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Thursday, December 17, 2020

भाषा क्या है? (What is Language)

भाषा क्या है? (What is Language)

भाषा वह व्यवस्था हैजिसके माध्यम से हम विचार करते हैं तथा अपने विचारों का आपस में आदान-प्रदान करते हैं। हमारे मस्तिष्क में विचारभाव और सूचनाओं आदि का जो संग्रह होता है उसे भाषा की दृष्टि से अर्थ (Meaning) कहते हैं और उन्हें अभिव्यक्त करने के लिए हम ध्वनि (phone/sound) का प्रयोग करते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि भाषा वह व्यवस्था है जो ध्वनि को अर्थ से जोड़ती है। इसे चित्र रूप में इस प्रकार से प्रदर्शित किया जा सकता है-

 

विचारों के संप्रेषण की प्रक्रिया में एक ‘वक्ता’ (Speaker- S) होता है और दूसरा श्रोता (Listener- L)। सबसे पहले वक्ता के मन में विचार (Idea- I) उत्पन्न होता हैफिर वह उसे ध्वनियों में ढालता है तथा मुख से उच्चरित करता है। इसके बाद ध्वनि तरंगों (Sound Waves-W) के रूप में वे ध्वनियाँ श्रोता के कानों तक पहुंचती हैंजहां उसका मस्तिष्क ‘अर्थबोध’ की प्रक्रिया द्वारा पुनः उस अर्थ को प्राप्त करता है। अर्थ बोध होने की प्रक्रिया को ही ‘समझना’ कहते हैं। जब कोई बात कहने के बाद हम पूछते हैं कि ‘समझ गए?’ तो इसका अर्थ होता है- जो वाक्य (या वाक्य समूह) श्रोता के कानों तक पहुँचा हैउसका अर्थबोध हुआ या नहीं।

इस संपूर्ण प्रक्रिया को एक चित्र के माध्यम से इस प्रकार समझ सकते हैं-

 


इस प्रक्रिया में अमूर्त विचारों (अर्थ) को एक निश्चित ध्वनि समूह के रूप में ढालने और उससे पुनः विचार को प्राप्त करने का कार्य भाषा करती है। अतः इस प्रक्रिया में भाषा की स्थिति को चित्र के रूप में इस प्रकार से दर्शा सकते हैं-

वक्ता और श्रोता के संदर्भ में ‘भाषा’ के कार्य को इस प्रकार से प्रस्तुत कर सकते हैं-

उक्त चित्र के माध्यम से स्पष्ट है कि वक्ता विचार (अर्थ) को भाषा के माध्यम से ध्वनियों/ध्वनि-समूहों में परिवर्तित करता है और श्रोता भाषा के माध्यम से ही ध्वनियों/ध्वनि-समूहों से उनमें निहित अर्थ का बोध करता है।  ध्वनि-तरंगें कुछ निश्चित ध्वनियों का समूह होती हैं। अतः दूसरे शब्दों में कहा जाए तो शब्दों और वाक्यों आदि के रूप में संगठित ध्वनि-समूहों का उत्पादन वक्ता द्वारा भाषा के माध्यम से किया जाता हैजिनमें निहित अर्थ को बाद में श्रोता द्वारा भाषा के माध्यम से ही प्राप्त किया जाता है। इसलिए इस संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि भाषा के संदर्भ में ‘ध्वनि/स्वन’ और ‘ध्वनि समूह’ क्या हैं?

 ध्वनि और स्वन (Sound and Phone)

 हमारे कानों द्वारा महसूस की जा सकने वाली कोई भी आवाज ‘ध्वनि’ हैजबकि केवल किसी मानव भाषा में प्रयुक्त ध्वनि ‘स्वन’ है। अतः दूसरे शब्दों में ध्वनि के अंतर्गत सभी प्रकार की आवाजें आती हैंजैसे- पंखे की आवाजचिड़िया की आवाजगाड़ी की आवाजपटाखे की आवाज और किसी व्यक्ति के बोलने से उत्पन्न होने वाली आवाज। ‘स्वन’ के अंतर्गत केवल भाषा वाली ध्वनियाँ आती हैंअतः उपर्युक्त उदाहरणों में से स्वन के अंतर्गत केवल ‘किसी व्यक्ति के बोलने से उत्पन्न होने वाली आवाज’ ही आएगी।

 इस प्रकार ध्वनि और स्वन के अंतर को एक वेन आरेख के माध्यम से हम इस प्रकार से दर्शा सकते हैं-

हम भाषा व्यवहार में जिन ध्वनियों का प्रयोग करते हैंउन्हें भाषावैज्ञानिकों को द्वारा ‘स्वन’ कहा गया हैजिससे इन्हें अन्य सभी प्रकार की ध्वनियों से अलग किया जा सके।

स्वन और स्वनिम (Phone and Phoneme)

 हम अपने जीवन में किसी भी स्वन (भाषायी ध्वनि) का लाखों-करोड़ों बार प्रयोग करते हैंकिंतु प्रत्येक स्वन का केवल एक अमूर्त प्रतीक ही हमारे मन में रहता है। किसी भाषाई ध्वनि का व्यवहार में बार-बार प्रयोग ‘स्वन’ हैजबकि मन में निर्मित उसकी अमूर्त संकल्पना ‘स्वनिम’ है। इसे एक उदाहरण से इस प्रकार से देख सकते हैं-



आगे पढ़ें--

2. एक व्यवस्था के रूप में भाषा (Language as a System)

3. भाषा और भाषाविज्ञान (Language and Linguistics)

 

 

Tuesday, December 15, 2020

भाषाविज्ञान और शैलीविज्ञान (Linguistics and Stylistics)

 भाषाविज्ञान और शैलीविज्ञान (Linguistics and Stylistics)

 शैलीविज्ञान भाषाविज्ञान का एक अनुप्रयुक्त क्षेत्र है। इसलिए इसे अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की एक शाखा कहते हैं। जैसा कि हम जानते हैं भाषाविज्ञान वह विज्ञान है जिसके अंतर्गत मानव भाषाओं का अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है। इसके माध्यम से मानव भाषाओं में पाई जाने वाली इकाइयों और नियमों का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन से प्राप्त ज्ञान का प्रयोग जिन क्षेत्रों में होता है उन्हें भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग क्षेत्र कहते हैं। भाषाविज्ञान में किए जाने वाले सैद्धांतिक अध्ययन और उस अध्ययन के अनुप्रयोग की दृष्टि से भाषाविज्ञान के दो प्रकार किए जाते हैं-

(1) सैद्धांतिक भाषाविज्ञान

(2) अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान

इस दृष्टि से देखा जाए तो शैलीविज्ञान अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है।

 भाषावैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से प्राप्त ज्ञान के अनुप्रयोग को दो क्षेत्रों में विभक्त करके देखा जाता है- अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग और व्यावहारिक अनुप्रयोग। अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग वह है जिसमें भाषावैज्ञानिक अध्ययन से प्राप्त ज्ञान का अनुप्रयोग अन्य शास्त्रों के साथ मिलकर भाषा से जुड़ी चीजों का और अधिक गहराई से अध्ययन करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए समाजभाषाविज्ञान और मनोभाषाविज्ञान भाषाविज्ञान के अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग क्षेत्र हैं, क्योंकि इनमें भाषाविज्ञान और समाजशास्त्र तथा भाषाविज्ञान और मनोविज्ञान आपस में मिलते हैं, और क्रमशः भाषा और समाज तथा भाषा और मन के संबंध में और अधिक ज्ञान अर्जित किया जाता है। इसी प्रकार में व्यावहारिक अनुप्रयोग में भाषा शिक्षण और अनुवाद आदि आते हैं, जिनमें भाषावैज्ञानिक ज्ञान का सीधे-सीधे अनुप्रयोग संबंधित क्षेत्र में व्यावहारिक रूप से किया जाता है। इसी प्रकार कंप्यूटर के विकास से एक तकनीकी अनुप्रयोग का क्षेत्र भी विकसित हो गया है, जिसके अंतर्गत भाषा प्रौद्योगिकी और कंप्यूटेशनल भाषाविज्ञान जैसे विषय विषय आते हैं।

इस दृष्टि से विचार किया जाए तो शैलीविज्ञान भाषाविज्ञान के अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग अंतर्गत आता है। इसे निम्नलिखित आरेख के माध्यम से समझ सकते हैं-



इस प्रकार स्पष्ट है कि शैलीविज्ञान अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की एक शाखा है, जिसके अंतर्गत साहित्य का भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर अध्ययन किया जाता है। अर्थात भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों का साहित्य के अध्ययन या समझने में प्रयोग शैलीविज्ञान है।

 ऐतिहासिक दृष्टि से साहित्यशास्त्रियों और भाषाशास्त्रियों में बहुत बड़ा विरोध रहा है। भाषाशास्त्रियों के अनुसार भाषा एक व्यापक संकल्पना है, साहित्य उसका एक बहुत छोटा सा अंश है, जो प्रायः असहज होता है- अर्थात यह विशिष्ट रूप होता है। भाषा का स्वाभाविक रूप बोलचाल की भाषा है, साहित्य भाषा का विशिष्ट प्रयोग है। साहित्य शास्त्रियों के अनुसार साहित्य ऊंची चीज है। भाषा साहित्य से निचले स्तर की चीज है। अतः साहित्यकारों ने भाषा पक्ष को छोड़ दिया और भाषा शास्त्रियों ने साहित्य को।

 धीरे-धीरे लोग सचेत हुए। साहित्य भाषा की समस्त संभावनाओं को उद्घाटित करता है। साहित्यशास्त्री निरंतर हो रहे भाषावैज्ञानिक शोधों का लाभ साहित्य को समझने में उठा सकते हैं, साहित्य की सभी युक्तियां आम भाषा में आती हैं किंतु बिखरी हुई रहती हैं। साहित्य में वे सोदेश्य सुगठित रूप में प्रस्तुत की जाती हैं।

 भाषावैज्ञानिकों के अनुसार भाषा मनुष्य को मनुष्य बनाने वाले तत्वों में सबसे मूलभूत तत्व है। साहित्य के संदर्भ में भी यही बात कही गई है-

 साहित्य संगीत कला विहीनः साक्षात पशु पूछविषाण हीनः।

साहित्य पढ़ने के लिए भाषा के प्रति एक तीव्र संवेदना होनी चाहिए। संवेदनशीलता मनुष्य को मनुष्य बनाती है। साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाता है। अतः साहित्य और भाषा निसंदेह रूप से एक-दूसरे से घनिष्ठता के साथ संबंधित हैं। प्राग स्कूल स्कूल के रोमन याकोब्सन ने कहा है-

भाषा के काव्यफलन के प्रति बधिर भाषावैज्ञानिक तथा भाषावैज्ञानिक समस्याओं से उदासीन एवं भाषावैज्ञानिक प्रणालियों से अपरिचित साहित्यकार दोनों ही अपने समय से बहुत पीछे (Anachronism) हैं। अतः दोनों के निकट आने की आवश्यकता है।

शैली विज्ञान इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है।

Monday, December 14, 2020

शैलीविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में साहित्य (Literature with respect to Stylistics)

 शैलीविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में साहित्य (Literature with respect to Stylistics)

साहित्य और साहित्येतर का अंतर साहित्यशास्त्र बताता है। इसके साथ ही वह यह भी बताता है कि वह कौन सा तत्व है जो साहित्य को साहित्य बनाता है। संस्कृत के आचार्य भामह ने कहा है-

शब्दार्थौसहितौकाव्यं।

 इस परिभाषा में आया हुआ काव्य शब्द आदिसाहित्य का वाचक है। इसके सहितौ से साहित्य शब्द की उत्पत्ति हुई है। सहितौ शब्द का अर्थ है- सहितता (साथ-साथ चलना/बराबर का महत्व रखते हुए चलना)। जिसमें सहितता हो, उसे साहित्य कहते हैं। यह सहितता शब्द और अर्थ की दृष्टि से होती है।

 इस परिभाषा के आलोचकों का कहना है कि शब्द और अर्थ तो हमेशा साथ-साथ होते हैं। ये परस्पर एक-दूसरे के साथ जुड़कर ही आते हैं। शब्द एक प्रकार के पात्र (container) जैसा है जिसमें अर्थ भरा हुआ रहता है। शब्द अर्थ को उद्भूत या जागृत करता है। अतः भामह की परिभाषा में अतिव्यापकता का दोष दिखता है, जो विचारणीय है। अतः आगे सक्षेप में इस पर विचार करते हैं।

 शब्द और अर्थ के संदर्भ में तीन बातें उल्लेखनीय हैं-

 (1) हमारे दैनिक व्यवहार जैसे- बोलचाल या वार्ता आदि में अर्थ महत्वपूर्ण होता है, शब्द नहीं। यदि किसी के घर में आग लग जाए और फायर ब्रिगेड को फोन करे तो फायर ब्रिगेड वाले को आग लगने की सूचना देने के लिए क्या कहा- आग, अग्नि, फायर आदि, इनका शुद्ध-शुद्ध उच्चारण और व्याकरणिक प्रयोग किया या नहीं,इन बातों पर ध्यान नहीं जाता, बल्कि केवल अर्थ का संप्रेषण हो जाना चाहिए, इसी पर ध्यान रहता है। अतः जहां अर्थ ही साध्य है, वहां काव्य नहीं है। वह सामान्य व्यवहार, सामान्य वार्ता या वाक्य है। इसमें शब्द गौण होता है।

(2) मंत्रों आदि में शब्द महत्वपूर्ण होते हैं, अर्थ नहीं। यदि मंत्रों का जाप करें तो शक्ति या सिद्धि प्राप्त हो जाती है। यहां अर्थ को ध्यान नहीं दिया जाता। गलत उच्चारण दुष्प्रभाव भी ला सकता है।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में शास्त्र या विज्ञान में भी शब्द महत्वपूर्ण होते हैं अर्थ नहीं। इनमें प्रयुक्त शब्दों के अर्थ सुनिश्चित, सुपरिभाषित और एकार्थी होते हैं। यदि हम ठीक पारिभाषिक शब्द का प्रयोग करें तो अर्थ आ ही जाएगा। अतः शास्त्र या विज्ञान में अर्थ शब्द का अनुसरण करता है, जिसके कारण इसे साहित्य नहीं कहा जा सकता।

 नोट- सूचना में आत्मीयता (Subjectivity) की भावना होती है। या विषय मानविकी का है। सूचना बहुत कम तटस्थ होती है। इसमें शब्द चयन को ही विशेष महत्व दिया जाता है।

उपरोक्त दोनों स्थितियों को भामह की परिभाषा के अनुसार काव्य नहीं कह सकते।

(3) तीसरा क्षेत्र काव्य का है, जिसमें शब्द और अर्थ दोनों महत्वपूर्ण होते हैं और दोनों एक दूसरे को पुष्ट करते हैं। अतः भाषा की समग्र क्षमता काव्य में उद्घाटित होती है। शब्द और अर्थ सहित (सोद्देश्य/ किसी विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए चयनित) होते हैं। इसी कारण काव्य का भावानुवाद (paraphrasing) नहीं होता। अर्थात उसे हम दूसरे शब्दों में नहीं कह सकते।

वार्ता में एक ही बात कई ढंगों से कही जा सकती है। विज्ञान या शास्त्र में प्रत्येक संकल्पना के लिए एक सुनिश्चित पारिभाषिक शब्द होता है। काव्य में पूरी की पूरी अभिव्यक्ति परिभाषित होती है। उसमें थोड़ा सा भी परिवर्तन उस अभिव्यक्ति को हानि पहुंचा सकता है। शब्द या वाक्य संरचना में परिवर्तन का अर्थ है- काव्यार्थ में परिवर्तन। जैसे मैथिलीशरण गुप्त की यह कविता देखते हैं-

 अबला जीवन हाय तुम्हारी

यही कहानी

आंचल में है दूध, आंखों में है पानी।

 इसमें यदि अबला का नारी या पानी का आंसू कर दिया जाए, तो भाषा की दृष्टि से अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होगा, किंतु साहित्य और शैली की दृष्टि से अर्थ वही नहीं रह जाएगा, जो मूल कविता में है। बल्कि इस रचना का पूरा स्वरूप और प्रभाव बिगड़ जाएगा-

नारी जीवन हाय तुम्हारी

यही कहानी

आंचल में है दूध, आंखों में है आँसू।

 किसी साहित्यिक रचना में विराम, कोमा आदि भी महत्वपूर्ण होते हैं। अतः कृति के कथ्य में गहरे उतरने के लिए पाठक को एक-एक शब्द के साथ जूझना पड़ता है।

शैली क्या है? (What is Style)

 शैली क्या है? (What is Style)

शैली शब्द का प्रयोग हम अपने जीवन में विभिन्न अर्थों में करते हैं। हम इसे भिन्न-भिन्न व्यवहार क्षेत्र के अनुसार इसका प्रक्षेत्र-आधारित (domain specific) संदर्भ से समझते हैं। अतः शैली का क्षेत्र बहुत व्यापक और विविध है। हम अपने जीवन क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की विशिष्ट शैलियों की बात करते हैं, जैसे-

·         पेंटिंग में

·         स्थापत्य कला में – दक्षिणी शैली, ईरानी शैली

·         बालों में - हेयर स्टाइल

आदि

जब हम शैलीविज्ञान की बात भाषाविज्ञान के संदर्भ में करते हैं तो शैली का संबंध व्यापक रूप से भाषा के साथ और विशिष्ट रूप में साहित्य के साथ होता है। यदि एक से अधिक वाक्य अर्थ की दृष्टि से समान होते हुए भी संरचनात्मक रूप से भिन्न हो वे वाक्य शैलीगत रूप से भिन्न होते हैं। अर्थात जब एक ही अर्थ के लिए एक से अधिक वाक्य उपलब्ध होते हैं, तो उनमें से किसी एक का चयन शैली के लिए आधार उत्पन्न करता है। जैसे- समय पूछने के लिए हम इनमें से किसी भी वाक्य का प्रयोग कर सकते हैं-

·         कितने बजे हैं?

·         कितने बज गए?

·         कितना समय हुआ है?

·         कितना टाइम हुआ है?

·         टाइम कितना हुआ?

·         समय कितना हुआ?

·         कृपया समय बताइए।

·         अरे, जल्दी समय बताओ।

यही बात अन्य विचारों, भावों और अर्थ के विविध रूपों और अभिव्यक्तियों के संदर्भ में भी लागू होती है। प्रत्येक विचार को कहने के लिए हम उपलब्ध विविध प्रकार के शब्दों और वाक्यों में से किसी एक प्रकार का चयन करते हैं। चयन की इस प्रक्रिया में जब कोई pattern बनने लगता है, तो उसे ही शैली कहते हैं, जैसे- शब्द चयन और प्रयोग की दृष्टि से हिंदी की दो शैलियाँ प्रचलित हैं- उर्दूनिष्ठ शैली और संस्कृतनिष्ठ शैली। ये शैलियाँ किसी वाक्य में शब्दों के चयन और प्रयोग पर मानी जाती हैं, जैसे-

·         आज आए भूकंप में बहुत सारे लोगों के प्राण गए।

·         आज आए जलजले में बहुत लोग हताहत हुए।

ये दोनों वाक्य हिंदी के ही हैं लेकिन पहला वाक्य संस्कृतनिष्ठ शैली में लिखा हुआ है, जबकि दूसरा वाक्य उर्दू शैली में लिखा हुआ है। इसी प्रकार शैली विविध रूपों में काम करती है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी शैली हो सकती है, विशेषकर लेखकों की अपनी शैली होती ही है, जिसे हम लेखक के नाम से ही संबोधित करते हैं, जैसे- प्रेमचंद की शैली, जयशंकर प्रसाद की शैली आदि।

 अतः स्पष्ट है कि यदि हम एक बात को कहने के लिए कई विकल्पों में से एक को चुनते हैं तो वह एक प्रकार की शैली कहलाती है। इसलिए एक वाक्य में कह सकते हैं-

“शैली चयन है” (Style is choice)

यह शैली की एक व्यापक परिभाषा है- भाषा के संदर्भ में भी और भाषा के बाहर भी। भाषा के की दृष्टि से कहें तो- लेखन अथवा वाचन में कुछ विशेष प्रकार के शब्दों, पदबंध या वाक्य रचनाओं को चुनते हुए किया जाने वाला विशिष्ट प्रयोग शैली है।

अर्थ का संबंध क्या के साथ होता है, जबकि शैली का संबंध कैसे के साथ होता है। अर्थ में हम यह देखते हैं कि वक्ता ने क्या कहा?’ और शैली की दृष्टि से हम यह देखते हैं कि वक्ता ने कैसे कहा?’ वाक्यों के शैलीगत अर्थ भी होते हैं। कई वाक्यों का सामान्य अर्थ एक ही होता है, किंतु शैलीगत अर्थ भिन्न भिन्न होते हैं।