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Friday, December 17, 2021

संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और भाषाविज्ञान की अन्य शाखाएँ

संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और भाषाविज्ञान की अन्य शाखाएँ

संज्ञानात्मक भाष विज्ञान एक अंतरानुशासनिक ज्ञानक्षेत्र है। यह भाषा, दर्शन, मन, समाज और तर्क संबंधी अनेक विषयों के साथ जुड़ा हुआ है। इस क्रम में भाषाविज्ञान की कुछ ऐसी शाखाएँ भी हैं, जो संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान के साथ आधार रूप में जुड़ी हुई हैं। इस प्रकार की कुछ शाखाओं को नीचे दिए गए लिंकों पर देख सकते हैं -

संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और मनोभाषाविज्ञान

संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और प्रोक्ति विश्लेषण

संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और प्रकरणार्थविज्ञान

संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान और प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान


आर्थी निरूपण के संज्ञानात्मक सिद्धांत (Cognitive theories of semantic representation)

आर्थी निरूपण के संज्ञानात्मक सिद्धांत (Cognitive theories of semantic representation)

1950 के दशक से बाद से ही संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त काम किया गया है और इसी कालखंड में अर्थविज्ञान के क्षेत्र में भी अनेक आधुनिक पद्धतियों का विकास हुआ है। इनमें से कुछ पद्धतियाँ संरचनात्मक विश्लेषण से विकसित हुई हैं तो कुछ भाषा के मानसिक पक्षों पर केंद्रित हैं। इसी प्रकार की कुछ पद्धतियों में संज्ञानात्मक दृष्टि भी प्राप्त होती है  संज्ञानात्मक दृष्टि आधारित कुछ प्रमुख आर्थिक सिद्धांत इस प्रकार हैं -

§  वर्गात्मक प्रस्तुति (Categorical Representation)

§  रूपक’ (metaphor) और ‘रूपकीकरण’ (metonymy)

§  अमूर्तिकृत संज्ञानात्मक मॉडल (Idealized Cognitive ...

§  साँचापरक अर्थविज्ञान (Frame semantics)

इन्हें उपर्युक्त लिंकों को क्लिक करके संक्षेप में पढ़ा जा सकता है।

वर्गात्मक प्रस्तुति (Categorical Representation)

 वर्गात्मक प्रस्तुति (Categorical Representation)

बाह्य संसार में वस्तुओं की व्यवस्था देखकर ही स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें वर्गों, उपवर्गों में विभाजित करते हुए बहुत हद तक प्रस्तुत किया जा सकता है। उदाहरण के लिए कुत्ता और बिल्ली आपस में उसी प्रकार से संबंधित हैं, जैसे आम और नीम आपस में संबंधित हैं। इसी प्रकार के संबंधों को देखते हुए यह माना गया है कि हमारा मन या संज्ञान भी एक प्रक्रिया के माध्यम से चीजों और उनसे जुड़ी गतिविधियों को समझने का प्रयास करता है, जिसे वर्गात्मक प्रस्तुति नाम दिया जाता है।

इसके अनुसार हमारा मन कुछ वर्ग-उपवर्ग बनाता है और किसी वर्ग विशेष की विशेषता को उसके सदस्य उपवर्गों पर भी लागू करता है। उदाहरण के लिए पशुएक वर्ग है और कुत्ता, बिल्ली, ऊँट, गाय आदिइसके उपवर्ग हैं। अतः यदि कहा जाए कि पशु के चार पैर होते हैंतो यह बात कुत्ता, बिल्ली, ऊँट, गाय आदिसभी उपवर्गों के लिए सत्य होगी। आर्थी इकाइयों की इस प्रकार की प्रस्तुति को वर्गात्मक प्रस्तुति कहते हैं। इस प्रस्तुति की अवधारणा पर कुछ संज्ञानात्मक व्याकरण भी विकसित किए गए हैं, जैसे- कोट्यात्मक व्याकरण (Categorial Grammar) और शब्द व्याकरण (Word Grammar) आदि।

वर्गात्मक प्रस्तुति में बनाए जाने वाले कुछ संबंध इस प्रकार हैं-

वर्ग – उपवर्ग संबंध           :- जैसे- प्राणी- जानवर – कुत्ता

वर्ग/उपवर्ग – सदस्य संबंध :- जैसे- लड़की – सीता

(नोट- जब वर्ग-उपवर्ग बनाते हुए अंतिम इकाई तक पहुँच जाते हैं, जिसका एकल अस्तित्व होता है, तो वह सदस्य कहलाता है)

इकाई - अंग  संबंध                         :- जैसे- शरीर – हाथ

समानस्तरीय संबंध             :- कुत्ता- बिल्ली-गाय- भैंस (एक ही स्तर के संबंध = sister term)

इस प्रस्तुति में कुछ समस्याएँ भी आती हैं, जैसे- जलचर और थलचर दो समानस्तरीय वर्ग हैं। हाथी, कुत्ता आदि थलचर हैं तो मछली, कछुआ आदि, जलचर। किंतु मेंढक दोनों जगह पाया जाता है।

‘रूपक’ (metaphor) और ‘रूपकीकरण’ (metonymy)

 रूपक (metaphor) और रूपकीकरण (metonymy)

संज्ञानात्मक अर्थविज्ञान में रूपक (metaphor) और रूपकीकरण (metonymy) के संबंध में भी पर्याप्त विचार किया गया है। जब किसी एक वस्तु के अर्थ या भाव का विस्तार किसी दूसरी वस्तु तक इस प्रकार से किया जाता है कि दोनों में भेद ना रह जाए, तो इस विस्तार को रूपक कहते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात है कि साहित्य में रूपक एक अलंकार भी है। वहां पर रूपक अलंकार की परिभाषा देते हुए जो बात कही जाती है, वह यहां प्रयुक्त रूपक शब्द के अंतर्गत भी लागू होती है-

 रूपक अलंकार को समझाने के लिए साहित्य का सुप्रसिद्ध उदाहरण इस प्रकार है-

 चरण कमल बंदौ हरिराई।

 इसमें चरण को ही कमल मान लिया गया है, इसलिए यहां पर रूपक अलंकार का प्रयोग है।

 भाषा के स्तर पर भी हम देखते हैं कि भाषा विशाल मात्रा में रूपक गढ़ती है। अर्थात एक वस्तु के भाव का विस्तार दूसरी वस्तु तक कर देती है, यह विस्तार कई रूपों में होता है। उदाहरण के लिए जलना एक क्रिया है, यह क्रिया मूलतः आग द्वारा जलना का अर्थ प्रदान करती है, किंतु रूपकीकरण के माध्यम से निम्नलिखित रूपकों में इसका प्रयोग देखा जा सकता है-

रूपक स्तर -01

·       बल्ब जलाना

·       ट्यूबलाइट जलना

 रूपक स्तर -02

·       दिल जलना

·       खून जलना

रूपक स्तर -03

·       जल भुन जाना

·       किसी को देख कर जलना

 इसी प्रकार विभिन्न संज्ञा, विशेषण, क्रियाओं द्वारा प्रयुक्त शब्दों के अर्थ का विस्तार उसी प्रकार की दूसरी चीजों के लिए कर लिया जाता है और वह प्रयोग इतना रूढ़ हो जाता है कि ऐसा लगता ही नहीं है कि वह किसी अन्य शब्दार्थ का विस्तार है। इसे ही रूपक कहते हैं और रूपक बनने की प्रक्रिया को रूपकीकरण कहते हैं।