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Friday, September 24, 2021

संज्ञान (Cognition) का स्वरूप

 संज्ञान का स्वरूप

संज्ञान उस संपूर्ण प्रक्रिया या प्रक्रियात्मक इकाई का नाम है, जो मानव मन को बाह्य संसार से जोड़ती है। इसके अंतर्गत मानव मस्तिष्क में जानने, विचार करने, समझने, अनुभव करने आदि से संबंधित वे सभी चीजें आ जाती हैं, जो किसी व्यक्ति के बाह्य संसार या परिवेश के साथ काम करने में सहायक होती हैं। अतः इसमें अनुभव और बुद्धि दोनों पक्ष आ जाते हैं। इस कारण हमारा ज्ञान, बोध, स्मृति, तर्क और निर्णय भी संज्ञान के अंग होते हैं। संज्ञान के क्षेत्र में मुख्य रूप से 20वीं शताब्दी में बहुत अधिक कार्य किया गया है और संज्ञानात्मक विज्ञान का तेजी से विकास हुआ है। चूँकि भाषा इससे सीधे-सीधे संबंधित है, इस कारण संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान के क्षेत्र में भी पिछले कुछ वर्षों में बहुत अधिक कार्य हुआ है।

https://www.slideshare.net/scaruffi/tat1-47012477 देखना है।

संज्ञान (Cognition) की कुछ परिभाषाएँ-

1. James B. Brewer, ... Allyson C. Rosen, in Textbook of Clinical Neurology (Third Edition), 2007 के अनुसार-

“Cognition refers to the mental processes of knowing, including highlevel perception, language, and reasoning.”

2. John F. Kihlstrom, in Reference Module in Neuroscience and Biobehavioral Psychology, 2018

“Cognition encompasses the mental functions by which knowledge is acquired, retained, and used: perception, learning, memory, and thinking.”

3. https://www.britannica.com/topic/cognition-thought-process में कहा गया है-

“Cognition includes all conscious and unconscious processes by which knowledge is accumulated, such as perceiving, recognizing, conceiving, and reasoning. Put differently, cognition is a state or experience of knowing that can be distinguished from an experience of feeling or willing.”

इस प्रकार स्पष्ट है कि संज्ञान मानव मन का वह भाग है जिसमें बाह्य संसार से सूचनाओं का संग्रह संसाधन और अंतरक्रिया होती है। अतः इसमें मानव मन और मस्तिष्क की अनेक युक्तियाँ लगी होती हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख को सूचीबद्ध रूप से आगे देख सकते हैं।

संज्ञान की युक्तियाँ (Devices of Cognition)

§  स्मृति (memory)

§  ध्यान (attention)

§  भाषा (language)

§  बोधन (perception)

§  संकल्पना निर्माण (concept formation)

§  पैटर्न अभिज्ञान (pattern recognition)

§  कार्य (action)

§  तर्क और निर्णय (logic and decision)

§  समस्या निवारण (problem solving)

इन सभी में एक सबसे महत्वपूर्ण युक्ति भाषा है। संज्ञान और भाषा के संदर्भ में विस्तार से आगे चर्चा की जाएगी।

संज्ञान के संबंध में दो बातें स्पष्ट है कि यह उन युक्तियों का समुच्चय है जिनके माध्यम से प्राणी बाह्य संसार से इनपुट प्राप्त करते हैं और उसके प्रति अनुक्रिया (response) करते हैं। इस संबंध में चेतना (Consciousness) की संकल्पना भी महत्वपूर्ण है। चेतना प्राणियों को उनके अस्तित्व का बोध कराती है। इस बोध में अपने संज्ञान का बोध भी समाहित है। चेतना  का अनुभव करने के संदर्भ में ध्यान, तपस्या आदि माध्यमों की बात की जाती है। इस संबंध में भारतीय मनीषियों द्वारा अनेक प्रकार के उपक्रम किए गए हैं। पश्चिम में भी आधुनिक काल में इस दिशा में पर्याप्त अध्ययन-विश्लेषण का काम हुआ है। 

Craik (1943) द्वारा संज्ञान संबंधी युक्तियों को इस प्रकार से दर्शाया गया है-

 इसमें मानव मस्तिष्क में प्रतीक परत संसाधन संबंधित बात देखी जा सकती है जो मनुष्य के पास भाषा के रूप में होती है। 

मानव मन में संज्ञान संबंधी युक्तियों को मशीनी दृष्टि से समझने-समझाने या निरूपित करने के लिए ज्ञान निरूपण (Knowledge Representation) की बात की गई है। 

व्यापक स्तर पर संज्ञान को पदार्थ का एक सामान्य गुण कहा गया है जो सीखने और याद करने की क्षमता से युक्त होता है तथा स्थिति के अनुसार अनुक्रिया करने में सक्षम होता है।  कुछ विद्वानों द्वारा ऐसा माना जाता है कि प्रकृति प्रदत्त सभी चीजों में किसी न किसी स्तर पर संज्ञान होता है।  प्राणियों में यह अपने सर्वोच्च रूप में होता है।

संदर्भ-

https://www.slideshare.net/scaruffi/tat1-47012477

संज्ञानात्मक विज्ञान (Cognitive Science)

 संज्ञानात्मक विज्ञान (Cognitive Science)

संज्ञानात्मक विज्ञान वह विज्ञान है, जिसके अंतर्गत मानव संज्ञान से संबंधित सभी पक्षों का अध्ययन किया जाता है। संज्ञान मानव मन का एक भाग है, जो बाह्य संसार के मन में बोधन और उन पर की जाने वाली समस्त प्रकार की क्रियाओं से संबंधित है। अतः संज्ञानात्मक विज्ञान उन सभी क्रियाओं और उन क्रियाओं को संपन्न करने के लिए लगने वाली युक्तियों का अध्ययन करता है।

संज्ञानात्मक विज्ञान की विषय वस्तु के अंतर्गत निम्नलिखित बातों का मुख्य रूप से समावेश किया जाता है-

·       मानव संज्ञान के स्वरूप एवं स्थिति का विश्लेषण तथा विवेचन।

·       मानव संज्ञान की प्रकृति और उसके द्वारा संपन्न किए जाने वाले कार्यों का अध्ययन।

·       मानव संज्ञान के अंतर्गत आने वाली मन की युक्तियों का अध्ययन, जिसके अंतर्गत मानव बुद्धि, तर्क, ज्ञानेंद्रियों द्वारा बोधन आदि सभी प्रकार की बातें आती है।

 संज्ञानात्मक विज्ञान मूलतः इस बात पर केंद्रित होता है कि हम बाह्य संसार से प्राप्त ज्ञान के आधार पर सूचनाओं का निर्माण और उनका आदान-प्रदान कैसे करते हैं और उनमें कौन-कौन सी मानसिक युक्तियँ या इकाइयाँ काम करती हैं। अतः इसमें मनुष्य की समझने और अभिव्यक्त करने की प्रक्रियाओं का भी अध्ययन किया जाता है।

वैसे तो संज्ञानात्मक विज्ञान मनोविज्ञान का एक क्षेत्र जान पड़ता है, किंतु वास्तव में यह एक विस्तृत अंतरानुशासनिक विषय है, जिसमें अध्ययन की संपूर्णता के लिए निम्नलिखित विषयों की आवश्यकता पड़ती है-

मनोविज्ञान (psychology), भाषाविज्ञान (linguistics), दर्शनशास्त्र (philosophy), न्यूरोशास्त्र (neuroscience), नृविज्ञान/मानवशास्त्र (anthropology) आदि।

 वर्तमान संदर्भ में तकनीकी अनुप्रयोग की दृष्टि से देखा जाए तो कृत्रिम बुद्धि (artificial intelligence-AI) के क्षेत्र में संज्ञानात्मक विज्ञान और इसके अध्ययन से प्राप्त ज्ञान सामग्री की अत्यधिक उपयोगिता रही है। कृत्रिम बुद्धि का उद्देश्य मानव बुद्धि की प्रकृति को समझना और उसकी युक्तियों को मशीन में स्थापित करना है, जिसके माध्यम से मशीन द्वारा भी मानव बुद्धि संबंधी कार्य संपन्न कराए जा सकें। संज्ञानात्मक विज्ञान द्वारा किए गए अध्ययन से प्राप्त ज्ञान इसमें अत्यंत उपयोगी होता है। अतः तकनीकी दृष्टि से की मांग पिछले कुछ दशकों में बहुत तेजी से बढ़ी है।

संज्ञानात्मक विज्ञान में संज्ञानके लिए ‘Cognitive faculty’ पारिभाषिक शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। अतः ‘Cognitive faculty’ की दृष्टि से संज्ञानात्मक विज्ञान में यह विचार का विषय होता है कि ‘Cognitive faculty’ का अस्तित्व किस रूप में है? क्या यह स्वतंत्र है या मन की अन्य इकाइयों से संबद्ध है? यदि हाँ तो किस रूप में। सभी प्राणियों के मस्तिष्क या मन में ‘Cognitive faculty’ की भूमिका को देखते हुए क्या उन्हें ‘cognitive systems’ कहा जा सकता है?

संज्ञान और भाषा (Cognition and Language)

 संज्ञान और भाषा (भाषा अर्जन, भाषा अधिगम, भाषा बोधन और भाषा उत्पादन में संज्ञान की भूमिका)

संज्ञान और भाषा के संबंध में कहा जा सकता है कि संज्ञान वह आधारभूत इकाई है जिसमें भाषा का अस्तित्व होता है या जिसके लिए भाषा की आवश्यकता होती है।  इसी प्रकार भाषा वह माध्यम है जिसके  द्वारा संज्ञान की युक्तियां सफलतापूर्वक संचालित होती हैं।  संज्ञान नामक युक्ति सभी प्राणियों में किसी न किसी रूप में पाई जाती है। सभी प्राणी वही संसार के साथ  अपने अपने स्तर से अंतर क्रिया करते हैंजिसके पीछे संज्ञान की शक्ति ही काम करती है।  अतः कहा जा सकता है कि उन सभी के पास उद्दीपन और अनु क्रियाओं के लिए निर्मित भाषा जैसी संकेत व्यवस्था होती है।  संकेत व्यवस्था का सर्वोत्तम रूप मानव भाषा के रूप में निकल कर सामने आता है अतः जब हम संज्ञान और भाषा की बात करते हैं तो मूलतः मानव  संज्ञान को केंद्र में रखकर ही करते हैं।  इसमें हम यह देखने का प्रयास करते हैं कि मानव प्राणियों में संज्ञान की युक्तियां किस प्रकार से काम करती हैं उनमें भाषा की क्या भूमिका होती हैतथा भाषा संबंधी क्रियाकलापों के संपादन में संज्ञान की युक्तियां किस प्रकार प्रभावी होती हैं?

भाषा के संबंध में संज्ञान की स्थिति को 'भाषा अर्जन, भाषा अधिगम, भाषा बोधन और भाषा उत्पादनआदि में संज्ञान की भूमिका  की दृष्टि से देखा जा सकता है।  इनमें भाषा अर्जन की दृष्टि से संज्ञान की भूमिका पर अनेक विद्वानों द्वारा काम किया गया है जिनमें पियाजे का नाम उल्लेखनीय है उनके द्वारा बताए गए भाषा विकास के चरणों और संज्ञान को हम आगे देखेंगे।

 भाषा अर्जन में संज्ञानात्मक युक्तियों की विशेष भूमिका होती है। बिना संज्ञानात्मक युक्तियों का प्रयोग किए मानव शिशु द्वारा भाषा अर्जन संभव नहीं है।  एक और संज्ञान भाषा अर्जन को संभव बनाता है तो दूसरी ओर भाषा संज्ञान की सभी युक्तियों को अपने सर्वोच्च रूप में कार्य करने के लिए संकेतों की व्यवस्था प्रदान करती है।  अतः भाषा और संज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

 भाषा अधिगम की दृष्टि से संज्ञान पर विचार किया जाए तो हम जानते हैं कि भाषा अधिगम भाषा अर्जन के बाद की प्रक्रिया है।  मानव शिशु सर्वप्रथम अपने समाज या परिवेश से अपनी मातृभाषा का अर्जन कर लेता है और उनमें वह सुनना तथा बोलना स्वाभाविक रूप से सीख लेता है।  जब औपचारिक रूप से भाषा शिक्षण किया जाता है तो वह अपनी मातृभाषा या प्रथम भाषा के संदर्भ में लेखन और पठन कौशलों का विकास करता है तथा अपनी भाषा क्षमता मेंं विविध ज्ञान क्षेत्रों या ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से अभिवृद्धि करता है। अतः भाषा अधिगम के माध्यम से संज्ञानात्मक युक्तियों की क्षमता का परिमार्जन होता है अर्थात वह अपने प्रारंभिक रूप से अधिक सक्षम हो जाती हैं।

 जब द्वितीय भाषा या तृतीय भाषा या विदेशी भाषा आदि का अधिगम होता है तो उसे संज्ञान  संबंधी क्षमता पर कोई बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता।  संकेतों की व्यवस्था से संबंधित इकाई का परिवर्धन हो जाता है कि अपनी बात को कहने के लिए संकेतों की एक प्रणाली के बजाए व्यक्ति के पास एक से अधिक प्रणालियां उपलब्ध हो जाती हैं।  उदाहरण के लिए यदि कोई हिंदीभाषी व्यक्ति अंग्रेजी भी सीख लेता है तो वह संज्ञानात्मक दृष्टि से कोई नया कौशल नहीं प्राप्त कर लेता बल्कि अपनी बात को अभिव्यक्त करने के लिए एक दूसरी संकेत व्यवस्था भी प्राप्त कर लेता है। संज्ञान का संबंध बाह्य संसार के साथ अंतर क्रिया से है जैसे प्यास लगने पर पानी मांगना।  यदि व्यक्ति को केवल हिंदी ही आती है तो वह केवल हिंदी में पानी मांगेगा, अंग्रेजी फ्रेंच जर्मन जापानी आदि सीख लेने पर उन भाषाओं में भी मांग लेगा। अतः भाषा की दृष्टि से उसके पास विकल्पों में वृद्धि हो जाएगी पानी मांगने की क्षमता में कोई वृद्धि नहीं होगी। 

भाषा बोधन और भाषा उत्पादन के संदर्भ में संज्ञान

 संज्ञान का मूल संबंध बाह्य संसार के ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से बोधन और उनके प्रति अनुक्रिया से है।  भाषा इसमें एक नई (layer)  प्रदान कर देती है जहां बाह्य संसार के अनुभव के आधार पर मन में एक अमूर्त आर्थी संसार (semantic world) निर्मित हो जाता है। इस आर्थी संसार को हम संज्ञानात्मक संसार (cognitive world) भी कह सकते हैं।  वर्तमान में तकनीकी अनुप्रयोग के क्षेत्र में इस संसार को विश्लेषण करने के विभिन्न प्रयास किए गए हैं जिन्हें हम ज्ञान निरूपण/ प्रतिरूपण (Knowledge Representation) के नाम से जानते हैं। 

भाषा अपने प्रतीकों की व्यवस्था और अमूर्त संकल्पना ओं के माध्यम से जो संसार निर्मित करती है उससे हमें यह सुविधा हो जाती है कि कोई व्यक्ति स्वयं से संबंधित अपने विचारों भाव या सूचनाओं को भाषाई प्रतीकों की ध्वन्यात्मक व्यवस्था में बांधकर दूसरे व्यक्ति तक पहुंचा सकता है। भाषाई प्रतीकों की व्यवस्था के इसी समस्या को संरचना की दृष्टि से वाक्य कहते हैं। वाक्य ध्वनि प्रतीकों का वह सबसे छोटा व्यवस्थित समुच्चय है जिसमें कम से कम एक सूचना रहती है। इस स्तर पर संज्ञान का काम ( श्रोता की दृष्टि से) उन प्रतीकों में छुपी सूचना को डिकोड करना, और वक्ता की दृष्टि से मन में उठने वाले विचारों, भावों या सूचनाओं को ध्वनि प्रतीकों में इनकोड करना होता है। अतः इन दोनों में ही संज्ञान की आधारभूत भूमिका होती है।  बिना संज्ञान के इनमें से किसी भी प्रक्रिया का संपन्न होना संभव नहीं है।

संज्ञान और मन (Cognition and Mind)

 संज्ञान और मन (Cognition and Mind)

मानव मस्तिष्क की प्रक्रियाओं से निर्मित अमूर्त इकाई को सामूहिक रूप से मननाम दिया गया है। इसे कंप्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम की तरह समझ सकते हैं, जिसे देखा तो नहीं जा सकता है किंतु यही संपूर्ण शरीर के सभी अंगों को परस्पर संबद्ध करके रखता है सभी प्रकार के कार्यों के संपन्न करने का माध्यम या स्रोत होता है।

संज्ञान की दृष्टि से मनकी स्थिति पर विचार किया जाता है कि क्या मन और संज्ञान दो भिन्न-भिन्न इकाइयाँ हैं या एक ही इकाई के दो रूप या दो नाम है?

इसी प्रकार मन और संज्ञान और चेतना(Consciousness) से भी जोड़कर देखा जाता है और यह जानने का प्रयास किया जाता है कि ये दोनों इकाइयाँ चेतना से किस प्रकार से संबद्ध हैं। चेतना के निम्नलिखित मुख्य पक्षों की बात की जाती है-

·       स्वयं और दूसरे के अस्तित्व का बोध

·       बाह्य परिवेश (समय और स्थान) का बोध

·       इच्छा और क्रिया

इस क्रम में बुद्धि (intelligence) दृष्टि से भी मन और संज्ञान पर विचार भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है, जो वर्तमान में तकनीकी अनुप्रयोग की दृष्टि से कृत्रिम बुद्धि (AI) के क्षेत्र में गंभीर विचार का विषय हो चुका है। इस दिशा में कार्य कर रहे सभी विद्वानों द्वारा इसके विविध पक्षों पर सूक्ष्म कार्य किया जा रहा है।

संज्ञान और मन के संदर्भ में शरीर

शरीर किसी भी प्राणी से संबद्ध वह भौतिक वस्तु है, जिसका पदार्थ के रूप में अस्तित्व होता है और विभिन्न अंगों के माध्यम से गठित होता है। इसी शरीर में भौतिक रूप से मस्तिष्क नामक इकाई होती है जो न्यूरानों द्वारा निर्मित होती है और जिसमें सभी प्रकार की मन और संज्ञान संबंधी गतिविधियाँ संचालित होती हैं। अतः मन और संज्ञान की स्थिति को शरीर के संदर्भ में भी देखा जाता है। पदार्थ और रूप की दृष्टि से कुछ विद्वानों के लिए यह विवाद का विषय रहा है कि मन की सत्ता भौतिक है या अमूर्त। यदि मन की सत्ता है तो क्या यह शरीर के अंदर रहता है या केवल शरीर से संबद्ध रहता है?

इस संबंध में पश्चिम में एक बड़ी अवधारणा प्रचलित रही है जिसे द्वैतवाद (Dualism) कहते हैं। इस धारा के अनुसार मन और शरीर दो भिन्न-भिन्न पदार्थों से बनी हुई चीजें हैं। इस धारा के विद्वानों में प्रमुख नाम देकार्ते का है। मस्तिष्क की स्थिति को समझाते हुए देकार्ते कहते हैं -

The brain is the seat of the body-mind interaction.

द्वैतवाद की धारा में यह विचार का विषय रहा है कि मन और शरीर आपस में अंतरक्रिया किस प्रकार से करते हैं?

द्वैतवाद के सापेक्ष एकलवादी दृष्टि (Monism) भी उल्लेखनीय है, जिसके दो भेद  किए जाते हैं-

 पदार्थवाद (Materialism) : यह धारा यह मानती है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल पदार्थ का ही अस्तित्व है शरीर मस्तिष्क मन आदि भी पदार्थ के रूप में ही हैं।

 विचारवाद (Idealism) :  यह धारा केवल मन की सत्ता पर भरोसा करती है। विचारधारा के प्रमुख विचारक Gottfried Leibniz अनुसार प्रत्येक वस्तु में एक मन होता है, पदार्थ से लेकर प्राणियों तक में इसके विभिन्न स्तर देखे जा सकते हैं|उनके इन विचारों को panpsychism  कहा गया है। इस क्रम में जॉर्ज बर्कले (G. Berkeley) के विचार भी देखे जा सकते हैं जिन्होंने कहा है कि हम जो भी जानते हैं वह केवल हमारी धारणा (perception) है। अतः ब्रह्मांड में उपस्थित चीजें केवल हमारे मानसिक बोध हैं।

वर्तमान में विचारवाद का विकास क्वांटम विचारवाद (quantum idealism) के रूप में भी हुआ है, जो यह मानता है कि वास्तविकता (reality) को हम समझ नहीं सकते। हमारे लिए वास्तविकता वही है जो हम देख पाते हैं या जिसका बोधन कर पाते हैं।

 इसी प्रकार त्रयवाद (Trialism)  की अवधारणा भी देखी जा सकती है।  इस संबंध में Karl Popper & John Eccles (1977) और Rudy Rucker (1982)  के विचार देखे जा सकते हैं।

मनोविज्ञान में मन की अवधारणा के संबंध में व्यवहारवाद और मनोवाद नामक दो धाराएं अत्यंत प्रचलित रही हैं। व्यवहारवाद (Behaviourism) के सबसे बड़े विद्वान जेबी वाटसन माने जाते हैं। उन्होंने मन की अवधारणा को अवैज्ञानिक बताया है और कहा है कि किसी भी प्राणी के समस्त व्यवहार को उद्दीपन-अनुक्रिया (stimulus-response) संबंधों के माध्यम से दर्शाया जा सकता है। भाषाविज्ञान के क्षेत्र में ब्लूमफील्ड व्यवहारवाद के प्रबल समर्थक रहे हैं।

मनोवाद (Mentalism) के समर्थक विद्वान मन की अवधारणा को स्वीकार करते हैं और वे यह मानते हैं कि शरीर की समस्त प्रक्रियाएँ मन द्वारा संचालित या नियंत्रित होती हैं।

इसी प्रकार प्रकार्यवाद (Functionalism) की एक धारा भी देखी जा सकती है जो यह मानती है कि मानव मन की विभिन्न स्थितियां विभिन्न प्रकार्यों से संबद्ध होती हैं। शनगढ़ की दृष्टि से इस धारा का विकास संगणकीय प्रकार्यवाद के रूप में भी हुआ है।

इस क्रम में संज्ञान संबंधी चिंतकों द्वारा संज्ञानवाद (Cognitivism) की बात की जाती है इन चिंतकों में मिलर (George Miller), ब्रॉडबेंट (Donald Broadbent) आदि का नाम उल्लेखनीय है।

 और पढ़ें- 

 संज्ञान और मन

संदर्भ-

https://www.slideshare.net/scaruffi/tat1-47012477

Wednesday, September 22, 2021

संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान (Cognitive Linguistics)

(1)    संज्ञान क्या है?

(2)     संज्ञान का स्वरूप

(3)     संज्ञानात्मक विज्ञान (Cognitive Science)

(4)    संज्ञान और भाषा (भाषा अर्जनभाषा अधिगमभाषा बोधन और भाषा उत्पादन तथा संज्ञान)

(5)    संज्ञान और मन (Cognition and Mind)

(6)    संज्ञान और मन     old

(7)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान

(8)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान : परिचय

(9)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान : परिचय prof. USU Lecture

(10)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान की विषयवस्तु

(11)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान की विषयवस्तु    English book contents

              (उक्त के अलावा भी अंग्रेजी पुस्तकें देखें)

(12)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान का इतिहास

(13)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान के संदर्भ में भाषा और व्याकरण

(14)    भाषा व्यवहार का संज्ञानात्मक पक्ष

(13)    भाषा अर्जन और संज्ञान

(14)    संज्ञानात्मक विकास के चरण : पियाजे (Jean Piaget) : Piaget's theory of cognitive development

(15)    व्याकरण के संज्ञानात्मक अभिगम (Cognitive Approaches to Grammar)

(16)    संज्ञानात्मक व्याकरण (Cognitive Grammar)

(17)    रचना व्याकरण (Construction Grammar)

(18)    शब्द व्याकरण (Word Grammar)

(19)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और अर्थविज्ञान

(20)    संज्ञान और अर्थ

(21)    आर्थी निरूपण के संज्ञानात्मक सिद्धांत

(वर्गात्मक प्रस्तुति (Categorical Representation)

(ख) रूपक’ (metaphor) और ‘रूपकीकरण’ (metonymy)

(ग) अमूर्तिकृत संज्ञानात्मक मॉडल (Idealized Cognitive ...

(घ) साँचापरक अर्थविज्ञान (Frame semantics)

(22)    अर्थ रचना और मानसिक स्थान (Meaning construction an...

(23)    सत्यता-स्थितिपरक अर्थविज्ञान (Truth-conditional se...

(24)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और भाषाविज्ञान की अन्य शाखाएँ

(25)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और मनोभाषाविज्ञान

(26)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और प्रोक्ति विश्लेषण

(27)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और प्रकरणार्थविज्ञान

(28)    संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान

(29)    बच्चों के भाषाई विकास पर स्टडी: दैनिक भास्कर

(30)    अच्छी नींद से भाषा समृद्ध होती है : दैनिक भास्कर

(31)    क्या गर्भ में ही बच्चा संस्कार सीख सकता है?

(32)    ChatGPT and Mind : Chomsky

(33)    Theories of language learning

(34)    नई भाषा सीखने में लगने वाला समय

 

संदर्भ (References):

(1)  Cognitive Linguistics : An Introduction : Evans an...

(2) Methods in Cognitive Linguistics

(3) Cognitive Linguistics

(4) Mind and Cognition: An Anthology, 3rd Edition