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Monday, September 7, 2020

स्वर्गीय आदरणीय प्रो. महेंद्र कुमार सी पांडेय जी को शिक्षक दिवस पर याद करते हुए...

 स्वर्गीय आदरणीय प्रो. महेंद्र कुमार सी पांडेय जी को शिक्षक दिवस पर याद करते हुए...

-- डॉ. धनंजय झालटे

      बात 2009 की है, जब मैंने वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में एम. ए हिंदी (भाषा प्रौद्योगिकी) में प्रवेश लिया था। जब एडमिशन हुआ तब यह बात भी पता नहीं थी कि हिंदी के आगे जुड़े हुए 'भाषा प्रौद्योगिकी' इस शब्द का मतलब क्या है। मैं स्नातक में भाषा विज्ञान इस विषय को पढ़ चुका था। उस समय ऐसा लगा कि यह भाषा विज्ञान का ही दूसरा नाम है। जब कक्षाएं शुरू हुईं तो यह बात ध्यान में आई कि इसमें भाषा विज्ञान के साथ-साथ भाषा के तकनीकी पक्ष का अध्ययन करते हुए उससे संबंधित उपकरणों का विकास भी किया जाता है। उस समय भाषा प्रौद्योगिकी यह पेपर प्रोफेसर महेंद्र कुमार सी पांडेय पढ़ाते थे। ऊंचा कद, गोरा रंग, सफेद बाल, आवाज में स्पष्टता और गंभीरता। डांट-फटकार ने के कारण सबके मन में उनके प्रति डर था लेकिन यह डर आदरयुक्त था। वे डांटने वाले शिक्षक होने के बाद भी छात्रों के प्रिय थे। इसका कारण यह था कि कई बार गलतियां होने पर डांट जरूर लगाते लेकिन तुरंत उतनीही विनम्रता से समझाते।  

      कक्षाएं शुरू हो गई। साथ ही साथ छात्रों से सेमिनार भी लिए जाते थे। पहले से मन में बसे उनके डर के कारण मैं सेमिनार में शायद एक मिनट ही बोल पाया। उनकी यह शर्त थी कि "मैंने जो भी पढ़ाया है वह किसी भी कागज को हाथ में न लेते हुए समझाइए, वह एक वाक्य में बताइए या एक मिनट में उतना भी काफी है।" इसके पीछे उनका यह उद्देश्य रहा होगा कि सेमिनार का मतलब यह नहीं कि कागज लेकर बस पढ़ते रहो, उसमें यह बात महत्त्वपूर्ण है कि आपने उस विषय को कितना समझा या आत्मसात किया है?

      शुरुआती दौर में सर की कई दिनों तक क्लास न हो पाई। सीनियर लोगों से जानकारी मिली की सर कैन्सर से पीड़ित हैं। जिसकी वजह से इलाज करवाने जाते हैं। लेकिन जैसे ही वापस आते फिर से कक्षाएँ शुरू हो जातीं। सर हारने वालों में से नहीं थे। वे ऐसी गंभीर बीमारी को झेलते हुए भी आगे बढ़ रहे थे। जब भी वापस आते तुरंत क्लासेस लेते। लगातार छह-छह घण्टे तक यह क्लास चलती। फिर भी वे न थकते थे न ही छात्र ऊब जातें। इसका कारण यह था कि सामने खड़ा व्यक्ति बीमारी से गुजरते हुए भी पूरी ऊर्जा के साथ छात्रों को पढ़ाता था, इसी कारण छात्र भी उतनी ही ऊर्जा के साथ लेक्चर अटेंड करते। उनको याद करने की कई वजहें हैं। उसमें से एक यह कि सर जब वापस आ जाते तो भाषा-प्रौद्योगिकी जैसे नए विषय पढ़ने वाले छात्रों का नुकसान न हो इसलिए स्वास्थ्य ठीक न होते हुए भी सर शनिवार और रविवार को छुट्टी के दिन भी क्लास ले लेते थे। उस समय हम लोग वर्धा शहर में होनेवाले जाजुवाड़ी छात्रावास में रहते थे। छुट्टी के कारण 4 किलोमीटर दूर यूनिवर्सिटी कैंपस जाने की बसें बन्द रहती थी। कैंपस पैदल आना पड़ता था। यह बात पता चलते ही सर ने खुद छात्रों के लिए गाड़ी का इंतजाम किया। सर सुबह 7 बजे हॉस्टल में सबको लेने के लिए अपनी कार लेकर हाजिर हो जाते। सब लोग इकट्ठा होने के बाद ही क्लास शुरू हो जाती। यह क्लास दिन भर एखाद ब्रेक लेते हुए चलती। सर क्लास लेते हुए कई बार खाँसते रहते। तकलीफ होते हुए भी वे न रुकते। यह सभी बातें हम सबकी ऊर्जा बढ़ाने तथा हमें प्रेरित करने वाली थीं।

       सर को याद इसलिए भी किया जाए कि भारत में भाषा-प्रौद्योगिकी जैसे विषय की नींव रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले विद्वानों में से वे एक थे। मैं उन्हीं की वजह से भाषा के तकनीकी पक्ष को जान पाया। उसमें कार्य कर पाया। सर ने 1992 में हैदराबाद विश्वविद्यालय से प्रो॰ उदय नारायण सिंह के निर्देशन में हिंदी में इलेक्ट्रानिक थिसारस पर पी-एच.डी.की शुरुआत हुई थी। विशेष बात यह थी कि वह भारत में कंप्यूटर का शुरुआती दौर था। ऐसे समय में भाषा के तकनीकी पक्ष का शोधार्थी रहना बहुत बड़ी बात है। सर भाषाविज्ञान एवं कंप्यूटरविज्ञान दोनों पर समान अधिकार रखते थे। सी-डैक पुणे में विकसित 'मंत्र' मशीनी अनुवाद प्रणाली के विकास में सर की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। 

      कार्य के प्रति समर्पण उनकी विशेषता थी। बीमारी की वजह से जैसे-जैसे स्वास्थ्य खराब होता गया वैसे-वैसे वे अधिक क्षमता के साथ छात्रों की ज्ञानवृद्धि हो इसके लिए प्रयास करते रहे। यह उनकी बात सभी के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी। वे कहते थे कि 'बॉडी जब तक सपोर्ट करेगी, तब तक लड़ेंगे।' वे अंत तक लड़ते रहे। छात्रों को प्रेरित करते रहे। लेकिन वे जीवन की लड़ाई 7 अप्रैल 2012 को हार गए। वह 'रात' हम छात्र कभी नहीं भूल सकते। उनके सभी छात्र रात भर जागते रहे। रोते रहे। मृत्यु के कुछ दिन पहले मैं और मित्र आम्रपाल उनको देखने जब सेवाग्राम अस्पताल गए थे। हमने उनसे कहाँ कि "सर, हम दोनों कल IIT मुंबई से साक्षात्कार देकर आएँ हैं।" उनका वाक्य था "आप आगे बढ़ते रहिए। मैं अपने छात्रों को प्रौद्योगिकी संस्थानों में देखना चाहता हूँ। चिंता मत कीजिए हम जल्द ही ठीक होकर वापस आएंगे।" लेकिन वापस आया उनका निर्जीव शरीर। सर जीवन के अंतिम समय तक छात्रों को सकारात्मक ऊर्जा देते रहे।

     2012 में एम. फील पूरा करते ही कुछ दिनों बाद मेरा और मित्र आम्रपाल का जलगाँव विश्वविद्यालय में चल रही मशीनी अनुवाद की 'अनुवादक्ष' नाम की परियोजना में शोध सहायक के रूप में चयन हो गया। वहां भी उनके सी-डैक में साथी रहे प्रो. राम भावसार जी के मार्गदर्शन में काम करने का मौका मिला। यह हम लोगों के लिए सबसे बड़ी बात थी। भावसार सर ने भी कई बार पांडेय सर के साथ बिताए अनुभवों को साझा किया। हमें इस परियोजना में काम करते  हुए एक तरफ खुशी थी तो दूसरी तरफ यह गम था कि हमें इस परियोजना में काम करते हुए देखकर सर कितना खुश हो जाते। लेकिन यह सब देखने के लिए सर आज हमारे बीच नहीं थे। आज उनके कई छात्र विभिन्न  संस्थानों में कार्य कर रहे हैं। वे आज भी उनके छात्रों द्वारा किए जाने वाले कार्य के रूप में जीवित हैं। वे हमें हमेशा प्रेरित करते रहेंगे। उनके जाने से जो भाषा-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की क्षति हुई है, उसको भर पाना असंभव है।


आपका छात्र

डॉ. धनंजय विलास झालटे

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