैं।
उदाहरण के रूप में:
कुरु → कौरव
जैसी व्युत्पत्तियों को तद्धित-प्रक्रिया के संदर्भ में समझा जाता है।
प्रमुख विषय:
पंचम अध्याय भी मुख्यतः तद्धित प्रत्ययों को समर्पित है।
इसमें विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त होने वाले प्रत्ययों का विस्तृत विधान मिलता है।
इस प्रकार:
अध्याय 4 + अध्याय 5 = तद्धित-प्रकरण का प्रमुख क्षेत्र
लेकिन दोनों अध्यायों में विषय-विन्यास पूरी तरह आधुनिक “एक अध्याय = एक विषय” शैली का नहीं है।
षष्ठ अध्याय पाणिनीय व्याकरण की ध्वन्यात्मक एवं रूपात्मक प्रक्रियाओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
प्रमुख विषय:
उदाहरण:
इकः → गुण/वृद्धि संबंधी प्रक्रियाएँ
इसी अध्याय में 6.1.77 इको यणचि जैसा प्रसिद्ध सूत्र आता है।
सप्तम अध्याय में भी मुख्यतः अङ्ग (stem/base) में होने वाले परिवर्तन तथा प्रत्ययों के कारण होने वाली प्रक्रियाएँ आती हैं।
प्रमुख विषय:
यह अध्याय वास्तविक शब्द-व्युत्पत्ति की प्रक्रिया समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
अष्टम अध्याय मुख्यतः ध्वनि-परिवर्तन, संधि और पदान्त संबंधी प्रक्रियाओं से जुड़ा है।
प्रमुख विषय:
अष्टाध्यायी के अंतिम सूत्रों तक पहुँचते-पहुँचते व्याकरणिक derivation में उत्पन्न ध्वनि-रूप को अंतिम रूप दिया जाता है।
अष्टाध्यायी को केवल “आठ अध्यायों में रखे गए लगभग 4000 स्वतंत्र नियम” समझना सही नहीं होगा।
यह एक अत्यंत परस्पर-संबद्ध rule system है।
इसमें प्रमुख रूप से निम्न तकनीकें काम करती हैं:
किसी सूत्र का प्रभाव आगे के अनेक सूत्रों तक चलता है।
पूर्ववर्ती सूत्र का कोई पद या शर्त बाद के सूत्र में बिना दोहराए समझी जाती है।
माहेश्वर सूत्रों से बने संक्षिप्त संकेतों द्वारा वर्ण-समूहों को व्यक्त किया जाता है।
जैसे:
अच् = स्वर
हल् = व्यंजन
कुछ वर्ण केवल व्याकरणिक operation को संकेतित करते हैं; वे अंतिम रूप में नहीं रहते।
किसी वर्ण/प्रत्यय/रूप के स्थान पर दूसरा रूप स्थापित करना।
किसी तत्व का व्याकरणिक प्रक्रिया में लुप्त होना।
किसी एक व्याकरणिक इकाई के गुण/धर्म को दूसरी इकाई पर लागू करना।
आपकी NLP/Computational Linguistics रुचि को देखते हुए अष्टाध्यायी की संरचना को इस दृष्टि से देखना विशेष उपयोगी है।
एक सरल मॉडल:
Input
↓
धातु / प्रातिपदिक
↓
संज्ञा निर्धारण
↓
प्रत्यय चयन
↓
अधिकार + अनुवृत्ति
↓
आदेश / लोप / आगम
↓
गुण / वृद्धि / संधि आदि
↓
रूप-परिवर्तन
↓
Final Sanskrit Word
उदाहरण के लिए किसी क्रिया-रूप की व्युत्पत्ति में:
धातु → प्रत्यय → इत्संज्ञा → लोप → अङ्गकार्य → गुण/वृद्धि → संधि → अंतिम शब्द
इस दृष्टि से पाणिनि की प्रणाली को rule-based formal grammar के एक अत्यंत प्राचीन और sophisticated उदाहरण के रूप में अध्ययन किया जा सकता है।
अष्टाध्यायी को अकेले पढ़ना कठिन है। इसकी व्याख्या और प्रयोग की परंपरा में कुछ ग्रंथ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं:
पाणिनि
↓
अष्टाध्यायी
↓
कात्यायन — वार्तिक
↓
पतञ्जलि — महाभाष्य
↓
जयादित्य एवं वामन — काशिकावृत्ति
↓
भट्टोजिदीक्षित — सिद्धान्तकौमुदी
↓
वरदराज — लघुसिद्धान्तकौमुदी
इसलिए पाणिनीय व्याकरण का अध्ययन करते समय अष्टाध्यायी + महाभाष्य + काशिका + सिद्धान्तकौमुदी को एक परंपरा के रूप में देखना अधिक उपयोगी है।
(यहाँ तक का स्रोत : चैटजीपीटी)
...........................................................................
अष्टाध्यायी सूत्रपाठ को इस लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं-
अष्टाध्यायी प्रकाशिका :
अष्टाध्यायी भाष्य :
अष्टाध्यायी के स्वरूप की एक आभा प्रस्तुत करने के लिए इस
ग्रंथ के प्रत्येक अध्याय के प्रथम 05 और अंतिम 05 सूत्र क्रम से दिए जा रहे हैं-
अध्याय-01
अध्याय-02
अध्याय-03
अध्याय-04
अध्याय-05
अध्याय-06
अध्याय-07
अध्याय-08
प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
Professor, Kendriya Hindi Sansthan, Agra
(Managing Director : Ms. Ragini Kumari)
माहेश्वर सूत्र (Māheśvara Sūtras) पाणिनीय व्याकरण की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण आधारभूत व्यवस्था है। इनके माध्यम से संस्कृत के वर्णों को वैज्ञानिक और संक्षिप्त ढंग से वर्गीकृत किया गया है। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में प्रत्याहार बनाने के लिए इन सूत्रों का उपयोग किया है।
14 माहेश्वर सूत्र
परंपरा
के अनुसार ये सूत्र भगवान शिव के डमरू-नाद से प्रकट हुए माने जाते हैं—
|
क्रम |
माहेश्वर सूत्र |
प्रत्याहार-संकेत |
|
1 |
अ इ उ ण् |
अण् |
|
2 |
ऋ ऌ क् |
ऋक् |
|
3 |
ए ओ ङ् |
एङ् |
|
4 |
ऐ औ च् |
ऐच् |
|
5 |
ह य व र ट् |
हयवरट् |
|
6 |
ल ण् |
लण् |
|
7 |
ञ म ङ ण न म् |
ञमङणनम् |
|
8 |
झ भ ञ् |
झष् |
|
9 |
घ ढ ध ष् |
घष् |
|
10 |
ज ब ग ड द श् |
जश् |
|
11 |
ख फ छ ठ थ च ट त व् |
खफछठथचटतव् |
|
12 |
क प य् |
कपय् |
|
13 |
श ष स र् |
शर् |
|
14 |
ह ल् |
हल् |
इनमें विशेष क्या है?
प्रत्येक
सूत्र के अंत में आने वाले ण्, क्, ङ्, च्, ट्, म्, ञ्, ष्, श्, व्, य्, र्, ल् आदि वर्णों को इत् (अनुबन्ध) कहा
जाता है। ये वास्तविक वर्ण-सूची का हिस्सा नहीं माने जाते, बल्कि सीमा-सूचक का
काम करते हैं।
इन्हीं
की सहायता से
प्रत्याहार बनाए जाते हैं।
उदाहरण: ‘अच्’
प्रत्याहार
पहले
सूत्र के अ से
लेकर चौथे सूत्र के अंतिम इत् च् तक के वर्ण लेने पर—
अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ
मिलते
हैं। इसलिए अच् = सभी स्वर।
इसी
प्रकार—
पाणिनीय व्याकरण में
महत्त्व
माहेश्वर
सूत्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बहुत कम संकेतों में
वर्णों के बड़े-बड़े समूहों को व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए,
अष्टाध्यायी में बार-बार “सभी स्वर” या “सभी
व्यंजन” लिखने के बजाय पाणिनि अच् और हल् जैसे
प्रत्याहारों का प्रयोग करते हैं।
स्रोत : चैटजीपीटी
………………..
प्रोफेसर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
Professor, Kendriya Hindi Sansthan, Agra
(Managing Director : Ms. Ragini Kumari)