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Friday, December 24, 2021

मातृभाषा का व्याघात (Interference of Mother Tongue)

 मातृभाषा का व्याघात (Interference of Mother Tongue)

शिक्षार्थी की अपनी भाषा होने या नहीं होने के आधार पर भाषाओं के दो वर्ग किए जा सकते हैं-

(क) स्वभाषा-

मातृभाषा और प्रथम भाषा

(ख) अन्य भाषा-

द्वितीय भाषा, तृतीय भाषा और विदेशी भाषा

मानव शिशु या बच्चा अपनी मातृभाषा में सुनना और बोलना कौशलों का अर्जन अपने परिवार या परिवेश करता है। शेष दो कौशलों का अधिगम औपचारिक शिक्षण के माध्यम से करता है। मातृभाषा और प्रथम भाषा भिन्न होने पर भी प्रथम भाषा का इनपुट उसे परिवेश (टी.वी./औपचारिक कार्यक्रम आदि) से उसे मिलता रहता है। विद्यालय आदि में औपचारिक शिक्षण के माध्यम से चारों कौशलों का अधिगम करता है।

अतः मातृभाषा और प्रथम भाषा वह पहली बार ही सीख रहा होता है, इसलिए इनके संदर्भ में सामान्यतः कोई समस्या नहीं आती। कभी-कभी प्रथम भाषा पर मातृभाषा का प्रभाव देखने को मिल जाता है, जैसे- भोजपुरी भाषी क्षेत्र में हिंदी में भी ‘श/ष/स’ तीनों का उच्चारण ‘स’ ही होता है।

जब विद्यार्थी अन्य भाषा (द्वितीय भाषा, तृतीय भाषा और विदेशी भाषा) सीखता है तो उसके पास ‘मातृभाषा और प्रथम भाषा’ पहले से होती है। अतः नई भाषा सीखने में वह भाषा अपना प्रभाव डालती है, जिसे भाषा व्याघात (Language Interference) कहते हैं। यह व्याघात ‘सकारात्मक’ (positive) और ‘नकारात्मक’ (negative) दोनों हो सकता है। इसे चित्र रूप में निम्नलिखित प्रकार से दर्शा सकते हैं-

व्यतिरेकी विश्लेषण (Contrastive Analysis)

व्यतिरेकी विश्लेषण (Contrastive Analysis)

मातृभाषा व्याघात की समस्या से बचने के लिए भाषा शिक्षकों द्वारा शिक्षार्थी की मातृभाषा और लक्ष्य भाषाओं की तुलना करते हुए उनमें प्राप्त होने वाली समानताओं और असमानताओं का विश्लेषण किया जाता है, जिसे व्यतिरेकी विश्लेषण (Contrastive Analysis) कहते हैं। चूँकि समान भिन्नताएँ ही शिक्षार्थी को नई भाषा सीखने में समस्या उत्पन्न करती हैं, इसी कारण व्यतिरेकी विश्लेषण मूलतः भिन्नताओं पर केंद्रित होता है।

(नोट- यह भाषाविज्ञान में प्रचलित तुलनात्मक अध्ययन पद्धति से भिन्न है, जो समानताओं पर केंद्रित होती है)

व्यतिरेकी विश्लेषण में भाषाओं की स्थिति-

विद्यार्थी                    मातृभाषा        ß à लक्ष्य भाषा

(L1)                        (L2)

व्यतिरेकी विश्लेषण का कार्य भाषा के सभी स्तरों पर किया जाता/ जा सकता है। जिस स्तर पर व्यतिरेक प्राप्त होता है, उसी के अनुरूप शिक्षण बिंदु तैयार किए जाते हैं, जैसे -



व्यतिरेकी विश्लेषण संबंधी कार्य दो प्रकार के होते हैं-

और पढ़ें-

व्यतिरेकी विश्लेषण एवं भाषा शिक्षण


समाज सांस्कृतिक संदर्भ (Socio-Cultural Context)

 समाज सांस्कृतिक संदर्भ (Socio-Cultural Context)

भाषा अपने समाज की संस्कृति की भी संवाहक होती है। अतः जब विद्यार्थी किसी नई भाषा को सीखता है, तो भाषा के साथ-साथ उसे संस्कृति का भी परिचय देना आवश्यक हो जाता है। यह बात मुख्य रूप से ‘विदेशी भाषा शिक्षण’ के संदर्भ में लागू होती है। इसके अलावा द्वितीय और तृतीय भाषा शिक्षण में भी इसकी आवश्यकता हो सकती है।

भाषा में अनेक प्रकार की शब्दावली देखी जा सकती है, जैसे-

(क) आधारभूत शब्दावली :- फलों/फूलों/सब्जियों/जानवरों ....... के नाम।

(ख) तकनीकी शब्दावली

(ग) प्रक्षेत्र आधारित (Domain specific) शब्दावली, जैसे- बैंकिंग, रेलवे आदि।

(घ) साहित्यिक शब्दावली

(ङ) प्रयोजनमूलक शब्दावली          ..........

(च) सांस्कृतिक शब्दावली

इस प्रकार ‘सांस्कृतिक शब्दावली’ भाषा की आधारभूत शब्दावली का एक हिस्सा है। जब पाठक या विद्यार्थी किसी नई भाषा में कोई पाठ पढ़ता है, या फिल्म देखता है या उससे जुड़ी किसी घटना से गुजरता है, तो उसमें सांस्कृतिक शब्द आ जाते हैं। उन शब्दों के अर्थ का बोधन करने के लिए उस भाषायी समाज के ‘समाज-सांस्कृतिक संदर्भ’ का ज्ञान आवश्यक होता है।

उदाहरण-

विदेशियों को हिंदी शिक्षण

= विदेशी विद्यार्थी हिंदी सीख रहा है। उसे एक हिंदी पाठ का निम्नलिखित वाक्य मिलता है-

तुम तिलकधारी मेरे मंगलसूत्र की कीमल क्या समझोगे।

इस वाक्य में आए हुए ‘तिलकधारी’ और ‘मंगलसूत्र’ शब्दों के वास्तविक अर्थ समझाने के लिए शिक्षक को सर्वप्रथम इनका पूरा ‘समाज-सांस्कृतिक संदर्भ’ भी बताना/ समझाना होगा।

महात्मा गांधी पर बनी फिल्म के दो अंग्रेजी संस्करणों में उनके अंतिम उद्गार के लिए निम्नलिखित वाक्यों का प्रयोग किया गया था-

हे राम!           = Hey Ram! , Oh God.

वास्तव में ‘हे राम’ का अनुवाद ‘Oh God’ नहीं हो सकता, क्योंकि राम केवल भगवान का नाम नहीं है, बल्कि उसके बोधन का एक पूरा ‘समाज-सांस्कृतिक संदर्भ’ है।

अतः इस प्रकार की शब्दावली का प्रयोग होने पर उनके अर्थ का बोधन कराने के लिए पूरे ‘समाज-सांस्कृतिक संदर्भ’ के शिक्षण/ व्याख्या की आवश्यकता पड़ती है।

अंतरभाषा और त्रुटि-विश्लेषण

 अंतरभाषा और त्रुटि-विश्लेषण

 अंतरभाषा त्रुटि-विश्लेषण के अंतर्गत दी गई एक अवधारणा है। इसके अनुसार भाषा अधिगम के दौरान शिक्षार्थी के मस्तिष्क में उसकी मातृभाषा (मूल भाषा) और लक्ष्य भाषा (सीखी जाने वाली भाषा) के बीच की एक भाषा उत्पन्न होती है। अतः अधिगम के आरंभ में शिक्षार्थी उसी अंतरभाषा का व्यवहार करता है। जैसे-जैसे वह लक्ष्य भाषा को सीखता जाता है, उसकी अंतरभाषा लक्ष्य भाषा के पास पहुँचती जाती है। पूर्णतः सीख लेने के बाद इस भाषा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसे आरेख के रूप में निम्नलिखित प्रकार से दर्शा सकते हैं- 
नई भाषा सीखने की प्रक्रिया में शिक्षार्थी कहीं-कहीं लक्ष्य भाषा के वाक्यों की जगह अंतरभाषा के वाक्य ही बोल देता है। इस प्रकार होने वाली त्रुटियाँ अंतरभाषा संदर्भित त्रुटियाँ कहलाती हैं।