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Thursday, March 22, 2018

एफ. डी. सस्यूर (1857-1913)

एफ. डी. सस्यूर (1857-1913)

सस्यूर का जन्म 1857 ई. में हुआ। ये जेनेवा विश्वविद्यालय में संस्कृत, भारत यूरोपीय भाषाओं के प्रोफ़ेसर थे। भाषा में इनकी विशेष रुचि थी। इस रूचि का परिचय इन्होंने 21 साल की छोटी उम्र में ही दे दिया था, जब उन्होंने ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषाविज्ञान पर अपना एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख में सस्यूर ने तालव्य नियमों की खोज की। सस्यूर भाषाविज्ञान के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहे। इस दौरान उन्हें महसूस होता था कि भाषा विश्लेषण की अभी भी कोई अच्छी पद्धति विकसित नहीं हो सकी है। इसलिए उन्होंने अपने स्तर पर इस क्षेत्र में चिंतन जारी रखा। 1890 के दशक में वे जिनेवा विश्वविद्यालय में इंडो यूरोपियन भाषाओं का अध्यापन कर रहे थे। इसी दौरान 1906 से 1911 के बीच उन्हें तीन बार सामान्य भाषाविज्ञान के विद्यार्थियों को पढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ। इसमें उन्होंने भाषा विश्लेषण संबंधी अपने मौलिक सिद्धांतों के आधार पर भाषण दिए। 1913 ई. में सस्यूर की मृत्यु हो गई।
सस्यूर की मृत्यु के पश्चात उनके दो शिष्य चार्ल्स बेली और अल्बर्ट सैचेहाये ने उनके विचारों की महत्ता को समझा तथा उनके विद्यार्थियों से नोट्स का संकलन करके उन्हें पुस्तकाकार रूप दिया, जिसे 1916 ई. में Cours de linguistique générale नाम से प्रकाशित किया गया।

इसका 1959 में Wade Baskin द्वारा अंग्रेजी अनुवाद Course in General Linguistics नाम से किया गया।
सस्यूर द्वारा दी गई भाषा संबंधी कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाएँ इस प्रकार हैं-
1. पदार्थ (Substance) और रूप (Form) के संदर्भ में भाषा
सस्यूर ने कहा कि किसी भी भाषा के दो पक्ष होते हैं- विचार और ध्वनि। इनमें विचार की सत्ता मानसिक होती है। अर्थात वह संकल्पनात्मक रूप में होता है, और ध्वनि की सत्ता भौतिक होती है। इसे समझाते हुए उन्होंने पदार्थ और रूप को अलग-अलग परिभाषित किया। उनके अनुसार भाषा में ध्वनि पदार्थ है, जिसके माध्यम से भाषा व्यवहार होता है, और भाषा एक रूप है जो अमूर्त होती है।
2. संकेत के संदर्भ में भाषा (Language with Reference to Sign)
सस्यूर ने रूप को संकेत (Sign) का संदर्भ देते हुए भाषा को संकेत व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया इसे समझाने के लिए उन्होंने संकेत के दो भाग किए। संकेतक (Signifier) और संकेतित (Signified) इन्हें निम्नलिखित आरेख में देखा जा सकता है-

संकेतक वह है जिसके माध्यम से कोई भी संकल्पना हमारे मन में उभरती है। संकेतित वह है जो संकेतक के माध्यम से बिंब के रूप में हमारे मन-मस्तिष्क में उभरता है। इन दोनों के बीच का संबंध संकेत है।
सस्यूर ने संकेत (Sign) के तीन प्रकार किए-
1.      प्रतिमापरक संकेत (Iconic Sign)
ऐसे संकेत जिनमें संकेतक में संकेतित की छवि निहित होती है ,जैसे- मूर्ति चित्र फोटो आदि।
2.      इंगितपरक संकेत (Indexical Sign)
 ऐसे संकेत जिसमें संकेतक और संकेतित के बीच कार्य कारण संबंध होता है। अर्थात एक के होने पर दूसरे की संभावना बताई जा सकती है, जैसे धुआं देखकर आग बताना, बादल देखकर बारिश की संभावना करना आदि।
3.      वास्तविक संकेत (Sign Proper)
ऐसे संकेत जिनमें संकेतक और संकेतित के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता, बल्कि माना हुआ संबंध होता है। इस दृष्टि से भाषा पर विचार करते हुए सस्यूर ने कहा कि भाषा के सभी संकेत वास्तविक संकेत होते हैं, क्योंकि इनमें संकेतक ध्वनि यादृच्छिक होते हैं, जिनके माध्यम से अर्थ संबंधी संकल्पनाएँ उभरती हैं। किसी संकल्पना को व्यक्त करने वाले ध्वनि समूह और उस संकल्पनात्मक अर्थ में कोई सीधा संबंध नहीं होता। उदाहरण के लिए पानी के अंतर्गत- प, आ, न, ई ध्वनियों में ऐसी कोई बात नहीं है, जिससे पानी की आकृति मस्तिष्क में उभरे। हिंदी भाषियों ने आरंभ में पानी का अर्थ जल (बाह्य संसार में दिखने वाला पानी) मान लिया और हम भी मानते हैं। इसी कारण एक ही संकल्पना के लिए भिन्न-भिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न शब्द होते हैं।
3. संकेतविज्ञान (Semiotics) के संदर्भ में भाषाविज्ञान
सस्यूर ने बताया कि भाषा संप्रेषण की सबसे अधिक सशक्त व्यवस्था है। संप्रेषण के लिए अन्य प्राणियों द्वारा कुछ अन्य संकेत व्यवस्थाओं का भी प्रयोग किया जाता है, जैसे- मधुमक्खियों की भाषा, मछलियों की संकेत व्यवस्था, चीटियों की संकेत व्यवस्था या मनुष्य द्वारा यातायात में प्रयुक्त संकेत व्यवस्था आदि। सस्यूर ने कहा कि इन सभी के लिए एक व्यापक विज्ञान के रूप में संकेतविज्ञान के रूप में मान सकते हैं। इस प्रकार की सभी संकेत व्यवस्थाओं में भाषा यानी मानव भाषा सबसे अलग और सबसे विकसित है। भाषाविज्ञान का लक्ष्य केवल मानव भाषा का ही अध्ययन करना है। अतः भाषाविज्ञान संकेतविज्ञान का एक अंग या एक शाखा है।
4. भाषा व्यवस्था (langue) और भाषा व्यवहार (parole)
सस्यूर ने लांग और पैरोल नाम से भाषा व्यवस्था और भाषा व्यवहार को अलग-अलग परिभाषित किया। इन्हें हिंदी विद्वानों द्वारा भाषा (लांग) और वाक् (पैरोल) कहा गया है। उन्होंने कहा कि भाषा एक व्यवस्था है जबकि वाक् उसका व्यवहारिक रूप है। भाषा संबंधित भाषा ही समाज के मस्तिष्क में निहित होती है। जबकि वाक् प्रत्येक व्यक्ति द्वारा भाषा का प्रयुक्त रूप है। इसलिए भाषा की सत्ता मानसिक है, जबकि वाक् की सत्ता भौतिक है। भाषा अमूर्त होती है, जबकि वाक् मूर्त होता है, जिसे हम देखते सुनते या समझते हैं।
5. एककालिक (Synchronic) और कालक्रमिक (Diachronic) अध्ययन
सस्यूर के पहले भाषाविज्ञान मूलतः ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन (Historical and Comparative study) पर आधारित था, जिसे हम 'भाषाशास्त्र' (philology) के नाम से भी जानते हैं। सस्यूर ने ऐतिहासिक और एक ही काल बिंदु पर किए जाने वाले भाषा अध्ययन को अलगाते हुए 'एककालिक और कालक्रमिक अध्ययन' की भिन्नता की ओर स्पष्ट संकेत किया। एककालिक अध्ययन से तात्पर्य है- किसी काल बिंदु विशेष पर किसी भाषा के स्वरूप का अध्ययन करना। उदाहरण के लिए 2018 ई. में हिंदी का स्वरूप क्या है? या 1850 ई. में हिंदी का स्वरूप क्या था? इनमें से कोई भी एक अध्ययन एककालिक अध्ययन होगा। कालक्रमिक अध्ययन से तात्पर्य है - विभिन्न काल बिंदुओं पर किसी भाषा के विकासात्मक स्वरूप का अध्ययन। उदाहरण के लिए सन् 1800, 1900, 2000 में हिंदी का स्वरूप कैसे परिवर्तित हुआ? यह अध्ययन कालक्रमिक अध्ययन कहलाएगा। इन्हें अलगाते हुए सस्यूर ने कहा कि भाषा का एककालिक अध्ययन ही भाषाविज्ञान का केंद्रीय विषय है। हमें भाषा के किसी काल बिंदु विशेष पर उपलब्ध स्वरूप का ही अध्ययन करना चाहिए। भाषावैज्ञानिकों को इसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस अवधारणा के बाद से वर्णनात्मक भाषाविज्ञान का उद्भव हुआ और लोगों ने इस दिशा में काम आरंभ किया।
6. विन्यासक्रमी (Syntagmatic) और सहचारक्रमी (Associative/Paradigmatic) संबंध
सस्यूर ने कहा कि भाषा भाषिक इकाइयों के बीच प्राप्त विभिन्न प्रकार के संबंधों पर आधारित होती है। इन संबंधों को दो प्रकार से देखा जा सकता है- विन्यासकर्मी और सहचारक्रमी।
विन्यासक्रमी संबंध शब्दों या पदों, पदबंधों, वाक्यों में आने वाली किसी भी भाषिक इकाई का अपने दोनों ओर की अन्य भाषा इकाइयों के साथ होता है, जैसे-
मोहन घर जाता है।
    इसमें मोहन का घर से, घर का मोहन और जाता से, जाता का घर और है से विन्यास क्रमी संबंध है।
    सहचारक्रमी संबंध इससे अलग होता है। यह वाक्य में किसी प्रकार्य-स्थान पर आ सकने वाले उन सभी संभावित शब्दों के बीच होता है, जो किसी वाक्य-रचना में उसी रूप में आ सकें और वाक्य का अर्थ या स्वरूप प्रभावित न हो। उदाहरण के लिए मोहन घर जाता है वाक्य में मोहन की जगह रमेश, श्याम बच्चा, बूढ़ा, लड़का आदि कोई भी शब्द आ सकता है, तो ये आपस में सहचारक्रमी संबंध में हैं। इसी प्रकार घर की जगह स्कूल, अस्पताल, बाजार, ऑफिस, दुकान, मंदिर आदि शब्द आ सकते हैं, इसलिए ये आपस में सहक्रमी संबंध में हैं। इसी प्रकार जाता की जगह आता, पहुँचता आदि शब्द आ सकते हैं। है की जगह था, होगा आदि शब्द आ सकते हैं। ये सभी आपस में सहक्रमी संबंध में हैं।
इसे उदाहरण सहित समझने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जाएँ- 
विन्यासक्रमी और सहचारक्रमी संबंध

1 comment:

  1. बहुत सरल रूप में Saussure के भाषा विज्ञान को समझाया गया है इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार.

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