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Tuesday, June 25, 2019

जामिया विश्वविद्यालय : posts 2019





Monday, June 17, 2019

Invitation to the Graduate Research Meet, 2019, IIT Guwahati

Dear Madam/Sir,
The Department of Humanities and Social Sciences, Indian Institute of Technology Guwahati is organising the sixth edition of Graduate Research Meet (GRM) on 1st and 2nd November 2019.
The GRM is an annual national seminar that aims to bring together M.Phil. and Ph.D. scholars from different disciplines of Humanities and Social Sciences to share their research ideas and outcomes. As the organising committee, we are keen on showcasing new ideas and innovations, and thus we are inviting abstracts from research scholars of your department/centre.

The theme for GRM 2019 is “Contemporary Trends in Humanities and Social Sciences”.
We are attaching herewith the poster and the information brochure. We request you to share the invitation and the details with M.Phil. and Ph.D. students. 
The deadline for the online submission of abstracts is 31st July 2019.
We look forward to meeting doctoral and M.Phil. scholars of your department/centre at the GRM 2019.

For details regarding the submission of abstracts and updates about the event, please visit our website – www.iitg.ac.in/grm or reach us to our Facebook page – www.facebook.com/hssgrm
You can also write to us at grm@iitg.ac.in.


Sincerely,
Organising Committee
Graduate Research Meet 2019
Department of Humanities and Social Sciences
Indian Institute of Technology Guwahati
E-mail: grm@iitg.ac.in

संगणनात्मक भाषाविज्ञान और भाषा-संसाधन

विडियो देखने के लिए इस लिंक पर जाएँ-


https://www.youtube.com/watch?time_continue=378&v=19zGvoM5JiI

Thursday, June 6, 2019

पर्यावरण दिवस पर कुछ खरी बातें

1.जरा गन्दे बन जाइए-
पर्यावरण को बचाना है तो बार-बार नहाना, गमकते साबुन, कीटाणुरोधी लोशन, शेम्पू, कंडीशनर, डिओडोरेंट का उपयोग कम करना होगा। दिन में कई बार कपड़े बदलने, उन्हें झागदार डिटर्जेंट, क्लॉथ सॉफ्टनर, क्लॉथ फ्रेगरेंटिव से धोने से बचना होगा। साफ सुथरा आँगन, धुल कर झूमते पौधे, नहाई हुई कार-बाइक कल हमारे बच्चों के लिए प्यासे मरने का कारण बनेगी। रूम फ्रेशनर, टायलेट फ्रेशनर सब चोंचले हैं।

2. आदिम बन जाइए-
गजेट्स के नवीनतम मॉडल खरीदने की सनक से बचें। जब तक चले अपना पुराना फोन, लेपटॉप, फ्रिज, एसी, माइक्रो, गाड़ी उपयोग में लें। पंखे से चल सकता है वहाँ कूलर न चलाएं और जहाँ कूलर से चल सकता है वहाँ एसी न चलाएं। प्रोसेस्ड फ़ूड, परफ्यूम, सेनिटाइजर, टिश्यू पेपर, टॉयलेट पेपर का उपयोग यथासंभव कम करें। सेनिटरी पैड की जगह सेनिटरी कप काम में लें और जब जरूरी न हो बच्चे को डायपर न पहनाएं। अपने टॉवल कम धोएं, कंघा, ब्रश समय से पहले न बदलें। पीने का पानी खुद के बर्तनों में साथ ढोने की आदत डालें। जहां हाथ चलनी, कद्दूकस, हाथ की बिलोनी से काम चले वहां मिक्सर को तकलीफ न दें। उसका तामझाम बहुत समय और पानी लेगा। आकर्षक प्लास्टिक के समान, मोहक नॉन स्टिक बर्तनों के मायाजाल में न बिलमाएँ। धातु और कांच के बर्तन बरतें, फकीरी के ठाठ का आनन्द लें

3- कंजूस बन जाइए-
हर वस्तु का पूर्ण उपयोग करने से आपकी जेब भारी रहेगी और और धरती हल्की। कम खरीदें, अपरिग्रही बनें, दिखावे से बचेंगे तो अपनी और धरती दोनों की लाज बनी रहेगी। हर सामान खरीदकर घर को दुकान बनाने से आपको कोने में सिमटकर बैठना पड़ेगा सो अलग।

4. भावुकता के साथ यथार्थवादी बनें-
जो सामान आपके उपयोग का नहीं उसे निशानी, स्मृतियों के नाम से सहेज कर रखने का कोई फायदा नहीं, अपने हाथों किसी को उपयोग के लिए देदें। यकीन मानिए आपके बाद तक वो चीज बची रही तो आपके परिजन बिना भावना लगाए कुपात्र को दे देंगे या बेदर्दी से फेंक देंगे

5. फेंसी या फैशनेबल डरपोक होने से बचें-
छिपकली-कॉकरोच, चूहे, चींटी ही नहीं, हमारे आसपास बसे अधिकांश प्राणी निरीह होते हैं उन्हें मारने से बचें. याद रहे, ये धरती सब के लिए और सबके कारण है। बेवजह किसी प्राणी को न मारें। दुनिया भर के धर्म गर्न्थो में अहिंसा का पाठ बेवजह नहीं लिखा है।

6. फेंसी नज़ाकत छोड़े-
जो काम खुद कर सकते हैं करें। बात बात में वाहन को कष्ट न दें। पैदल चलें, सीढियां चढ़ें, रसोई के दाल-चावल सब्जी का पानी जरा किचिन गार्डन में डाल आएँ, वाशिंग मशीन के पानी से आँगन धो डालें। अपने बगीचे को भी मितव्ययिता सिखाएं। वो भी आपके साथ कम में जी सकते हैं, आजमा कर देख लें।

7. पौधों से बात करें-
यकीन मानिए इस आपाधापी के जमाने में किसी को किसी से बात करने का समय नहीं है, तो अपने पास उपलब्ध जगह और संसाधनों के सहारे घर में और घर के आसपास पौधे लगाएं, उनसे बतियाएं। वो फल-फूल कर जवाब जरूर देंगे। आपकी आंखों को ही नहीं, देह, मन, जीभ और बिजली के बिल को भी सुख देंगे।

8. महीप होने का सपना त्याग दें-
याद रखें कि अकबर और अशोक का साम्राज्य भी नहीं रहा। धरती न बढ़ सकती है न मल्टी स्टोरी खेती हो सकती है। नदियां तो एकदम ही जिद्दी हैं, मर जाती हैं लेकिन उजड़ने का बदला ले कर। वो आपको उजाड़े बिना नहीं मानती। इसलिए जरूरत भर के बसेरे के स्वामित्व में सुख पाएं।

9. बाजार के मायाजाल से बचें-
बाजार चालाकी से आपको सुरसा बनाएगा, अगड़म-बगड़म, अनावश्यक कचरा खरीदने के लिए उकसाएगा, आप फक्कड़पन से कबीर बनने पर अड़े रहना।

10. जिएं और जीने दें, वरना कोई नहीं बचेगा।

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Monday, June 3, 2019

हिन्दी के हाथी पर सवार अंग्रेज़ी का महावत

आज की तारीख़ में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाएं वे सौतेली बहनें रह गई हैं जिनकी अम्मा अंग्रेज़ी है. अंग्रेज़ी में ही देश का राजकाज चलता है, कारोबार चलता है, विज्ञान चलता है, विश्वविद्यालय चलते हैं और सारी बौद्धिकता चलती है.
अंग्रेज़ी का विशेषाधिकार या आतंक इतना है कि अंग्रेज़ी बोल सकने वाला शख़्स बिना किसी बहस के योग्य मान लिया जाता है. अंग्रेज़ी में कोई अप्रचलित शब्द आए तो आज भी लोग ख़ुशी-ख़ुशी डिक्शनरी पलटते हैं जबकि हिंदी का ऐसा कोई अप्रचलित शब्द अपनी भाषिक हैसियत की वजह से हंसी का पात्र बना दिया जाता है. पिछले तीन दशकों में हिंदी की यह हैसियत और घटी है. पूरे देश में पढ़ाई-लिखाई की भाषा अंग्रेज़ी है और हिंदी घर में बोली जाने वाली बोली रह गई है.
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अंग्रेज़ी ने किया बेदख़ल

70 और 80 के दशकों में जो छात्र स्कूल में हिंदी और घर पर मगही, मैथिली, भोजपुरी बोलते थे आज उनके बच्चे स्कूलों में अंग्रेज़ी और घरों में हिंदी बोलते हैं.
यानी अंग्रेज़ी ने हिंदी को बेदख़ल कर दिया है और हिंदी ने बोलियों को. बहुत सारे लोगों को यह बात प्रमुदित करती है कि हिंदी को बाज़ार की वजह से बहुत बढ़ावा मिला है.
हिंदी फ़िल्में देश-विदेश जा रही हैं, हिंदी के सीरियल हर जगह देखे जा रहे हैं, कंप्यूटर और स्मार्टफोन में हिंदी को जगह मिल रही है, इंटरनेट पर हिंदी दिख रही है, लेकिन वे यह नहीं देखते कि यह अंततः एक बोली के रूप में हिंदी का इस्तेमाल है जो बाज़ार कर रहा है. हिंदी विशेषज्ञता की भाषा नहीं रह गई है.
हिंदी फ़िल्मों के निर्देशक और कलाकार अंग्रेज़ी बोलते हैं और हिंदी टीवी चैनलों और अख़बारों के संपादक अंग्रेज़ी के लोग होने लगे हैं. कुछ साल पहले वाणी प्रकाशन के एक आयोजन में उदय प्रकाश, सुधीश पचौरी, और हरीश त्रिवेदी के साथ इन पंक्तियों का लेखक हिंदी के सवाल पर संवादरत था.
हरीश त्रिवेदी ने कहा कि हिंदी का हाथी बाज़ार में बहुत शान से चल रहा है. इस लेखक ने ध्यान दिलाया कि इस हाथी पर अंग्रेज़ी का महावत बैठा हुआ है.
हिंदी के इस दुर्भाग्य को कुछ और करीने से देखना हो तो यह देखना चाहिए कि पिछले कुछ वर्षों में जो तकनीकी विकास हुआ है, उसके लिए अपनी कोई शब्दावली गढ़ने में हिंदी बुरी तरह नाकाम रही है, बल्कि उसने इसकी कोशिश भी नहीं की है जबकि एक दौर था जब अंग्रेज़ी के तकनीकी शब्दों के बहुत सुंदर अनुवाद हिंदी में हुए और वे चले भी. आज हिंदी ऐसे नए शब्द गढ़ने का अभ्यास और उन्हें चला सकने का आत्मविश्वास खो चुकी है.
जो हाल हिंदी का है, संभवतः बहुत दूर तक दूसरी भाषाओं का भी. तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मराठी बांग्ला में प्रकाशनों और कामकाज की स्थिति पहले जैसी नहीं रही. अंग्रेज़ी पर उनकी निर्भरता बढ़ रही है. तमाम राज्यों के पाठ्यक्रम में अंग्रेज़ी को अनिवार्य किया जा रहा है.
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