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Thursday, November 30, 2023

व्युत्पादक और रूपसाधक रूपविज्ञान (Derivational and Inflectional Morphology)

व्युत्पादक और रूपसाधक रूपविज्ञान (Derivational and Inflectional Morphology)

रूपविज्ञान के दो प्रकार किए जाते हैं- व्युत्पादक रूपविज्ञान (Derivational Morphology) और रूपसाधक रूपविज्ञान (Inflectional Morphology)

व्युत्पादक रूपविज्ञान का कार्यशब्दों से नए शब्दों का सृजन करना है अर्थात इसमें शब्दों के साथउपसर्ग प्रत्यय या दूसरे शब्दआदि जोड़कर नए शब्द बनाए जाते हैं अतःउत्पादक रूप विज्ञान के अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार के कार्य एवं इनसे संबंधित अध्ययन आते हैं-

§  उपसर्ग योग

§  प्रत्यय योग

§  संधि

§  समास

रूपसाधक रूपविज्ञान का संबंध शब्दरूपों (Word forms) के निर्माण से है। रूपविज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत शब्द रूपों का निर्माण किया जाता है। रूपसाधक रूपविज्ञान कहलाती है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बातें आती हैं-

§  संज्ञा शब्दों की पद (रूप) संरचना (Morph. Structur...

§  सर्वनाम शब्दों की पद (रूप) संरचना (Morph Structure...

§  क्रिया शब्दों की पद (रूप) संरचना (Morph. Structure...

§  विशेषण शब्दों की पद (रूप) संरचना (Morph. Structure...

§  अन्य शब्दों की पद (रूप) संरचना (Morph. Structure o... 

भाषाविज्ञान क्या है? (What is Linguistics?)

 भाषाविज्ञान क्या है? (What is Linguistics?)

भाषाविज्ञान वह विषय है, जिसके अंतर्गत मानव भाषाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इसमें किसी भाषा विशेष के अध्ययन पर बल नहीं दिया जाता, बल्कि भाषा मात्रा के अध्ययन पर बल दिया जाता है। इसमें ऐसे नियमों और सिद्धांतों को विकसित करने का प्रयास किया जाता है, जिनसे विश्व की किसी भी भाषा का अध्ययन किया जा सके।

(1) भाषाविज्ञान : विज्ञान या सामाजिक विषय ?

भाषाविज्ञान के संबंध में एक प्रश्न जरूर किया जाता है कि यह कोई विज्ञान की शाखा है या कोई सामाजिक विषय है? इस संबंध में भाषावैज्ञानिकों का मत है की भाषाविज्ञान न तो पूरी तरह से विज्ञान है और न ही सामाजिक विषय। बल्कि यह दोनों की संधि पर अर्थात दोनों के बीच में स्थिति विषय है।

इस दृष्टि से यही कहा जा सकता है कि भाषाविज्ञान की विश्लेषण पद्धति वैज्ञानिक है, जबकि इसकी विषयवस्तु सामाजिक हैअर्थात भाषा एक सामाजिक वस्तु हैइसे किसी प्राकृतिक पदार्थ की तरह प्रस्तुत करके नहीं दिखाया जा सकता, क्योंकि इसका संबंध मानव मन और मानव व्यवहार से है; किंतु भाषा की इकाइयों के विश्लेषण के लिए भाषाविज्ञान वैज्ञानिक नियमों और सिद्धांतों का प्रतिपादन करता हैअतःअपनी पद्धति में भाषाविज्ञान एक विज्ञान के रूप में उभरकर सामने आता है तो विषयवस्तु इसे सामाजिक विज्ञान की श्रेणी में ला देती है। इसी कारण भाषाविज्ञान पर विज्ञान और सामाजिक विषय की दृष्टि से विचार करते हुए भाषा वैज्ञानिकों द्वारा कहा गया है

भाषा विज्ञान सभी वैज्ञानिक विषयों में सबसे ज्यादा सामाजिक है तो सभी सामाजिक विषयों में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक है।

(2) भाषाविज्ञान के प्रकार (Types of Linguistics) 

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(3)  सैद्धांतिक बनाम अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान

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प्रकरणार्थविज्ञान (Pragmatics) की विषयवस्तु

 प्रकरणार्थविज्ञान (Pragmaticsकी विषयवस्तु

प्रकरणार्थविज्ञान/प्रोक्ति विश्लेषण  के अंतर्गत आने वाले कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं-

(1) प्रोक्ति क्या है?

(2) प्रोक्ति और प्रोक्ति विश्लेषण (Discourse and Discourse Analysis)

(3) प्रोक्ति और संदर्भ (Discourse and Context)

(4) प्रासंगिकता का सिद्धांत (Theory of Relevance)

(5) वार्ता के सूक्त (Maxims of Conversation)

(6) सहकारिता सिद्धांत (Cooperative Principle)

(7) वार्ता (Conversation)

(8) वाक् अभिकार्य (Speech Act)

(9) वाक् घटना (Speech Event)

(10) निहितार्थकता (Speech Act)

अर्थविज्ञान (Semantics) की विषयवस्तु

 अर्थविज्ञान (Semantics) की विषयवस्तु 

अर्थविज्ञान यह जानने का प्रयत्न करता है कि भाषा में अर्थ की क्या स्थिति है और इसकी व्यवस्था कैसे काम करती है।

(1) अर्थ क्या है? (What is meaning?)

सरल शब्दों में

कुछ कहने (अभिव्यक्त करने) पर सुनने के बाद हम जो समझते हैं वह उसका अर्थ होता है।यह वक्ता के मन से श्रोता के मन तक भाषिक अभिव्यक्तियों (वाक्यों) के माध्यम से पहुँचता है। वक्ता और श्रोता के संबंध में इसकी स्थिति निम्नलिखित है-

अर्थ’ विचारभाव या सूचना के रूप में वक्ता के मन में रहता है। भाषा उसे वाक्यों के माध्यम से श्रोता तक पहुँचाने का कार्य करती है।

 (2) शब्द और अर्थ संबंध (Word-meaning relation)

 कोई शब्द स्वनिमों (ध्वनियों) के योग से बनने वाले छोटे-छोटे ध्वनि-समूह (स्वनिम-समूह) हैंजिनका स्वतंत्र इकाई के रूप में अर्थ होता हैजैसे- प + उ + स् + त + क = ‘पुस्तक’ एक शब्द हैजिसका एक निश्चित अर्थ होता है। इसे एक चित्र में देख सकते हैं-

शब्द केवल ध्वनि समूह नहीं हैबल्कि उसका अर्थ भी होना चाहिए। नहीं तो कोई भी केवल ध्वनि समूह शब्द नहीं कहलाएगाजैसे-

पुस्ताकेल    = यह शब्द नहीं है।

सामान्य व्यवहार में हम केवल ध्वनि समूह को ही ‘शब्द’ कहा करते हैं।

(3) वाक्य और अर्थ संबंध (Sentence meaning relation)

वाक्य कम-से-कम एक सूचना को संप्रेषित करने वाला शब्द-समूह (ध्वनि समूह) है। अतः यहाँ अर्थ सूचनात्मक होता है।

 

(4) विविध आर्थी संबंध (Semantic Relations)

इन्हें sense relations भी कहते हैं। ये दो शब्दों के बीच अर्थ के आधार पर पाए जाने वाले संबंध होते हैं, जैसे-

(क) पर्यायता /पर्यायवाची (Synonymy)

एक से अधिक शब्दों द्वारा एक ही अर्थ अभिव्यक्त करने पर उनके बीच पाया जाने वाला संबंध पर्यायता कहलाता है। इस प्रकार के शब्द पर्यायवाची शब्द कहलाते हैं।

(ख) विलोम (Antonymy)

ऐसी स्थिति जिसमें एक शब्द द्वारा दूसरे शब्द से व्यक्त अर्थ का विपरीत अर्थ दिया जाता है, विलोमता कहलाती है। इस प्रकार के शब्द विलोम शब्द कहलाते हैं।

(ग) अधिनामी-अवनामी (Hypernym-Hyponym)

दो शब्दों द्वारा व्यक्त वे अर्थ जिनमें एक शब्द किसी व्यापक क्षेत्र या भाग का बोधक होता है और दूसरा उसका भाग होता है, तो ऐसी स्थिति में व्यापक अर्थ वाले शब्द को अधिनामीऔर कमया भाग का अर्थ रखने वाले शब्द को अवनामीकहते हैं, जैसे-

इसमें बड़ा वर्ग अधिनामी होता है और छोटा वर्ग अवनामी है।

(घ) अंगांगी  (Meronym)

उदाहरण-

शरीर हाथ अंगुली

 

(5) अर्थविज्ञान क्या है? (What is Semantics)

 

(6) अर्थविज्ञान की शाखाएँ (Branches of Semantics)

अर्थविज्ञान की प्रमुख शाखाएँ निम्नलिखित हैं-

§  शब्दवृत्तिक अर्थविज्ञान (Lexical semantics)

§  संरचनात्मक अर्थविज्ञान (Structural Semantics)

§  नवसंरचनात्मक अर्थविज्ञान (Neo-structural Semantics)

§  सत्वशास्त्रीय अर्थविज्ञान (Ontological Semantics)

§  प्रजनक अर्थविज्ञान (Generative Semantics)

§  संज्ञानात्मक अर्थविज्ञान (Cognitive Semantics)

§  रूपात्मक अर्थविज्ञान (Formal Semantics)

§  ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक अर्थविज्ञान (Historical & Comparative Semantics)

 

(7) एकार्थकता और अनेकार्थकता (Monosemy &Polysemy)

 

(8) अर्थ और शब्द शक्तियाँ

अ‍भिधा, लक्षणा, व्यंजना

 

(9) अर्थ परिवर्तन (Semantic Change)

                           आदि।

आंगिक/शारीरिक भाषा (Body Language)

 आंगिक/शारीरिक भाषा (Body Language)

बॉडी लैंग्वेज को हिंदी में आंगिक भाषा या शारीरिक भाषा कहते हैं। आंगिक भाषा या शारीरिक भाषा भाषा व्यवहार का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जो सामान्य बातचीत में भी सहायक साधन के रूप में प्रयुक्त होता है और हमारे भाषा व्यवहार को संपूर्णता प्रदान करता है। साथ ही कुछ सीमित अभिव्यक्तियों के लिए केवल आंगिक भाषा का भी प्रयोग किया जाता है। अर्थात बिना कुछ बोले हम शारीरिक अंगों के माध्यम से भी सूचनाओं का आदान-प्रदान कर पाते हैं। अतः शारीरिक भाषा या आंगिक भाषा की भूमिका हमारे व्यवहार में दोप्रकार से है -

§  सामान्य भाषा व्यवहार में सहायक के रूप में

§  कुछ विशेष प्रकार के संकेतों की अभिव्यक्ति के साधन के रूप में

आंगिक भाषा या शारीरिक भाषा के अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार के व्यवहार आते हैं-

  1. चेहरे की अभिव्यक्तियां (Facial Expressions):

इसके अंतर्गत भाषा व्यवहार के दौरान चेहरेद्वारा व्यक्त किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के संकेत आते हैं, जैसे- Smiles, frowns, raised eyebrows, and squinted eyes आदि। इनके द्वारा happiness, sadness, surprise, anger, and confusion आदि की अभिव्यक्ति की जाती है।

2.              भाव भंगिमाएँ (Gestures):

इसके अंतर्गत चेहरे की अभिव्यक्तियों के अलावा शरीर के दूसरे अंगों के माध्यम से किए जाने वाले संकेत आते हैं, जैसे- अपने हाथों के माध्यम से या कंधों को उचकाते हुए या सर को हिलाते हुए किया जाने वाला व्यवहार या संकेत

3.              शारीरिक मुद्रा  (Posture):

मनुष्य द्वारा अपनी शारीरिक मुद्रा के माध्यम से भी विविध प्रकार के संकेत संप्रेषित किया जाते हैं। वह अपने शरीर पर अथवा हाथ को जो मुद्रा में रखता है उसे पता चलता है कि वह भाषा व्यवहार में ध्यान से सम्मिलित हो रहा है, या अनमने ढंग से सम्मिलित हो रहा है। कहीं वह ऊब तो नहीं रहा है। हम ऊबने लगते हैं तो अपनी शारीरिक मुद्राएं बदल देते हैं, जिससे वक्ता को पता चल जाता है

4.              नेत्र संपर्क (Eye Contact):

भाषा व्यवहार के दौरान इसकी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वक्ता और श्रोता के बीच यदि भाषा व्यवहार के समय नेत्र संपर्क स्थापित होता है, तो इससे सूचनाओं का संप्रेषण बेहतर तरीके से हो पाता है। साथ ही नेत्र संपर्क वक्ता के कॉन्फिडेंस का भी परिचायक होता है। नेत्र संपर्क होने की स्थिति में भाषा व्यवहार के दौरान यदि कोई बाधा उत्पन्न हो रही हो तो उसका भी संकेत किया जा सकता है। इसी प्रकार शर्म, क्रोध, दुख, निराशा आदि भावों को भी व्यक्त कर पाते हैं।

5.              शारीरिक गतिविधि (Body Movements):

हम अपनी शारीरिक गतिविधि जैसे leaning forward, leaning back, shifting weight from one foot to the other आदि के माध्यम से भी कुछ बातें संप्रेषित कर लेते हैं।

6.              प्रतिबिंबन (Mirroring):

इसका संबंध किसी और को देखकर उसकी शारीरिक गतिविधि का अनुकरण करने से है। सामान्यत: बच्चे अपने शिक्षक और माता-पिता आदि की शारीरिक गतिविधियों को देखकर उनका अनुकरण करते हैं

7.              स्पर्श (Touch):

स्पर्श एक महत्वपूर्ण शारीरिक गतिविधि है, जिसके माध्यम से संप्रेषण किया जा सकता है। इसके माध्यम से हम अपना सपोर्ट, मातृत्व, प्यार-दुलार और घनिष्ठता आदि को प्रदर्शित करते हैं

8.               समनुरूपता (Congruence):

वक्ता जिस प्रकार की बात बोलता है उसी के अनुरूप अपने शारीरिक गतिविधियां भी करता है, जिससे कि उसकी बात और अधिक प्रभावशाली हो जाती है। इस विशेषता को समनुरूपता कहते हैं