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Friday, May 3, 2019

सत्‍यनिष्‍ठा एवं साहित्यिक चोरी संबंधी शपथ-पत्र

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
लिंक
http://www.mgahv.in/pdf/gen/gen2019/PLAGARISM_format_unicode_02_05_2019.Pdf
वर्ड फाइल
http://www.mgahv.in/pdf/gen/gen2019/PLAGARISM_format_unicode_02_05_2019.docx

Wednesday, November 7, 2018

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-9 (शब्दों के वर्ग)

शब्दों के वर्ग

संस्कृत वैयाकरणों द्वारा शब्दों के 04 वर्ग किए गए हैं-
नाम : क्रिया से इतर कोशीय अर्थ रखने वाले शब्द नाम कहलाते हैं।
            संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा क्रियाविशेषण
आख्यात : सभी क्रियापद आख्यात कहलाते हैं ।
अतः क्रियाशब्दभेद आख्यात है।
उपसर्ग : संस्कृत में कुछ उपसर्गों का प्रयोग स्वतंत्र रूप से, जैसे- परा, अनु, अव आदि।
            यहाँ पर उपसर्ग शब्द का तात्पर्य इन्हीं से है।
निपात : निपातकी तरह कार्य करने वाले अव्यय पद, जैसे- अपि आदि।

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-8 (शब्दांश)


शब्दांश
प्रकृति : मूल शब्दांश जिसमें किसी भी प्रकार के उपसर्ग/प्रत्यय आदि का योग न हो, जैसे- राम, फल, देव आदि।
इनके दो भेद हैं-
(क) धातु : क्रियाओं के मूल रूप, जैसे- जा, खा, चल आदि।
    धातु + तिंङ् प्रत्यय = पद
(ख) प्रातिपदिक : धातु के अलावा अन्य सभी नाम शब्द ।
    प्रातिपदिक + सुप् प्रत्यय = पद
प्रत्यय वे शब्दांश जो प्रकृति के साथ जुड़कर पदों का निर्माण करते हैं। इनके दो प्रकार हैं-
तिंङ् प्रत्यय- वे प्रत्यय जो धातुओं के साथ जुड़कर क्रियापदों का निर्माण करते हैं, जैसे-
गच्छ+ति= गच्छति (ति = तिंङ् प्रत्यय)
सुप् प्रत्यय- वे प्रत्यय जो प्रातिपदिकों के साथ जुड़कर नामपदों का निर्माण करते हैं, जैसे-
बालक + औ = बालकौ (औ = सुप् प्रत्यय)


संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-7 (अभिहितान्वयवाद-अन्विताभिधानवाद)

अभिहितान्वयवाद-अन्विताभिधानवाद

अभिहितान्वयवाद
पद - मूल घटक   
वाक्य- पदों का समूह
प्रवर्तक - आचार्य कुमारिल
पद के अलावा वाक्य का कोई महत्व नहीं है।
अभिहितानां पदार्थानाम् अन्वयः
(पद अपने अर्थ को कहते हैं और वाक्य में उनका अन्वय हो जाता है। इस अन्वय से ही वाक्य का अर्थ अर्थात वाक्यार्थ व्यक्त होता है।)
  अन्विताभिधानवाद

वाक्य- मूल घटक
वाक्य को तोड़ने पर ही अलग-अलग पदों का अर्थ प्रात होता है।
प्रवर्तक - आचार्य प्रभाकर हैं (कुमारिल भट्ट के ही शिष्य)
अन्वितानां पदार्थानां अभिधानाम्
(वाक्य में पदों के अर्थ समन्वित रूप से विद्यमान रहते हैं। उनके अलग-अलग अर्थ को समझने के लिए वाक्य को तोड़ा जाता है।)


संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-6 (वाक्य के गुण)

वाक्य के गुण

आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि
आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि की संगतता प्राप्त करने वाले पद समूह को वाक्य के रूप में परिभाषित करते हुए कहा गया है-
    आकांक्षा योग्यता सन्निधिश्च वाक्यार्थ ज्ञान
हेतु पद समूहो वाक्यम्
  आकांक्षा : जब किसी शब्द का वाक्य में प्रयोग होता है तो उसे अन्य शब्दों की आवश्यकता होती है, जैसे- वाक्य में कर्ता शब्द के आते ही क्रिया (और सकर्मक क्रियाओं में कर्ता) की आकांक्षा।
योग्यता : वाक्य में प्रकार्य के स्तर पर एक शब्द के साथ दूसरे शब्द के जुड़ सकने की क्षमता।
अर्थमूलक योग्यता
व्याकरणमूलक योग्यता
सन्निधि : वाक्य निर्माण के लिए उच्चरित या अभिव्यक्त शब्दों का एक-दूसरे के पास या समीप ही होना।

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-5 (वाक् (भाषा) के रूप)

वाक् (भाषा) के रूप

चत्वारि वाक् परिमिता पदानि, तानि विदुर्ब्राह्मणा मे मनीषिण:।
  गुहा त्रिणी निहिता नेङ् गयंति, तुरीयं वाचो मनुष्याः वदंति॥
(वाक् के चार रूप होते हैं, इनमें से तीन गुफा में निहित रहते हैं। चौथे रूप का प्रयोग मनुष्य द्वारा बोलने में किया जाता है। )
परा : यह वाक् का अमूर्त मानसिक रूप है। इसका संबंध आत्मा से है। इसका कार्य हमें सर्वशक्तिमान सत्ता (ब्रह्म) से जोड़ना है।

पश्यंती : इसे भाषा का सूक्ष्म रूप कहा गया है। इसका संबंध मनुष्य के हृदय से है, जहाँ भाषिक अभिव्यक्तियों का निर्माण और बोध तो नहीं होता किंतु भाषायी अनुभूति रहती है।
मध्यमा : यह भाषा की चिंतनावस्था है। हम चिंतन करते हुए मन-ही-मन भाषा के जिस रूप का प्रयोग करते हैं, वह मध्यमा है। भाषा के इस रूप का प्रयोग करने के लिए बोलने या सुनने की आवश्यकता नहीं होती।
वैखरी : वैखरी भाषा का व्यक्त रूप है। हम अपने दैनिक व्यवहार में बोलने और सुनने के क्रम में भाषा के जिस रूप का प्रयोग करते हैं, उसे वैखरी नाम दिया गया है।

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-4 (कात्यायन और पतंजलि)

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-4 (कात्यायन और पतंजलि)
1. कात्यायन और वार्तिक

पाणिनी द्वारा रचित अष्टाधायी में नियम इतने सूत्रवत हैं, कि एक सामान्य विद्वान या अध्येता द्वारा उन्हें पूर्णतः समझ पाना संभव नहीं है।
इसी कारण उनकी व्यवस्थित व्याख्या हेतु कुछ सहायक ग्रंथ भी लिखे गए। इन ग्रंथों को ही वार्तिकनाम दिया गया है।
संस्कृतकाल में कई आचार्यों, जैसे-व्याघ्रमूर्ति, बाडव, क्रोष्टा, भारद्वाज और कात्यायन द्वारा वार्तिकों की रचना की गई।
इन सभी वार्तिककारों में कात्यायनका नाम सर्वोपरि है।
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  कात्यायन का समय पाणिनी (350 ई.पू.) पतंजलि (150 ई.पू.) के बीच का माना गया है।
भोलानाथ तिवारी (2009) : वर्तमान में उपलब्ध वार्तिकों की संख्या लगभग1500.
इनमें से कितने कात्यायन के हैं यह जानने का अभी हमारे पास कोई ठोस साधन नहीं है।
कात्यायन ने पाणिनी के सूत्रों पर कुछ ऐसे व्यवस्थापरक वाक्य लिखे हैं जिनमें सूत्रों में जो कुछ कहा गया है, जो कुछ नहीं कहा जा सका, अथवा जो कुछ नहीं कहा जाना चाहिए इन बातों पर व्यवस्थित चर्चा की गई है। ये वाक्य ही वार्तिक के रूप में प्रसिद्ध हैं।
(रमानाथ शर्मा पाणिनी और उनकी अष्टाध्यायीभाषाशास्त्र के सूत्रधार, 2002)
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आचार्यों द्वारा वार्तिक की परिभाषा
उक्तानुक्तदुरुक्तानां चिंता यत्र प्रवर्तते। तं ग्रंथं वार्तिकं प्राहुर्वार्तिकज्ञाः मनीषीणः।
(अर्थात वार्तिक वह है जिसमें अष्टाध्यायी में उक्त (कहा गया), अनुक्त (नहीं कहा गया) और दुरुक्त (गलत कहा गया) पर विचार किया गया हो)।
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2. पतंजलि और महाभाष्य


  संस्कृत आचार्यों में पाणिनी और कात्यायन के बाद पतंजलि का नाम सर्वोपरि ।
समय : 150 ई.पू. के लगभग ।
रचना : महाभाष्य
इसमें भी पाणिनी के अष्टाध्यायी की तरह आठ अध्याय तथा प्रत्येक अध्याय में चार पाद ।
पाणिनी के उन सूत्रों की व्याख्या, जो समय के साथ अध्येताओं के लिए कठिन हो गए थे।
इस क्रम में कात्यायन के वार्तिकों का भी परीक्षण करते हुए उपयोगी और अनुपयोगी वार्तिकों पर प्रकाश ।
इसके अलावा भाषा के दार्शनिक पक्ष पर भी विचार ।

Tuesday, November 6, 2018

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-3 (पाणिनी और अष्टाध्यायी)

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-3
पाणिनी और अष्टाध्यायी

पाणिनी : संस्कृत-काल के सबसे बड़े व्याकरणाचार्य।
समय 350 ई.पू. के आस-पास।
अष्टाध्यायीपाणिनी की कालजयी रचना।
कुल आठ अध्याय।
सूत्रवत रूप में संस्कृत भाषा के नियमों की प्रस्तुति।
पाणिनी का व्याकरण अनुशीलन इतना उच्च कोटि का रहा कि समकालीन सभी संप्रदायों में उनकी परंपरा या संप्रदाय को सर्वोच्च स्थान दिया गया।
अष्टाध्यायी
अष्टाध्यायी में कुल आठ अध्याय हैं।

प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं। अतः कुल 32 पाद हैं।
इन अध्यायों और पादों में लगभग चार हजार सूत्र हैं|
सभी अध्यायों या पादों में सूत्रों की संख्या समान नहीं है।
          इसमें वर्णित सामग्री को अधिकारनाम -
संज्ञाधिकार : इसका संबंध मुख्य संज्ञाओं और परिभाषाओं से है, जिन्हें प्रथम अध्याय में देखा सकता है।
प्रत्ययाधिकार : इसमें भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रकृतियों (मूल शब्दों) में लगने वाले प्रत्ययों संबंधी नियम हैं। इन्हें तृतीय अध्याय पंचम अध्याय तक देखा जा सकता है।
अंगाधिकार : इनका विस्तार षष्ठम अध्याय से सप्तम अध्याय तक है।
पदाधिकार : यह अष्टम अध्याय में है।
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अध्यायों की सामग्री
अध्याय 1 : संज्ञा, परिभाषा, अतिदेश, आत्मनेपद, परस्मैपद और कारक के प्रकरण।
अध्याय 2 : समास, विभक्ति, धात्वादेश और लुक् के प्रकरण ।
अध्याय 3 से 5 : प्रत्ययों का विधान । इनमें सन् , णिच् , कृत् , ल् , तिङ् , सुप् , स्त्री और तद्धित संबंधी प्रकरण प्रमुख हैं।
अध्याय 6-7 :  द्वित्व, संप्रसारण, संहिता, स्वर एवं अंग संबंधी कार्य।
अध्याय 8  : पदकार्य सूत्र।
(रमानाथ शर्मा, पाणिनी और उनकी अष्टाध्यायीभाषाशास्त्र के सूत्रधार, 2002)
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एल. ब्लूमफील्ड : Language (1933)-
This grammar which dates from somewhere round 350 to 250 B.C. is one of the greatest monuments of human intelligence.”
(यह व्याकरण, जिसका रचनाकाल 350 से 250 ई.पू. के आस-पास है, मानव मेधा के महानतम स्मारकों में से एक है।)