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Wednesday, February 10, 2021

रूपविज्ञान (Morphology) की विषयवस्तु

 रूपविज्ञान (Morphology) की विषयवस्तु

1. रूपिम क्या है? (What is Morpheme)

किसी भी भाषा की लघुतम अर्थवान इकाई को रूपिम कहते हैं। अर्थात रूपिम वह मूल शब्द या कोई शब्दांश है जिसका अपना एक अर्थ (कोशीय या व्याकरणिक) होता है और जिसके और अधिक अर्थवान खंड या भाग नहीं किए जा सकते।

2. रूपिम के प्रकार (Types of Morpheme)

स्वतंत्र रूप से वाक्य में प्रयुक्त हो सकने या नहीं हो सकने तथा अर्थ की दृष्टि से रूपिम के दो प्रकार किए जाते हैं-मुक्त रूपिम और बद्ध रूपिम। फिर इनके भी कुछ उपभेद किए जाते हैं-

2.1 मुक्त रूपिम और इसके प्रकार

वे रूपिम जो भाषा व्यवहार में स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होने की क्षमता रखते हैं और जिनका कोशीय अर्थ होता है, मुक्त रूपिम कहलाते हैं, जैसे- राम, घर, जा, रुचि आदि। इसके मुख्यतः दो प्रकार किए जाते हैं-

धातु और प्रातिपदिक।

2.2 बद्ध रूपिम और इसके प्रकार

वे रूपिम जो भाषा व्यवहार में स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होने की क्षमता नहीं रखते हैं और जिनका व्याकरणिक अर्थ होता है, बद्ध रूपिम कहलाते हैं, जैसे- -ता, उप-, से आदि। इसके कई प्रकार किए जाते हैं-

उपसर्ग, मध्य प्रत्यय, प्रत्यय, परसर्ग, शून्य प्रत्यय, रिक्त प्रत्यय आदि।

3. रूपिम और रूप ((Morpheme and Morph)

रूपिम और रूप में वही संबंध है, जो स्वनिम और स्वन में है।

रूपिम वह एक मानसिक इकाई है, जो अमूर्त रूप से हमारे मन में रहती है और उसका भाषा व्यवहार में बार-बार प्रयोग रूपहै, जैसे- घरएक रूपिम है। अब किसी पाठ में यदि घरशब्द का 100 बार प्रयोग हुआ हो, तो वे प्रयोग 100 रूप कहे जाएँगे।

4. रूपिम और संरूप (Morpheme and Allomorph)

जब किसी रूपिम के एक से अधिक ध्वन्यात्मक रूप भाषा व्यवहार में प्रचलित हो जाते हैं तो वे परस्पर संरूप कहलाते हैं, उनमें सबसे सामान्य या अधिक व्यवहृत रूप को रूपिम माना जाता है, जैसे- बच्चाशब्द के हिंदी में दो रूप प्रचलित हैं-

बच्चा- स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त शब्द

बच- बच्चाशब्द का वह रूप जो पनया कानाआदि प्रत्ययों के साथ लगता है, जैसे- बचपन, बचकाना आदि।

अतः ये आपस में संरूप होंगे। इन्हें इस प्रकार से दर्शाया जा सकता है-

/बच्चा/  = {बच्चा, बच}

यही बात घोड़ाऔर घुड़रूपों के लिए भी कही जा सकती है।

हिंदी अथवा अंग्रेजी में बहुवचन प्रत्ययों के संदर्भ में भी संरूप देखे जा सकते हैं, जैसे-

लड़का- लड़के, लड़कों

लड़की- लड़कियों

भाषा- भाषाएँ, भाषाओं

Boy- Boys

bus – buses आदि।

5. रूपविज्ञान की शाखाएँ

किसी भाषा में दो प्रकार की रूपिमिक प्रक्रियाएँ देखी जा सकती हैं- व्युत्पादन (Derivation) और रूपसाधन(Inflection)। इन रूपिमिक प्रक्रियाओं की दृष्टि से रूपविज्ञान के दो भेद किए जाते हैं-

5.1 व्युत्पादक रूपविज्ञान (Derivational Morphology) : वह रूपविज्ञान जिसमें शब्दों से और अधिक कोशीय शब्दों का व्युत्पादन किया जाता है, जैसे-

भारत = भारतीय, भारतीयता, भारतीयतावाद

चल = चलन

लिख = लेखन, लेखक

5.2 रूपसाधक रूपविज्ञान (Inflectional Morphology) : वह रूपविज्ञान जिसमें शब्दों से उनके शब्दरूप अर्थात पद बनाए जाते हैं, जैसे-

अच्छा = अच्छा, अच्छी, अच्छे

लड़का= लड़का, लड़के, लड़कों

6. रूपिमिक वितरण (Morphological Distribution)

स्वनिमों की तरह ही रूपिमों में भी दो प्रकार के वितरण प्राप्त होते हैं-

6.1 व्यतिरेकी वितरण (Contrastive Distribution): जहाँ एक रूप की जगह दूसरे का प्रयोग होने पर अर्थ बदल जाए। सभी रूपिम व्यतिरेकी वितरण में होते हैं।

6.2 परिपूरक वितरण (Complementary Distribution): जहाँ एक रूप की जगह दूसरे का प्रयोग होने पर अर्थ न बदले। रूपिम और संरूप परिपूरक वितरण में होते हैं।

7. शब्दभेद (Parts of Speech)

भारतीय वर्गीकरण : नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात

पाश्चात्य वर्गीकरण : संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण, क्रियाविशेषण .... आदि।

और भी गहन स्तर पर इनके विकारी और अविकारी शब्दभेदतथा विवृत्त और संवृत्त समुच्चय (Open and Close set)’ आदि के रूप में वर्गीकरण किया जाता है।

8. व्याकरणिक कोटियाँ (Grammatical Categories)

वे कोटियाँ शब्दों को पद बनाने पर जिनकी सूचनाएँ संबद्ध हो जाती हैं-

लिंग, वचन, पुरुष, काल, पक्ष, वृत्ति, कारक, वाच्य

9. व्युत्पादन (Derivation) की प्रक्रियाएँ

9.1 प्रत्ययीकरण : उपसर्ग योग प्रत्यय योग

9.2 समास

9.3 अन्य (पुनरुक्ति, शून्य प्रत्यय योग आदि)

10. रूपिमिक प्रक्रियाएँ और संधि : संधि को रूपस्वनिमिकी (Morphophonemics) कहा गया है।

10. रूपसाधन (पदसाधन) (Inflection)

शब्दों से पदों का निर्माण। उदाहरण-

संज्ञा :

लड़का= लड़का, लड़के, लड़कों

विशेषण :

अच्छा = अच्छा, अच्छी, अच्छे

क्रिया :

खाना = खाता, खाती, खाते, खाया, खायी, खाये (खाई, खाए), खाओ, खाएँगे, ....

अन्य शब्दभेद एवं अविकारी शब्द

वाक्यविज्ञान (Syntax) की विषयवस्तु

वाक्यविज्ञान (Syntax) की विषयवस्तु

1. वाक्यविज्ञान के अंतर्गत आने वाले भाषिक स्तर

·       पदबंध

·       उपवाक्य

·       वाक्य

2. पदबंध (Phrase) क्या है?

कोई एक पद या एक से अधिक पदों का वह समूह जो वाक्य में एक ही इकाई का प्रकार्य (function) करता है, पदबंध है। उदाहरण-

बच्चा मिठाई खाएगा। => प्रकार्य => (कर्ता + कर्म + क्रिया) = 03 पदबंध

छोटा बच्चा ताजी मिठाई खाता है। => प्रकार्य => (कर्ता + कर्म + क्रिया) = 03 पदबंध

3. पदबंध के प्रकार

(क) संरचना की दृष्टि से : अंतःकेंद्रिक (03) और बाह्यकेंद्रिक (02)

(ख) प्रकार्य की दृष्टि से :

·       संरचनात्मक प्रकार्य = संज्ञा पदबंध, सर्वनाम पदबंध, क्रिया पदबंध, विशेषण पदबंध .....

·       व्याकरणिक/वाक्यात्मक प्रकार्य = कर्ता पदबंध, कर्म पदबंध, करण पदबंध ......

4. उपवाक्य (Clause) क्या है?

असरल वाक्यों (संयुक्त और मिश्र वाक्यों) में आने वाले वाक्य स्तर के भाग (या अंश) उपवाक्य कहलाते हैं। उपवाक्य सरल वाक्य ही होते हैं, लेकिन वे आपस में जुड़कर बड़े वाक्य का निर्माण करते हैं, जैसे-

·       वह लड़का बाहर बैठा है जो कल आया था। => (मिश्र वाक्य) => दो उपवाक्य

·       मैंने कहा कि तुम घर जाओ। => (मिश्र वाक्य) => दो उपवाक्य

·       आज भारत मैच जीतेगा या वर्ल्ड कप से बाहर हो जाएगा।=> (संयुक्त वाक्य) => दो उपवाक्य

5. उपवाक्य के प्रकार (Types of Clause)

(क) मुख्य उपवाक्य

(ख) आश्रित उपवाक्य (संज्ञा उपवाक्य, विशेषण उपवाक्य, क्रियाविशेषण उपवाक्य)

6. वाक्य क्या है? (What is Sentence?)

शब्दों या पदों का वह समूह जिससे कम-से-कम एक सूचना का संप्रेषण होता है, वाक्य है।

पारंपरिक परिभाषा

पूर्ण मंतव्य की प्रतीति कराने वाले पद समूह को वाक्य कहते हैं।

उदाहरण-

·       मोहन बाजार जाता है।

·       रमेश मेरा काम नहीं करेगा।

·       तुम खेलो।

7. वाक्य के प्रकार (Types of Sentences)

(क) संरचना की दृष्टि से- सरल, मिश्र और संयुक्त वाक्य

(ख) अर्थ की दृष्टि से- कथनात्मक, आज्ञार्थक और मनोभावात्मक वाक्य

8. वाक्य : विविध पक्ष

(क) वाक्य के आधारभूत घटक (उद्देश्य और विधेय)

(ख) वाक्यात्मक युक्तियाँ (आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि)

(ग) वाक्य और कारक संबंध

(घ) वाक्य विश्लेषण के सिद्धांत

विस्तार से पढ़ें-

https://lgandlt.blogspot.com/2018/06/blog-post_66.html


Tuesday, February 9, 2021

समाजभाषाविज्ञान (Sociolinguistics) : एक परिचय

समाजभाषाविज्ञान (Sociolinguistics)

समाजभाषाविज्ञान वह विषय है जिसमें भाषा और समाज के परस्पर संबंधों का अध्ययन किया जाता है और इसमें यह देखा जाता है कि भाषाएँ समाज को कैसे प्रभावित करती हैं या समाज भाषाओं को कैसे प्रभावित करता है।

समाज क्या है?

 समाज मानव संबंधों का जाल है। जब समान प्रकार लोग विभिन्न संबंधों के माध्यम से आपस में जुड़ते हैं तो समाज का निर्माण होता है। यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि समाज का अर्थ भीड़ नहीं है, बल्कि विभिन्न संबंधों के माध्यम से जुड़े हुए लोगों का व्यवस्थित समूहीकरण है। एक समाज के लोग अपने समान उद्देश्यों, मान्यताओं और परंपराओं आदि के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। समाज को सामाजिक विज्ञान में विविध प्रकार से परिभाषित किया गया है। विविध शब्दकोशों में समाज की परिभाषाएँ देखी जा सकती हैं।

उदाहरण के लिए मेरियम वेबस्टर शब्दकोश में समाज की परिभाषाएँ इस प्रकार से दी गई हैं-

Definition of society

 (Entry 1 of 2)

1companionship or association with one's fellows friendly or intimate intercourse COMPANY

2a voluntary association of individuals for common endsespecially an organized group working together or periodically meeting because of common interests, beliefs, or profession

3aan enduring and cooperating social group whose members have developed organized patterns of relationships through interaction with one another

ba community, nation, or broad grouping of people having common traditions, institutions, and collective activities and interests

4aa part of a community that is a unit distinguishable by particular aims or standards of living or conduct a social circle or a group of social circles having a clearly marked identityliterary society

ba part of the community that sets itself apart as a leisure class and that regards itself as the arbiter of fashion and manners

.....

 (संदर्भ- https://www.merriam-webster.com/dictionary/society) 

समाज के संदर्भ में भाषा

मूलतः भाषा एक व्यवस्था है जो ध्वनि को अर्थ से जोड़ती है।

ग + आ + य   =>   गायें बैठी हैं

C+O+W  => The cows are sitting.

भाषा और समाज का संबंध

समाज

भाषा

 

 

 

 


मानव जाति की संपूर्ण व्यवस्था समाज के माध्यम से ही संचालित हो रही है। हमारी सभ्यता का संपूर्ण विकास हमारी सामाजिक संरचना से जुड़ा रहा है। समाज की अवधारणा के अंतर्गत मनुष्य, परिवार, सभ्यता, संस्कृति आदि सभी चीजें आ जाती हैं। किसी भी समाज के सदस्य विभिन्न प्रकार से वर्गीकृत भी देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए-

·       आयु के आधार पर

·       लिंग के आधार पर : पुरुषx- x1,x2,x3…   - महिला y- y1,y2,y3…

·       क्षेत्र के आधार पर

·       शिक्षा के आधार पर

·       आय/वर्ग के आधार पर : उच्च, मध्य और निम्न

·       धर्म के आधार पर

आदि।

इस तरह के विविध आधारों पर एक ही समाज में भिन्न-भिन्न वर्ग और उपवर्ग देखे जा सकते हैं। इन वर्गों या उपवर्गों के बीच भाषा व्यवहार में पर्याप्त समानता के बावजूद कुछ वैविध्य भी प्राप्त होता है। समाजभाषाविज्ञान का उद्देश्य मानव समाजों में भाषा की स्थिति और विभिन्न सामाजिक संरचनाओं और वर्गों उप वर्गों में भाषा व्यवहार में भेद का अध्ययन-विश्लेषण करना है। उदाहरण के लिए लिंग के आधार पर पुरुषों और स्त्रियों के भाषा व्यवहार में अंतर देखा जा सकता है।

भाषायी समाज और भाषाओं का मिलना

विश्व में हजारों का भाषाओं का व्यवहार होता है। मानव सभ्यता के विकास के क्रम में यातायात के साधनों और संचार के साधनों का निरंतर विकास हुआ है। इससे एक से अधिक भाषायी समाजों या समुदायों में आदान-प्रदान हुआ है। इस कारण उनकी सभ्यता और संस्कृति का भी आदान-प्रदान हुआ है। इस क्रम में भाषा भी प्रभावित होने से नहीं बची है। जब एक से अधिक भाषाओं के लोग आपस में मिलते हैं तो उनकी परस्पर भाषिक आदान-प्रदान भी होता है। इस कारण निम्नलिखित प्रकार की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं-

·       कोड मिश्रण

·       कोड परिवर्तन

समाजभाषाविज्ञान में भाषा को कोड कहा गया है। इसके कारणों पर अलग से चर्चा की जा सकती है। इस दृष्टि से उक्त अवधारणाओं को इस प्रकार से व्याख्यायित कर सकते हैं-

·       कोड मिश्रण : किसी एक भाषा के वाक्यों में दूसरी भाषा के शब्दों के प्रयोग की स्थिति कोड-मिश्रण है, जैसे-

सर, मेरी बुक का पेज नहीं दिख रहा है।

यहाँ हिंदी वाक्य में अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग का कोड-मिश्रण है।

·       कोड परिवर्तन : जब किसी एक भाषा के कथन में किसी दूसरी भाषा का पूरा का पूरा वाक्य ही आ जाए तो ऐसी स्थिति को कोड-परिवर्तन कहते हैं, जैसे-

आपका आना अच्छा लगा, यू आर मोस्ट वेलकम। तो अब आगे बढ़ते हैं।

यहाँ हिंदी कथन में अंग्रेजी वाक्य का कोड-मिश्रण है।

एक समाज में एकाधिक भाषाओं का व्यवहार

किसी भी भाषायी समाज में एकाधिक भाषाओं के व्यवहार के कारण कुछ विशेष प्रकार की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जैसे-

द्विभाषिकता (Bilingualism)- किसी भाषायी समाज में दो भाषाओं का व्यवहार होना।

बहुभाषिकता (Multilingualism)- किसी भाषायी समाज में दो से अधिक भाषाओं का व्यवहार होना।

भाषा प्रभुत्व (Language Dominance)- किसी भाषायी समाज में एक से अधिक भाषाओं का व्यवहार होने की स्थिति में किसी एक भाषा का व्यवहार अधिक प्रभुत्वशाली माना जाना, जैसे- हिंदी भाषी समाज में अंग्रेजी का व्यवहार प्रभुत्वशाली माना जाता है। यद्यपि यह पूर्णतः एक काल्पनिक मानसिक वृत्ति है। इसका कारण समाज का आय या वर्ग के आधार पर किया जाने वाला वर्गीकरण है। इसमें तथाकथित उच्च वर्ग द्वारा जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है, उसे ही प्रभुत्वशाली भाषा मान लिया जाता है।

भाषा अंतरण (Language Shift): बहुभाषिकता की स्थिति में प्रभुत्वशाली भाषा की ओर होता है। पूरे समाज का होता है।

संकटापन्न भाषा (Endangered Language): बोलने वालों की संख्या बहुत कम हो गई हो। नई पीढ़ी उसे न सीख रही हो।

भाषा मृत्यु (Language Death): किसी भाषा को बोलने वाले सारे लोग अपनी भाषा छोड़कर किसी अन्य भाषा का प्रयोग करने लगें। कोई आदिवासी भाषा। सरकारी विद्यालय- हिंदी/अंग्रेजी।

भाषा अनुरक्षण (Language Maintenance): अपनी भाषा के प्रति सजग होना और उसे बचाए रखने के लिए उसका व्यवहार करना। दो पक्ष-

उस भाषायी समाज के लोगों द्वारा स्वयं से आरंभ करना।

सरकारी/गैरसरकारी (संस्थागत) प्रयास : मातृभाषा दिवस, 21 फरवरी

किसी स्थान विशेष पर भिन्न-भिन्न भाषियों के मिलने से उत्पन्न होने वाली स्थितियाँ

पिजिन

मारीशस = हिंदी + फ्रेंच को मिलाकर एक नई भाषा विकसित हो गई= पिजिन

क्रिओल

पिजिन ही जब मातृभाषा बन जाती है, तो क्रिओल कहलाने लगती है।