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Friday, August 9, 2019

time table 2019-20

 



दिसंबर 2019-अप्रैल 2020

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा

š

 
भाषाविज्ञान एवं भाषा प्रौद्योगिकी विभाग, भाषा विद्यापीठ

समय-सारिणी  : (सत्र : 2019-20)                                                            दिनांक : 10/12/2019

दिन

कक्षा

09-30: 10-30

10-30: 11-30

11-30 : 12-30

12-30 : 01-30

1-30:3-00

03-00 : 04-00

04-00 : 05-00

05-00 : 06-00

सोम.

बी.ए. -II

 

अ.कु.पा. (2BLTC1)

 

 

 

 

 

 

बी.ए. -IV

 

 

अ.कु.दु. (4BLTC1)

 

 

 

 

बी.ए. -VI

ध.प्र. (6BA1)

अ.कु.दु. (6BA4)

ह.प्र.शु. (6BA2)

ह.अ.हु. (6BA3)

 

 

 

एम.ए. - II

ह.प्र.शु. (2LTC3)

ध.प्र. (2LTC2)

 

अ.कु.दु. (2LTC1)

अ.कु.पा. (2LTO1)

 

 

एम.ए. - IV

 

ह.अ.हु. (4LTC3)

ध.प्र. (4LTC1)

ध.प्र. (4LTC2)

ह.अ.हु. (4LTO2)

अ.कु.पा.  (4LTO1)

 

एम.फिल- II

 

 

 

 

 

ह.प्र.शु. (IDC)

 

मंगल.

बी.ए. -II

 

अ.कु.पा. (2BLTC1)

 

 

 

 

 

 

बी.ए. -IV

 

 

अ.कु.दु. (4BLTC1)

अ.कु.दु. (2BLTC2)

 

 

 

बी.ए. -VI

ध.प्र. (6BA1)

अ.कु.दु. (6BA4)

ह.प्र.शु. (6BA2)

ह.अ.हु. (6BA3)

 

 

 

एम.ए. - II

ह.प्र.शु. (2LTC3)

ध.प्र. (2LTC2)

 

 

अ.कु.पा. (2LTO1)

 

 

एम.ए. - IV

 

ह.अ.हु. (4LTC3)

ध.प्र. (4LTC1)

ध.प्र. (4LTC2)

 

ह.अ.हु. (4LTO2)

 

एम.फिल- II

 

 

 

 

 

अ.कु.पा.(IDO)

 

बुध.

बी.ए. -II

 

अ.कु.पा. (2BLTC1)

 

 

 

 

 

 

बी.ए. -IV

 

 

अ.कु.दु. (4BLTC1)

 

 

 

 

बी.ए. -VI

ध.प्र. (6BA1)

अ.कु.दु. (6BA4)

ह.प्र.शु. (6BA2)

ह.अ.हु. (6BA3)

 

 

 

एम.ए. - II

ह.प्र.शु. (2LTC3)

ध.प्र. (2LTC2)

 

अ.कु.दु. (2LTC1)

अ.कु.पा. (2LTO1)

 

 

एम.ए. - IV

 

ह.अ.हु. (4LTC3)

ध.प्र. (4LTC1)

ध.प्र. (4LTC2)

 

ध.प्र. (4LTO1)

 

एम.फिल- II

 

 

 

 

 

अ.कु.पा.(IDO)

 

गुरु.

बी.ए. -II

 

अ.कु.पा. (2BLTC1)

 

 

 

 

 

 

बी.ए. -IV

 

 

अ.कु.दु. (4BLTC1)

ध.प्र.  (4BLTC2)

 

 

 

बी.ए. -VI

ध.प्र. (6BA1)

अ.कु.दु. (6BA4)

ह.प्र.शु. (6BA2)

ह.अ.हु. (6BA3)

 

 

 

एम.ए. - II

ह.प्र.शु. (2LTC3)

ध.प्र. (2LTC2)

 

अ.कु.दु. (2LTC1)

अ.कु.पा. (2LTO1)

 

 

एम.ए. - IV

 

ह.अ.हु. (4LTC3)

ध.प्र. (4LTC1)

 

 

अ.कु.पा.  (4LTO1)

 

एम.फिल- II

 

 

 

 

 

 

 

शुक्र.

बी.ए. -II

 

अ.कु.दु. (2BLTC2)

 

 

 

 

 

 

बी.ए. -IV

 

 

ध.प्र.  (4LTC2)

 

 

 

 

बी.ए. -VI

 

ह.अ.हु. (6BA4)

 

ह.अ.हु. (6BA4)

 

 

 

एम.ए. - II

 

 

 

अ.कु.दु. (2LTC1)

ह.अ.हु. (2LTO2)

ह.अ.हु. (2LTO2)

 

एम.ए. - IV

 

 

 

ध.प्र.  (4LTC2)

 

अ.कु.पा.  (4LTO1)

 

एम.फिल- II

 

 

 

 

 

ध.प्र.  (IDO)

 

 

 

बी.ए. सेमेस्टर –II                                                            बी.ए. सेमेस्टर –VI

2BLTC-1 : स्वनविज्ञान एवं स्वनिमविज्ञान                                6BA-1 : भाषा और कंप्‍यूटर

2BLTC-2 : लिपि और उसका भारतीय परिप्रेक्ष्य                         6BA-2 : समाज भाषाविज्ञान

बी.ए. सेमेस्टर –IV                                                           6BA-3 : मनोभाषाविज्ञान

4BLTC-1 : रूपविज्ञान                                                       6BA-4 : भाषा शिक्षण

4BLTC-2 : हिंदी भाषा की संरचना                                        6BA-4 :  कोशविज्ञान

 

 

                                            

 
*बी.ए. षष्ठ छमाही की समय-सारिणी विभागीय स्तर पर निर्माणाधीन है।

 

 

 

 

 

 

संकेताक्षरः

अ.कु.पा. : प्रो. अनिल कुमार पाण्‍डेय, अ.कु.दु. : डॉ. अनिल कुमार दुबे, ध.प्र. : डॉ. धनजी प्रसाद

एम.ए. सेमेस्टर –II                                                            एम.फिल.– II

2LTC-1 : रूप विज्ञान                                                        प्रैक्टिकम

2LTC-2 : भाषा प्रौद्योगिकी और प्राकृतिक भाषा संसाधन             IDC :  अंतरानुशासनिक अध्‍ययन

2LTC-3 : भाषा का सामाजिक पक्ष                                        IDO : अंतरानुशासनिक अध्‍ययन (अन्‍य विभाग )

2LTO-1 : हिंदी भाषा की संरचना

2LTO-2 : अनुवाद के भाषिक पक्ष

 

एम.ए. सेमेस्टर –IV                                                         

4LTC-1 : भाषा संसाधन एवं सॉफ्टवेयर निर्माण                         

4LTC-2 :                                                                     

4LTC-3 : अर्थविज्ञान

4LTO-1 : हिंदी भाषा की संरचना-2

4LTO-2 : कोश निर्माण : सिद्धांत एवं व्‍यवहार                                          

 
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


संकेताक्षर :

ह.प्र.शु. : प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्‍ल, अ.कु.पा. : डॉ. अनिल कुमार पाण्‍डेय, ह.अ.हु. : डॉ. एच. ए. हुनगुंद, अ.कु.दु. : डॉ. अनिल कुमार दुबे, ध.प्र. : डॉ. धनजी प्रसाद

·        समय सारणी प्रभावी होने की तिथि : विश्वविद्यालय के अकादमिक कैलेंडर 2019-20 के अनुसार।

·        सभी शिक्षक अपने रिक्त कालांशों में शोध/परियोजना/प्रयोगशाला संबंधी मार्गदर्शन के लिए विद्यार्थियों को प्रत्येक कार्यदिवस को उपलब्ध रहेंगे।

·        प्रति क्रेडिट निर्धारित शिक्षण और ट्यूटोरियल कक्षाओं का निर्णय संबंधित शिक्षक (शिक्षकों) द्वारा किया जाएगा।

·        प्रायोगिक/मेंटरिंग कक्षाएँ संबंधित कालांश में उपलब्ध शिक्षकों/शोधार्थियों द्वारा ली जाएँगी।

                                                                      

प्रो. अनिल कुमार पाण्डेय

                                                                                                                                                अध्यक्ष : भाषाविज्ञान एवं भाषा प्रौद्योगिकी विभाग

प्रतिलिपि :

1.        अकादमिक संयोजक कार्यालय

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


Tuesday, August 6, 2019

क्या इंसानी बुद्धिमत्ता का स्वर्णयुग आ चुका है?

BBC विशेष...

क्या इंसानी बुद्धिमत्ता का स्वर्णयुग आ चुका है?

इंसानी बुद्धिइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
आप ने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा-आज कल के बच्चे तो बहुत तेज़ होते हैं. हमारे ज़माने में ऐसा नहीं था.
बहुत से वैज्ञानिक भी ये मानते हैं कि इस दौर का इंसान अक़्लमंदी के शिखर पर है. इसे बुद्धिमत्ता का स्वर्ण युग कहा जा रहा है.
आज से सौ साल पहले आईक्यू टेस्ट यानी अक़्लमंदी मापने वाला टेस्ट ईजाद किया गया था. तब से पैदा हुई हर पीढ़ी ने इस टेस्ट में पिछली पीढ़ी के मुक़ाबले हमेशा बेहतर प्रदर्शन किया है. यानी 1919 के मुक़ाबले आज का औसत इंसान भी जीनियस है. वैज्ञानिक इसे फ़्लिन इफेक्ट कहते हैं.
हमें अक़्लमंदी के इस दौर का ख़ूब आनंद उठा लेना चाहिए. क्योंकि हालिया संकेत ये इशारा कर रहे हैं कि बुद्धिमत्ता का ये स्वर्ण युग ख़त्म होने वाला है. कुछ लोगों का दावा है कि इंसान बुद्धिमानी के शिखर पर पहुंच चुका है. अब उसकी अक़्ल का और विकास नहीं होगा.
क्या वाक़ई ऐसा है? क्या आज के दौर में मानवता बुद्धिमानी के शिखर पर पहुंच चुकी है? अगर, वाक़ई ऐसा है, तो फिर जब हमारी आने वाली पीढ़ियां धरती उतरेंगी, तो क्या वो कम बुद्धिमान होंगी? ऐसा हुआ तो क्या होगा?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए वक़्त के पहिये को पीछे की ओर घुमाते हैं और चलते हैं उस दौर में जब हमारे पुरखों ने चार पैरों के बजाय दो पांवों पर चलना शुरू किया था.
ऐसा क़रीब 30 लाख साल पहले हुआ था, जब प्राइमेट यानी वानर परिवार का विलुप्त हो चुका सदस्य ऑस्ट्रेलोपिथेकल ने दो पैरों पर चलना शुरू किया था. इसके कंकाल का अध्ययन कर के वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि उसका सिर 400 क्यूबिक सेंटीमीटर (सीसी) होता था. यानी ऑस्ट्रेलोपिथेकस का दिमाग़ आज के इंसान का एक तिहाई भर था.
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इंसान का दिमाग कितना बड़ा?

आज मानव का जितना बड़ा दिमाग़ होता है, उतना किसी और जीव का नहीं होता. इसकी हम भारी क़ीमत चुकाते हैं. हमारा मस्तिष्क हमारे शरीर की कुल ऊर्जा की ज़रूरत का 20 फ़ीसद अकेले चट कर जाता है.
अब अगर, दिमाग़ को इतनी ऊर्जा चाहिए, तो ज़ाहिर है क़ुदरत ने उसके ज़िम्मे बड़े काम भी कर रखे होंगे, ताकि जो खाना वो हजम कर रहा है, उसके बदले उतना ही काम भी करे.
इंसान का दिमाग़ इतना विकसित होने के कई कारण बताए जाते हैं. लेकिन, वैज्ञानिक इस बात पर एक मत हैं कि इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत समूह में रहने की वजह से पैदा हुई.
ऑस्ट्रेलोपिथेकस के बाद से मानवों के पूर्वज बड़े-बडे समूहों में रहने लगे थे. इसकी बड़ी वजह शायद ख़ुद को शिकारी जानवरों से बचाने की थी.
क्योंकि, सोते वक़्त ऐसे जानवरों के हमले का ख़तरा तब से बढ़ गया था, जब से हमारे पुरखे पेड़ों से उतर कर ज़मीन पर रहने लगे थे.
दिमाग़ के विकास की ज़रूरत इसलिए भी पड़ी होगी, ताकि संसाधनों का मिलकर इस्तेमाल कर सकें. जैसे कि जोखिम भरे इलाक़ों में रहने के ख़तरों से एक-दूसरे को आगाह करना और एक-दूसरे के बच्चों की देखभाल करना.
लेकिन, दूसरे लोगों के साथ रहना मुश्किल भरा होता है. ये तो आप और हम अपने तजुर्बे से भी कह सकते हैं. कई लोग एक साथ रहते हैं, तो एक-दूसरे के मिज़ाज को समझना होता है. उनकी पसंद-नापसंद जाननी ज़रूरी होती है.
फिर, उन में से किस के साथ गप-शप की जा सकती है, ये अंदाज़ा लगाने की ज़रूरत भी होती है. साथ में शिकार करने वालों के बीच तालमेल होना बहुत ज़रूरी है.
जैसे, आज के दौर में लोगों को एक-दूसरे के मिज़ाज और सामाजिक ज़रूरतों को समझना होता है. वैसे ही, हमारे पुरखों के लिए एक-दूसरे को समझना जीवन-मरण का प्रश्न होता था.
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कैसे हुआ विकास?

इसके अलावा साथ में रहने वाले लोग एक-दूसरे से अपने आइडिया शेयर करते रहे होंगे. जैसे कि, शिकार के लिए नए औज़ार बनाने और घर बनाने के नए नुस्खे ईजाद करना और आपस में शेयर करना.
इसके लिए बहुत अक़्ल चाहिए होती है. ताकि, दूसरों को देख कर ख़ुद वो काम करना सीख सकें. इन्हीं सब कारणों से इंसान के दिमाग़ का विकास होना शुरू हुआ होगा.
आज से क़रीब 4 लाख साल पहले हमारे एक और पूर्वज होमो हाइडेलबर्गेंसिस का दिमाग़ 1200 सीसी का होता था. जो आज के इंसानों से ज़रा सा ही छोटा होता है. आज हमारे मस्तिष्क का आकार 1300 सीसी के क़रीब होता है.
जब आधुनिक मानवों के पुरखों से 70 हज़ार साल पहले अफ्रीकी महाद्वीप को विदा कह कर दूसरे इलाक़ों में जाना शुरू किया था, तो वो धरती के हर कोने में रहने का हुनर सीख चुके थे.
गुफ़ाओं में मिले उस दौर के चित्र बताते हैं कि उस दौर के मानव अपनी उत्पत्ति जैसे मुश्किल विषयों के बारे में भी सोचने की क्षमता विकसित कर चुके थे.
कुछ विशेषज्ञ ये कहते हैं कि हमारे आईक्यू में आया हालिया बदलाव जेनेटिक है. लेकिन, इसे इसलिए मानना मुश्किल है कि जीन के ज़रिए बदलाव आने के लिए 100 बरस का वक़्त बहुत कम होता है.
वैसे, केवल आईक्यू टेस्ट के आधार पर आज के इंसान को सबसे अक़्लमंद कहना भी जोख़िम भरा ही है. इससे हम किसी की सामान्य बुद्धिमत्ता का ही अंदाज़ा लगा सकते हैं.
जैसे कि कोई अपनी पढ़ाई या करियर में कैसा रहेगा. इससे हम ये भी अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कोई इंसान नई चीज़ कितनी तेज़ी से सीखने के क़ाबिल है और पेचीदा जानकारी से काम की बात कितनी आसानी से निकाल सकता है.
हमारे आईक्यू के बढ़ने का सिलसिला बीसवीं सदी के आग़ाज़ से हुआ था. हालांकि मनोवैज्ञानिकों से इसकी तरफ़ हाल ही में ध्यान देना शुरू किया है. आईक्यू का अधिकतम स्कोर 100 ही होता है. इसी के आधार पर हर पीढ़ी के बढ़ते आईक्यू का अंदाज़ा हुआ.
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आईक्यू लेवल

जब रिसर्च जेम्स फ़्लिन ने आईक्यू टेस्ट के स्कोर पर ध्यान दिया, तो उन्होंने पाया कि हर दशक के साथ इस में तीन अंक बढ़ते आए हैं. कई देशों में ये पिछली सदी के मुक़ाबले 30 अंक तक बढ़ा हुआ दर्ज किया गया है.
वैसे, जानकारों का मानना है कि जेनेटिक बदलाव नहीं है. बल्कि लोगों के माहौल का असर ज़्यादा है.
पिछली एक सदी में बेहतर खान-पान और स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से हमारी लंबाई 19वीं सदी के मुक़ाबले औसतन 11 सेंटीमीटर तक बढ़ गई है. लेकिन, इसका ये मतलब नहीं कि हमारे जीन बदल गए हैं.
पिछले दो दशकों में स्वास्थ्य सेवाओं में बहुत सुधार आया है. आज हम ज़्यादा पोषक आहार लेते हैं. हमें बीमारियां कम होती हैं. इनका इलाज आसानी से हो जाता है. इनकी वजह से भी हमारा आईक्यू बेहतर हुआ है.
इसके अलावा पेट्रोल में सीसे की मात्रा कम होने की वजह से भी हमारी बुद्धि में सुधार आया है. हमारा ईंधन जितना साफ़ होगा, उतने ही हम चतुर होंगे.
वैसे, इंसान की बुद्धिमत्ता में बेहतरी की एक वजह ये भी हो सकती है कि हमारी शिक्षा भी बेहतर हुई है. बचपन से ही अब मुश्किल सवालों को हल करना सिखाया जा रहा है.
हमें नई-नई तकनीक का इस्तेमाल सीखना पड़ता है. जैसे कंप्यूटर, स्मार्टफ़ोन या फिर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनें. ऐसे माहौल में रहने की वजह से हमारी अक़्ल ज़्यादा तेज़ होती जा रही है.
लेकिन, कुछ देशों में आईक्यू लेवल घटता हुआ देखा जा रहा है. नॉर्वे और डेनमार्क जैसे देशों के लोगों का आईक्यू 90 के दशक से ही हर साल 0.2 अंक की दर से घटता दर्ज किया गया है. यही रफ़्तार रही तो इन देशों की दो पीढ़ियों के आईक्यू में 7 अंकों का फ़ासला आ जाएगा.
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बुद्धिमानी के साथ मूर्खता भी बढ़ रही है?

बहुत से जानकार मानते हैं कि आईक्यू के स्थिर होने का घटने की वजह यही है कि कुछ तकनीकों और चीज़ों के हम आदी हो गए हैं. उनके लिए कुछ नया सीखने की ज़रूरत नहीं है. जैसे कि आज कमोबेश हर बच्चा कैल्कुलेटर का इस्तेमाल जानता है.
अमरीका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट स्टर्नबर्ग कहते हैं कि, 'आज लोग मुश्किल से मुश्किल स्मार्टफ़ोन आसानी से चला लेते हैं. वो और नई तकनीक वाली मशीनों के इस्तेमाल के आदी हैं.
लेकिन, अगर हम उनके बर्ताव की बात करें, तो पिछले सौ साल में हमारा आईक्यू 30 अंक बढ़ने का कोई ख़ास फ़ायदा नहीं दिखता. तभी तो, 2016 के अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव इतने छिछोरे और स्तरहीन थे.
इसके अलावा ज़्यादा आईक्यू होने के बावजूद इंसान दुनिया की बड़ी समस्याओं जैसे अमीर-ग़रीब के बीच बढ़ती खाई, दुनिया भर में फैली ग़रीबी, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, हिंसा और ड्रग से मौत का हल नहीं खोज सके हैं.'
हालांकि हमें रॉबर्ट स्टर्नबर्ग जैसा निराशावादी नहीं होना चाहिए. दुनिया में ग़रीबी घटी है. सेहत के मोर्चे पर नई-नई खोज की जा रही है. भले ही हम इन समस्याओं को जड़ से नहीं मिटा सके हैं. लेकिन, इनका निदान खोजने की दिशा में आगे ज़रूर बढ़ रहे हैं.
अगर कोई अक़्लमंद है, तो उसे क्रिएटिव भी होना चाहिए. लेकिन, हमने पिछली एक सदी में लोगों की क्रिएटिविटी में बहुत क्रांतिकारी बदलाव होते नहीं देखा है. हम उतने तार्किक भी नहीं हुए हैं, जितना आईक्यू बढ़ने की वजह से होना चाहिए था.
आईक्यू बढ़ने के बावजूद हम 'फ्रेमिंग बायस' नाम की उस मनोवैज्ञानिक चुनौती से पार नहीं पा सके हैं. इसे इस तरह से समझिए. बहुत सी कंपनियां किसी सामान को 95 प्रतिशत फैट फ्री कह कर बेचती हैं.
वहीं कुछ इसे पांच प्रतिशत फैट युक्त कह कर बेचती हैं. दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं है. लेकिन, लोगों का झुकाव 95 प्रतिशत वसा मुक्त उत्पाद की तरफ़ होता है.
फिर, लोग 'कन्फर्मेशन बायस' के भी शिकार होते हैं. बढ़े आईक्यू के बावजूद, वो अपने पूर्वाग्रहों को सही साबित करने वाली बातों की तरफ़ ही झुकाव रखते हैं.
आज इंसान का आईक्यू बढ़ गया है. लेकिन, लोग फ़र्ज़ीवाड़ों के शिकार भी ज़्यादा हो रहे हैं. जोख़िम भरे काम में घाटे के बावजूद निवेश करते जाते हैं.
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अक़्ल बड़ी कि तार्किक सोच?
जबकि उन्हें नुक़सान उतने पर ही रोकने के लिए और जोखिम लेने से बचना चाहिए. बुद्धिमान से बुद्धिमान इंसान भी वक़्ती फ़ायदे के लिए दूरगामी फ़ायदे की तिलांजलि दे देता है.
हम अपने पूर्वाग्रहों को चुनौती देने वाली सोच विकसित करने में नाकाम हैं. किसी जानकारी का अभाव हमें अब भी नहीं अखरता. यही वजह है कि अक्सर लोग फ़ेक न्यूज़ के शिकार हो जाते हैं. अच्छी सोच के लिए ज़रूरी ये बातें, हमें बेहतर आईक्यू के बावजूद नहीं हासिल हैं.
कुल मिलाकर, आज की पीढ़ी आईक्यू टेस्ट में भले ही अच्छा प्रदर्शन कर रही हो, मगर, वो पेचीदा मसलों को लेकर अब भी तीक्ष्ण मस्तिष्क नहीं रखती. नतीजा ये कि लोग जोखिम लेते रहते हैं. कभी पैसे का, तो कभी सेहत का. और ख़ुद को नुक़सान पहुंचाते रहते हैं.
2008 का वित्तीय संकट हो या कोई बड़ी दुर्घटना, ये हमारी बढ़ती अक़्ल पर सवाल उठाने वाली घटनाएं हैं.
कुल मिलाकर, हमारा समाज और हमारी दुनिया बहुत पेचीदा होती जा रही है. लेकिन, इंसान की अक़्ल ऐसे माहौल के हिसाब से ख़ुद को अब तक नहीं ढाल सकी है. तभी, हमारे ग़लत फ़ैसले धरती पर भारी पड़ रहे हैं.
आज ज़रूरत बढ़े हुए आईक्यू की ख़ुशी मनाने की नहीं है, बल्कि, हमें अपनी अक़्ल को तार्किक सोच की तरफ़ मोड़ना होगा.
ऐसा मुमकिन है, ये तमाम मनोवैज्ञानिक रिसर्च से साबित हो चुका है. अक़्ल को हम तार्किक सोच का आदी बना सकते हैं.
ग़लतियां सुधारने और किसी भी फ़ैसले से पहले आगा-पीछा सोचने की आदत विकसित करना आज के इंसान के लिए बहुत ज़रूरी हो गया है.
तभी हमारी आने वाली पीढ़ियां अपने दौर की चुनौतियों से बेहतर ढंग से निपट सकेंगी.
यानी, बुद्धिमत्ता का स्वर्ण युग अभी आना बाक़ी है.

Friday, August 2, 2019

CREATING ONLINE RESOURCES FOR LANGUAGE REVITALIZATION

By Christina Wasson
The United Nations declared 2019 the International Year of Indigenous Languages to “focus global attention on the critical risks confronting indigenous languages” and to “increase the capacity of all stakeholders to take measures that will support, access and promote indigenous languages in accordance with the legitimate rights of the people who speak them.”In this post I describe my work with online language archives, one type of tool that can contribute to language revitalization efforts.
As internet technologies became increasingly accessible in the early 2000s, online language archives began to spring up as resources to support language preservation and revitalization, as well as to provide data on lesser-known languages for linguistic analysis. Such language archives are repositories of recordings, transcripts, and translations in a selected set of languages. They usually include linguistic analyses of the languages, and may also contain various kinds of cultural data, such as field notes, photos, and recordings of music. Well-known language archives include AILLA, ELAR,TLA, and PARADISEC.
Most larger language archives were created by linguists, and were typically designed with linguists as the primary user group. However, they are often considered cumbersome to use, and not many linguists draw on them as a source of research data. Members of indigenous groups also tend to have a hard time navigating them. Online resources created by indigenous communities for their own needs look quite different (for instance, the Miami-Illinois Digital Archive and Myaamia Dictionary).
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