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Thursday, October 18, 2018

भाषाविज्ञान में संरचनात्मक शोध


भाषाविज्ञान में संरचनात्मक शोध
स्रोत- व्याख्यान (प्रो. उमाशंंकर उपाध्याय)

वह शोध कार्य जिसमें भाषा की संरचना को केंद्र में रखा जाता है, संरचनात्मक शोध है। भारतीय परंपरा में संस्कृतकालीन सभी व्याकरण संरचनात्मक व्याकरण रहे हैं, जिनमें पाणिनि का व्याकरण अन्यतम है। पश्चिम में भाषा अध्ययन का उद्भव ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन से हुआ। 18वीं सदी में एक बात स्पष्ट हो गई थी कि भाषाविज्ञान को विज्ञान के रूप में स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि सप्रमाण बातें रखी जाएँ। उस समय मूल कार्य ध्वनि परिवर्तनों की खोज का ही चल रहा था। नव्यवैयाकरणों ने कहा कि ध्वनि परिवर्तन नियमित होते हैं और अपवादरहित होते हैं। ध्वनि परिवर्तन नियमों पर विभिन्न भाषाविदों द्वारा खूब कार्य किया गया।
संरचनात्मक शोध या संरचनात्मक अध्ययन का पश्चिम में आरंभ सस्यूर के समय से हुआ। उन्होंने भारत यूरोपीय भाषाओं (Indo-European Languages) पर ऐतिहासिक दृष्टि से कार्य किया| इस कार्य के दौरान ही उन्हें लगा कि भाषा को समझने की यही एक दृष्टि नहीं हो सकती| ऐतिहासिक अध्ययन करने के लिए सबसे पहले भाषा के स्वरूप अर्थात संरचना के ज्ञान का होना आवश्यक है। इस बात से संरचनावाद का आरंभ हुआ इसीलिए सस्यूर को संरचनावाद का जनक कहा जाता है।
संरचना पर सस्यूर का कहना है कि संरचना एक से अधिक घटकों के अंतःसंबंध का नाम है। अतः यदि एक ही तत्व हो तो संरचना नहीं होगी। संरचना में तत्व होते हैं और उनके बीच संबंध होते हैं। एक संरचनावादी को उन सब तत्वों और उनके संबंधों का इतना ज्ञान आवश्यक होता है कि आवश्यकता पड़ते पर तत्वों के बीच वही संबंध स्थापित कर दे। उदाहरण के लिए एक घड़ी के सभी पुर्जे खोल दिए जाएँ तो उन्हें फिर से जोड़ने के लिए घड़ी की संरचना के ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। यदि पूर्जों को एक-दूसरे से ठीक से ना जोड़ें तो संरचना नहीं बनेगी और इसलिए उनके योग से बनने वाली वस्तु संरचना की दृष्टि से घड़ी नहीं होगी।
भाषा की संरचना से तात्पर्य है- भाषा की इकाइयां और उनके बीच प्राप्त संबंध। संरचना एक अमूर्त अवधारणा है। संरचनावाद सभी विषयों में व्याप्त है। भाषा की इकाइयों में दो प्रकार के संबंध प्राप्त होते हैं।
·       विन्यासक्रमी संबंध- यह संबंध भाषा की क्रमिक इकाइयों का अपनी पूर्व और बाद की इकाइयों से होता है। यह सभी भाषिक स्तरों पर प्राप्त होता है।
·       सहचारक्रमी संबंध- यह संबंध एक संरचना में आई इकाई के स्थान पर आ सकने वाली सभी इकाइयों और इकाई के बीच होता है। उदाहरण के लिए पानी शब्द में की जगह ,, आदि आ सकते हैं। पानी शब्द पानी इसलिए है। क्योंकि वह बानी, दानी, नानी नहीं है। यही बात अन्य सभी वर्णों पर लागू होती है।
सचिव ने कहा संरचना आधारभूत है। ऐतिहासिक अध्ययन संरचनात्मक अध्ययन पर ही आश्रित है। किसी भाषा के काल क्रमिकविकास को समझने के लिए सभी कालक्रमों में उस भाषा के संरचनात्मक स्वरूप का स्वतंत्र ज्ञान आवश्यक है।
भाषा की संरचना के दो पक्ष हैं- अभिव्यक्ति संरचना और कथ्य संरचना। प्रत्येक भाषिक इकाई में ये दोनों पक्ष होते हैं। जैसे पानी शब्द में पानी =प+आ+न+ई अभिव्यक्ति संरचना है। पानी का अर्थ और उसकी व्याकरणिक सूचना आदि उसके कथ्य संरचना का पक्ष है। अभिव्यक्ति संरचना के दो रूप हैं- मौखिक और लिखित। इससे कथ्य संरचना प्रभावित नहीं होती। सूर्योदय शब्द की अभिव्यक्ति संरचना इस प्रकार है- स+ऊ+र+य+ओ+द+य। इसमें सूर्य + उदय दो अर्थ की इकाइयाँ हैं, जो इसकी कथ्य संरचना है।
संबंधों का एक तीसरा आयाम अधिक्रमिक संबंध (hierarchical relation) है। भाषिक इकाइयों में अधिक्रमिक संबंध होता है, जो वाक्य से स्वनिम तक होता है। इनमें से प्रत्येक स्तर पर विन्यासक्रमी और सहचारक्रमी संबंध प्राप्त होते हैं। इनमें से वाक्य से रूपिम तक कथ्य संरचना मिलती है। रूपिम की कथ्य संरचना नहीं होती क्योंकि यह सबसे छोटी अर्थवान इकाई होती है। इसका विश्लेषण स्वनिमों में किया जाता है, जो अभिव्यक्ति संरचना का मामला है। स्वनिमों की कोई संरचना नहीं होती।
स्वनिमों से स्वनप्रक्रियात्मक शब्द बनते हैं, जैसे- घर’, इसमें लगे स्वनिमों और उनके क्रम का अध्ययन अभिव्यक्ति संरचना का अध्ययन है। अभिव्यक्ति संरचना के अध्ययन में अर्थ और व्याकरण का अध्ययन अपेक्षित नहीं होता। शब्दों को मिलाकर उच्चार (utterance) बनते हैं। पूरे महाभारत की अभिव्यक्ति संरचना का अध्ययन व्याकरण और अर्थ जाने बिना किया जा सकता है। जैसे महाभारत में कितने स्वर हैं, कितने व्यंजन है, उनका व्यंजन पैटर्न, स्वर पैटर्न, स्वर-व्यंजन पैटर्न किस प्रकार के हैं? किस पैटर्न के कितने शब्द आए हैं? इस प्रकार का अध्ययन अभिव्यक्ति संरचना का अध्ययन होगा।

कथ्य संरचना की सबसे छोटी इकाई रूपिम है। रूपिमों का योग होने पर शब्दों या पदों का निर्माण होता है, जिनकी कथ्य संरचना बनती है। यह श्रृंखला रूपिम से वाक्य तक जाती है। संरचना की दृष्टि से वाक्य सबसे बड़ी इकाई है। वाक्य के ऊपर पाठ या प्रोक्ति संप्रेषण का मामला है। अभी तक उनकी संरचना की बात नहीं की जाती।
संरचनावाद में दो प्रकार की संरचनाओं की बात की जाती है-
अंतःकेंद्रिक : जैसे- काली गाय बहुत काली गाय।
बाह्यकेंद्रिक : जैसे- कमरे में।
संरचना की दृष्टि से किसी भाषा के किसी स्तर पर आने वाली इकाइयों और उनके अंतःसंबंधों का अध्ययन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए हिंदी की ध्वनिमिक संरचना (phonological structure) के अध्ययन के कुछ निष्कर्ष देख सकते हैं-
·       हिंदी में विन्यासक्रमी दृष्टि से आदिस्थान पर नहीं आता।
·       हिंदी में ब्ल के लिए ध्वनि संरचना नहीं बनती, जबकि अंग्रेजी में ब्लैक, ब्लैक आदि शब्द बनते हैं।
इसी प्रकार रूप वाक्य और अर्थ के स्तर पर संरचनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

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