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Friday, September 25, 2026

प्रो. वी. रा. जगन्नाथन : biodata

 प्रो. वी. रा. जगन्नाथन

स्व परिचय

जन्म 1942, मदुरै, तमिलनाडु मातृभाषा – तमिल निवास – दिल्ली

शैक्षिक योग्यता: बी. ए. मैसूरु 1961, एम.ए. हिंदी, इलाहाबाद 1963, एम.ए. भाषाविज्ञान, डेकन कालेज, पुणे, 1968, पीएच.डी. हिंदी आगरा, 1970

कार्यानुभव: प्रमुख परियोजना अधिकारी, ICSAL (2023 से), निदेशक, Linguanet (2012 से), 

आचार्य, हिंदी (1987-2004) तथा निदेशक, मानविकी (6 साल), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, अतिथि आचार्य, दी यूनिवर्सिटी आव दि वेस्ट इंडीज़, ट्रिनीडाड (1992-96) आचार्य, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान (1976-87) केंद्रीय हिंदी संस्थान. 

विशेषज्ञता के क्षेत्र: भाषाविज्ञान, भाषा शिक्षण, भाषा प्रौद्योगिकी, कोशविज्ञान, दूर शिक्षा   

शैक्षिक उपलब्धियाँ

1 साहित्य सूरदास और तमिल भक्त कवि पेरियालवार का तुलनात्मक अध्ययन (शोध), सृजन नव भारत 1991 (वैज्ञानिक उपन्यास) 2 कोश हिंदी की आधारभूत शब्दावली, 1966, हिंदी-तमिल समानस्रोतीय–भिन्नार्थी शब्दावली 1968, चार अध्येता कोश – चित्रकोश, सरल हिंदी कोश, लघु छात्रकोश, छात्रकोश 2009 संप्रति हिंदी ज्ञान कोश (Encyclopaedic Dictionary) पर कार्यरत 3 भाषाविज्ञान नव्य हिंदी व्याकरण 2002 (NCERT के लिए) प्रयोग और प्रयोग (प्रयोगगत व्याकरण) 1980 संप्रति हिंदी व्याकरण पर कार्यरत 4 भाषा शिक्षण क) लेखन: Spoken Hindi – A microwave Approach1973, स्वयं हिंदी सीखें 1990. महक तथा संवाद (हिंदी की दो पाठ्य पुस्तक शृंखलाएँ) ख) संस्थागत कार्य: हिंदी का पत्राचार पाठ्यक्रम, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, प्रबोध, प्रवीण, प्राज्ञ की छह पाठ्यपुस्तकें (ऱाजभाषा विभाग), हिंदी का मानक पाठ्यक्रम (दो भाग), केंद्रीय हिंदी संस्थान 5 भाषा प्रौद्योगिकी हिंदी, तमिल, अंग्रेज़ी के आनलाइन पाठ्यक्रमों तथा हिंदी की वर्तनी-व्याकरण जाँच कार्यक्रम के निर्माण पर कार्यरत.

सम्मान: देश-विदेश की कई संस्थाओं से सम्मानित यथा विश्व हिंदी समिति, न्यूयार्क का हिंदी पंचानन सम्मान 1996, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का बाबू श्यामसुंदर सम्मान 1982 आदि.   

संपर्क: निवास-106 साउथ पार्क, कालकाजी, नयी दिल्ली -110019

व्यक्तिगत: (91) 98 718 24742 <vrj.nathan@gmail.com> 

कार्यालयी: (91) 88 001 17807 <vrj.icsal@gmail.com><www.icsal.in>


Prof. V. R. Jagannathan

Personal Profile


Born: 1942, Madurai, Tamil Nadu Mother Tongue: Tamil Residence: Delhi

Educational Qualifications: B.A. (Mysuru, 1961); M.A. Hindi (Allahabad, 1963); M.A. Linguistics (Deccan College, Pune, 1968); Ph.D. Hindi (Agra, 1970).

Professional Experience: Chief Project Officer, ICSAL (since 2023); Director, Linguanet (since 2012);

Professor of Hindi (1987–2004) and Director of Humanities (6 years), Indira Gandhi National Open University (IGNOU); Visiting Professor, The University of the West Indies, Trinidad (1992–96); Professor of Applied Linguistics (1976–87), Central Institute of Hindi (Kendriya Hindi Sansthan). 

Areas of Specialization: Linguistics, Language Teaching, Language Technology, Lexicography, Distance Education.

Academic Achievement

1. Literature: A Comparative Study of Surdas and the Tamil Bhakti Poet Periyalvar (Research); Nav Bharat (1991) (Scientific Novel).

2. Lexicography: Basic Hindi Vocabulary (1966); Hindi-Tamil Cognate Vocabulary with Divergent Meanings (1968); Four Learner's Dictionaries— Chitrakosh (Illustrated Dictionary), Saral Hindi Kosh (Basic Learners’ Hindi Dictionary), Laghu Chhatrakosh (Concise Learners’ Hindi Dictionary), Chhatrakosh (Learners’ Hindi Dictionary) (2009). Currently working on Hindi Gyan Kosh (Encyclopaedic Dictionary of Hindi)

3. Linguistics: Navya Hindi Vyakaran (Modern Hindi Grammar) (2002) (for NCERT); Prayog aur Prayog (Usage Grammar of Hindi) (1980). Currently working on a comprehensive Hindi Grammar.

4. Language Teaching: (a) Writing: Spoken Hindi – A Microwave Approach (1973); Svayam Hindi Seekhen (Learn Hindi Yourself) (1990); Mahak and Samvad (Two Hindi textbook series). (b) Institutional Work: Hindi Correspondence Course (Central Hindi Directorate); Six textbooks for the Prabodh, Praveen and Pragya proficiency levels (Department of Official Language); Standard Hindi Curriculum (Two Volumes) (Central Institute of Hindi).

5. Language Technology: Currently working on the development of online courses for Hindi, Tamil, and English, as well as a Hindi spelling and grammar checking program.

Honors and Awards: Honoured by numerous institutions both within India and abroad, including the Hindi Panchanan Samman from the Vishwa Hindi Samiti, New York (1996), and the Babu Shyam Sundar Samman from the Uttar Pradesh Hindi Sansthan (1982), among others.

Contact: Residence: 106 South Park, Kalkaji, New Delhi - 110019.

Personal: (91) 98 718 24742 <vrj.nathan@gmail.com>

Office: (91) 88 001 17807 <icsal.vrj@gmail.com> <www.icsal.in>


राजेंद्र वर्मा : biodata


 

Wednesday, September 23, 2026

हिंदी में कहना क्रिया के कर्म के साथ परसर्ग प्रयोग

 प्रो. वी.आर. जगन्नाथन जी के फेसबुक पृष्ठ पर हिंदी की 'कहना' क्रिया के साथ कर्मपद के साथ लगने वाले परसर्ग को लेकर एक प्रश्न किया गया है- 


      इस संदर्भ में मैं कहना चाहूँगा कि 'कहना' क्रिया में कर्म स्थान पर आने वाले पद की दो भूमिकाएँ हो सकती हैं- 

    कर्ता के साथ सहभागी के रूप में => मैंने तुमसे कहा कि आज मैं नहीं आऊँगा। 

    कर्म के रूप में => मैंने तुम्हें पानी लाने को कहा। 

     जब कर्म भोक्ता के रूप में होता है तो 'को' का प्रयोग किया जा सकता है। इस रूप में वह कर्ता द्वारा कही गई बात का पालन करता है, किंतु जब वह केवल श्रोता की भूमिका में होता है तो 'से' का प्रयोग होता है। वहाँ वह सहभागी मात्र होता है। ऊपर दिए गए उदाहरणों में पहले वाक्य में 'से' की जगह 'को' का प्रयोग नहीं कर सकते हैं-

*मैंने तुमको कहा कि आज मैं नहीं आऊँगा। 

लेकिन नीचे दिए गए वाक्य में 'को' का प्रयोग कर सकते हैं- 

मैंने तुमको कहा कि पानी लाओ। 



Monday, September 21, 2026

Blog report 21 lakhs


 

सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी

सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी (Quiz)

1. भारत की राजधानी क्या है?

2. हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह कौन सा है?

3. भारत का राष्ट्रीय पशु कौन सा है?

4. एक वर्ष में कितने दिन होते हैं (सामान्य वर्ष)?

5. विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर कौन सा है?

Tuesday, September 8, 2026

क्षेत्र भाषाविज्ञान और नृविज्ञान (Field Linguistics and Anthropology)


क्षेत्र भाषाविज्ञान (Field Linguistics) और नृविज्ञान (Anthropology) दोनों ही मानव समाज, संस्कृति और व्यवहार के अध्ययन से संबंधित महत्वपूर्ण विषय हैं। क्षेत्र भाषाविज्ञान भाषा के प्रत्यक्ष अध्ययन पर केंद्रित होता है, जबकि नृविज्ञान मानव समुदायों, उनकी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक जीवन का अध्ययन करता है। दोनों विषयों का घनिष्ठ संबंध है क्योंकि भाषा किसी भी संस्कृति और समाज का अभिन्न अंग होती है।

इन्हें निम्नलिखित प्रकार से संक्षेप में समझ सकते हैं-

क्षेत्र भाषाविज्ञान (Field Linguistics)

क्षेत्र भाषाविज्ञान वह शाखा है जिसमें शोधकर्ता किसी भाषा-समुदाय के बीच जाकर भाषा का प्रत्यक्ष अध्ययन करता है। इसमें भाषा की ध्वनियों, शब्दावली, व्याकरण, लोकसाहित्य और भाषा-प्रयोग से संबंधित डेटा संकलित किया जाता है।

मुख्य उद्देश्य (Main Objectives)

  • भाषा का प्रलेखन (Documentation)
  • व्याकरण और शब्दकोश निर्माण
  • संकटापन्न भाषाओं का संरक्षण
  • भाषाई विविधता का अध्ययन

 

नृविज्ञान (Anthropology)

नृविज्ञान मानव और उसकी संस्कृति का वैज्ञानिक अध्ययन है। इसमें मानव समुदायों के सामाजिक संगठन, रीति-रिवाज, विश्वास, आर्थिक गतिविधियाँ, धार्मिक परंपराएँ तथा सांस्कृतिक व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है।

मुख्य उद्देश्य (Main Objectives)

  • मानव संस्कृति का अध्ययन
  • सामाजिक संस्थाओं का विश्लेषण
  • सांस्कृतिक विविधता को समझना
  • मानव व्यवहार और जीवन-शैली का अध्ययन

 

क्षेत्र भाषाविज्ञान और नृविज्ञान का संबंध (Relationship between Field Linguistics and Anthropology)

1. भाषा और संस्कृति का संबंध (Relationship between Language and Culture)

भाषा संस्कृति की वाहक (carrier) होती है। किसी समुदाय की संस्कृति, मूल्य, विश्वास और परंपराएँ उसकी भाषा में परिलक्षित होती हैं। इसलिए भाषा का अध्ययन संस्कृति की समझ में सहायता करता है।

2. सामुदायिक अध्ययन (Community-based Study)

दोनों विषय समुदायों के बीच जाकर प्रत्यक्ष अध्ययन (Fieldwork) पर बल देते हैं। शोधकर्ता समुदाय के साथ समय बिताकर जानकारी एकत्रित करता है।

3. लोकज्ञान का प्रलेखन (Documentation of Indigenous Knowledge)

लोककथाएँ, मिथक, लोकगीत, कहावतें और पारंपरिक ज्ञान दोनों विषयों के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री हैं।

4. प्रतिभागी अवलोकन का प्रयोग (Use of Participant Observation)

क्षेत्र भाषाविज्ञान और नृविज्ञान दोनों में प्रतिभागी अवलोकन (Participant Observation) एक प्रमुख अनुसंधान विधि है।

5. संकटापन्न भाषाओं और संस्कृतियों का संरक्षण (Preservation of Endangered Languages and Cultures)

भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए दोनों विषय मिलकर कार्य करते हैं।

 

भाषिक नृविज्ञान (Linguistic Anthropology)

अर्थ (Meaning)

भाषिक नृविज्ञान (Linguistic Anthropology) नृविज्ञान की वह शाखा है जो भाषा और संस्कृति के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करती है।

अध्ययन के क्षेत्र (Areas of Study)

  • भाषा और सामाजिक पहचान
  • भाषा और संस्कृति
  • भाषाई व्यवहार
  • लोकसाहित्य एवं मौखिक परंपराएँ
  • भाषाई विविधता

क्षेत्र भाषाविज्ञान में व्याकरण निर्माण (Preparation of Grammar in Field Linguistics)


क्षेत्र भाषाविज्ञान (Field Linguistics) में व्याकरण निर्माण एक महत्वपूर्ण कार्य है। इसका उद्देश्य किसी भाषा की संरचना का वैज्ञानिक और व्यवस्थित वर्णन प्रस्तुत करना होता है। चूँकि इसमें अध्ययन की भाषा का लिखित रिकार्ड न के बराबर होता है, इसलिए यह कार्य मुख्यतः क्षेत्रीय अध्ययन (fieldwork) के दौरान भाषा-भाषियों से प्राप्त भाषाई आँकड़ों के आधार पर किया जाता है। इसे लिए निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं-

1. भाषाई सामग्री का संकलन (Collection of Linguistic Data)

व्याकरण तैयार करने का पहला चरण भाषा-भाषियों से शब्दों, वाक्यों, वार्तालापों, लोककथाओं और अन्य भाषाई सामग्री का संकलन करना है। यह सामग्री रिकॉर्डिंग, साक्षात्कार और प्रत्यक्ष अवलोकन द्वारा प्राप्त की जाती है।

2. ध्वन्यात्मक विश्लेषण (Phonetic and Phonological Analysis)

संकलित सामग्री के आधार पर भाषा की ध्वनियों का अध्ययन किया जाता है। इसमें स्वरों, व्यंजनों, बलाघात (stress), स्वराघात (intonation) तथा ध्वनि-परिवर्तनों का विश्लेषण किया जाता है। इसके आधार पर भाषा की ध्वनि-प्रणाली (sound system) का वर्णन किया जाता है।

3. रूपावैज्ञानिक विश्लेषण (Morphological Analysis)

इस चरण में शब्दों की आंतरिक संरचना का अध्ययन किया जाता है। मूल शब्द (root), उपसर्ग (prefix), प्रत्यय (suffix), समास, शब्द-निर्माण तथा रूप-परिवर्तन की प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया जाता है।

4. वाक्य-विन्यास का अध्ययन (Syntactic Analysis)

भाषा में वाक्य कैसे बनते हैं, शब्दों का क्रम क्या है तथा विभिन्न प्रकार के वाक्यों की संरचना कैसी है—इनका अध्ययन किया जाता है। इससे भाषा के व्याकरणिक नियमों की पहचान होती है।

5. अर्थवैज्ञानिक विश्लेषण (Semantic Analysis)

शब्दों, पदों और वाक्यों के अर्थ तथा उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इससे भाषा की आर्थी-व्यवस्था को समझने में सहायता मिलती है।

6. व्याकरणिक नियमों का निर्धारण (Formulation of Grammatical Rules)

विश्लेषण के बाद भाषा के ध्वनि, रूप और वाक्य संबंधी नियमों को व्यवस्थित रूप से निर्धारित किया जाता है। ये नियम भाषा की संरचना को स्पष्ट करते हैं।

7. व्याकरण का लेखन (Writing the Grammar)

अंतिम चरण में सभी निष्कर्षों को एक व्यवस्थित व्याकरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सामान्यतः इसमें निम्नलिखित अध्याय होते हैं:

    • ध्वनि-व्यवस्था (Phonology)
    • रूप-रचना (Morphology)
    • वाक्य-विन्यास (Syntax)
    • अर्थ-विज्ञान (Semantics)
    • उदाहरण एवं पाठ-सामग्री (Texts and Examples)

डेटा संकलन एवं अभिलेखन की तकनीकें (Data Elicitation and Recording Techniques)

 


क्षेत्र भाषाविज्ञान (Field Linguistics) में डेटा संकलन (Data Elicitation) और अभिलेखन (Recording) अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ हैं। इनका उद्देश्य भाषा-भाषियों से विश्वसनीय एवं प्रामाणिक भाषाई सामग्री प्राप्त करना तथा उसे भविष्य के अध्ययन और विश्लेषण के लिए सुरक्षित रखना है।

1. साक्षात्कार विधि (Interview Technique)

इस तकनीक में शोधकर्ता भाषा-भाषियों से सीधे प्रश्न पूछकर शब्द, वाक्य, मुहावरे तथा अन्य भाषाई जानकारी प्राप्त करता है। साक्षात्कार औपचारिक (formal) या अनौपचारिक (informal) हो सकता है।

2. प्रश्नावली विधि (Questionnaire Technique)

इस विधि में पूर्वनिर्धारित प्रश्नों की सूची तैयार की जाती है। भाषा-भाषियों से इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त कर भाषाई आँकड़े एकत्रित किए जाते हैं। यह तकनीक बड़ी मात्रा में डेटा संकलन के लिए उपयोगी होती है।

3. अनुवाद विधि (Translation Technique)

शोधकर्ता भाषा-भाषियों से किसी ज्ञात भाषा (जैसे हिंदी या अंग्रेज़ी) के शब्दों, वाक्यों अथवा अनुच्छेदों का लक्ष्य भाषा में अनुवाद करवाता है। इससे भाषा की संरचना और व्याकरणिक विशेषताओं की जानकारी प्राप्त होती है।

4. चित्र-आधारित उद्बोधन (Picture Elicitation Technique)

भाषा-भाषियों को चित्र दिखाकर उनसे उसका वर्णन करवाया जाता है। इससे स्वाभाविक भाषा-प्रयोग और शब्दावली संबंधी जानकारी प्राप्त होती है।

5. कथा एवं लोकसाहित्य संकलन (Collection of Narratives and Folklore)

लोककथाएँ, मिथक, गीत, कहावतें तथा व्यक्तिगत अनुभवों का संकलन किया जाता है। इससे भाषा के प्राकृतिक और सांस्कृतिक प्रयोग का अध्ययन संभव होता है।

6. प्रतिभागी अवलोकन (Participant Observation)

शोधकर्ता समुदाय के दैनिक जीवन में भाग लेकर भाषा के वास्तविक प्रयोग का अवलोकन करता है। यह तकनीक स्वाभाविक भाषिक व्यवहार को समझने में सहायक होती है।

7. स्वतःस्फूर्त वार्तालाप रिकॉर्डिंग (Recording of Spontaneous Speech)

भाषा-भाषियों के प्राकृतिक संवादों और वार्तालापों को रिकॉर्ड किया जाता है। इससे वास्तविक भाषा-प्रयोग का डेटा प्राप्त होता है।

अभिलेखन की तकनीकें (Recording Techniques)

1. ऑडियो रिकॉर्डिंग (Audio Recording)

भाषा-भाषियों की आवाज़ को डिजिटल रिकॉर्डर या मोबाइल उपकरणों द्वारा रिकॉर्ड किया जाता है। यह ध्वन्यात्मक एवं ध्वनिविज्ञान संबंधी अध्ययन के लिए उपयोगी है।

2. वीडियो रिकॉर्डिंग (Video Recording)

वीडियो रिकॉर्डिंग के माध्यम से भाषा के साथ-साथ हाव-भाव, संकेतों और सामाजिक संदर्भों का भी दस्तावेजीकरण किया जाता है।

3. मैदानी टिप्पणियाँ (Field Notes)

शोधकर्ता क्षेत्रीय कार्य के दौरान महत्वपूर्ण भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक तथ्यों को लिखित रूप में दर्ज करता है।

4. ध्वन्यात्मक लिप्यंतरण (Phonetic Transcription)

रिकॉर्ड किए गए भाषाई डेटा को अंतरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (IPA – International Phonetic Alphabet) की सहायता से लिपिबद्ध किया जाता है, जिससे ध्वनियों का सटीक वर्णन संभव हो सके।

5. डिजिटल संग्रहण (Digital Archiving)

संग्रहित डेटा को कंप्यूटर, क्लाउड स्टोरेज या डिजिटल अभिलेखागार में सुरक्षित रखा जाता है ताकि भविष्य में उसका उपयोग किया जा सके।