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Friday, April 24, 2020

हिंदी क्रिया: व्यु‍त्पन्न अकर्मक, सकर्मक और प्रेरणार्थक


हिंदी क्रिया: व्यु‍त्पन्न अकर्मक, सकर्मक और प्रेरणार्थक
जिन शब्दों से किसी कार्य का करना या होना पाया जाता है, उन्हें क्रिया शब्द कहते हैं। क्रिया एक महत्वपूर्ण शब्दभेद (Parts of Speech) है। वाक्य-निर्माण की दृष्टि से देखा जाए तो क्रिया वाक्य निर्माण की सबसे आधारभूत इकाई है। क्रिया ही यह तय करती है कि वाक्य में कौन-कौन से घटक प्रयोग में आ सकते हैं और वे किन रूपों में आ सकते हैं।
 क्रिया के प्रकार
क्रिया के प्रकार कई आधारों पर किए जाते हैं। उदाहरण के लिए हम कुछ आधारों पर क्रिया के प्रकार इस प्रकार से देख सकते हैं-
(1) कर्मकता के आधार पर
·       अकर्मक क्रिया
·       सकर्मक क्रिया
·       द्विकर्मक क्रिया
(2) अभिव्यक्त अर्थ के आधार पर
·       स्थितिबोधक क्रियाएँ (State Verbs)  
·       कार्यबोधक (Action verb)
·       प्रक्रियाबोधक क्रियाएँ (Process Verbs)
·       स्थिति-प्रक्रियाबोधक क्रियाएँ (Action-process Verbs)
(3) प्रकार्य के आधार पर
·       मुख्य क्रिया
·       सहायक क्रिया
·       रंजक क्रिया
रचना के आधार पर
इस आधार पर हम क्रियाओं को शाब्दिक रचना दृष्टि से यह देखते हैं कि वे क्रियाएं कैसे बनती हैं। इस दृष्टि से क्रिया के निम्नलिखित प्रकार किए जा सकते हैं।
·       मूल क्रिया- यह क्रिया का मूलभूत रूप है। अर्थात वास्तविक संसार में क्रिया जिस तरह से घटित होती है, उसे अभिव्यक्त करने लिए यह जिन शब्दरूपों का प्रयोग होता है, वे मूल क्रिया के अंतर्गत आते हैं। ये अकर्मक, सकर्मक, द्विकर्मक तीनों रूपों में हो सकते हैं।
उदाहरण-
·       अकर्मक : चलना, बैठना, उठना आदि।
·       सकर्मक- पढ़ना, रखना, लिखना, देखना आदि।
·       द्विकर्मक- देना, पढ़ाना आदि।
·       व्युत्पन्न अकर्मक- सामान्यतः क्रियाएं अपने अर्थ के आधार पर ही अकर्मक, सकर्मक अथवा द्विकर्मक होती हैं, जैसे- चलना क्रिया अकर्मक क्रिया है, क्योंकि इसके साथ कर्म नहीं आ सकता।
वह चल रहा है।
वह जा रहा है।
इन वाक्यों में चलना क्रिया या जाना क्रिया का कोई कर्म नहीं है।
चलना, उठना, बैठना, गिरना आदि क्रियाएं अकर्मक क्रियाएँ हैं, किंतु हिंदी में कुछ ऐसी क्रियाएं भी बनती हैं जो अपने मूलभूत स्वरूप में सकर्मक होती हैं, किंतु हम उनका अकर्मकीकरण कर देते हैं। ऐसी स्थिति में उनका कर्म ही कर्ता बन जाता है। सकर्मक से अकर्मक के रूप में उत्पन्न की गई क्रियाओं को व्युत्पन्न अकर्मक क्रिया कहते हैं। उदाहरण के लिए-
जोतना से जुतना
खोदना से खुदना
तोड़ना से टूटना
ठीक करना से ठीक होना
पीटना से पिटना
धोना से धुलना
ये सारी क्रियाएं अपनी मूलभूत सकर्मक क्रियाओं से जानबूझकर अकर्मकीकरण करके बनाई गई क्रियाएं हैं। अतः ये व्युत्पन्न अकर्मक क्रियाएँ हैं।
·       सकर्मक क्रिया:- वे क्रियाएँ जिनसे जिन्हें कर्म की आवश्यकता होती है, सकर्मक क्रिया कहलाती हैं। सभी क्रियाओं को कर्ता की आवश्यकता होती है, लेकिन कर्म की आवश्यकता केवल उन्हीं क्रियाओं को होती है, जो सकर्मक होती हैं। सकर्मक क्रिया की पहचान उसके पहले क्या लगाकर की जा सकती है। यदि क्रिया से पहले क्या लगाने पर हमें कोई उत्तर मिले और वह उत्तर कर्ता न हो, तो समझिए कि वह क्रिया सकर्मक है, और यदि उत्तर ना मिले या उत्तर कर्ता मिले तो समझिए कि वह अकर्मक क्रिया है, जैसे-
खाना, रखना, पीटना, चुराना, फेंकना, फाड़ना आदि सकर्मक क्रियाएँ हैं।
·       प्रेरणार्थक क्रिया- इन्हें हम क्रियाओं के प्रेरणार्थक रूप भी कहते हैं। मूल क्रियाओं का प्रेरणार्थीकरण भी किया जाता है। इसमें शब्दों के ऐसे रूप बनाए जाते हैं कि क्रिया का कर्ता किसी अन्य कर्ता से प्रेरित हो जाता है, और उसके द्वारा संपन्न किया जाने वाला कार्य दूसरे कर्ता (प्रेरणार्थक कर्ता) द्वारा कराया जाने लगता है।
क्रियाओं के दो तरह के प्रेरणार्थक रूप बनते हैं- प्रथम प्रेरणार्थक और द्वितीय प्रेरणार्थक। इन्हें हम इस प्रकार देख सकते हैं-
मूल क्रिया                 प्रथम प्रेरणार्थक                द्वितीय प्रेरणार्थक
खाना                       खिलाना                         खिलवाना
देना                         दिलाना                          दिलवाना
पीना                        पिलाना                          पिलवाना

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