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Thursday, October 18, 2018

भाषाविज्ञान में ऐतिहासिक शोध


भाषाविज्ञान में ऐतिहासिक शोध
स्रोत- व्याख्यान (प्रो. उमाशंकर उपाध्याय)
किसी एक भाषा या एक से अधिक भाषाओं में ऐतिहासिक दृष्टि से हुए परिवर्तन या विकास का अध्ययन भाषा का ऐतिहासिक अध्ययन कहलाता है। इतिहास का संबंध परिवर्तन से है। इसलिए भाषाओं का ऐतिहासिक अध्ययन उनमें हुए परिवर्तनों की खोज से संबंधित है। यूरोप में आधुनिक भाषाविज्ञान का जन्म ही ऐतिहासिक भाषाविज्ञान से हुआ। 2 फरवरी 1786 को सर विलियम जोंस ने जो भाषण दिया तथा उसमें संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषाओं की समानता की बात की, और इस आधार पर जो निष्कर्ष निकाले, उनसे ही भाषाओं के व्यवस्थित तुलनात्मक अध्ययन-विश्लेषण का कार्य आरंभ हुआ। इसीलिए ऐतिहासिक भाषाविज्ञान को तुलनात्मक भाषाविज्ञान भी कहा जाता है। इस अध्ययन से भाषा परिवार की संकल्पना सामने आई भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा भाषा परिवारों की खोज का कार्य भी शुरू हो गया।
भाषा परिवार संबंधी अध्ययन के दो पक्ष हैं। (1) किन‌-किन भाषाओं को एक परिवार में रखा जाए? (2) ऐसे कितने भाषा परिवार हैं? भाषाओं में भिन्नता के निर्धारण के लिए पारस्परिक बोधगम्यता को आधार बनाया जाता है। इस प्रकार तुलनात्मक पद्धति का विकास हुआ। उदाहरण के लिए किसी भाषा के आज के स्वरूप, 100 साल पुराने, 200 साल पुराने, 500 साल पुराने और 1000 साल पुराने स्वरूप का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। जब एक से अधिक भाषाओं में इस प्रकार का अध्ययन करते हैं। तो उनके बीच पाई जाने वाली समानता बढ़ती जाती है। यदि ऐसा होता है, तो यह सिद्ध करता है कि ये एक स्रोत से निकली हुई भाषाएँ हैं। ऐतिहासिक अध्ययन के लिए लिखित सामग्री ही प्रमाण होती है। इसलिए एक सीमा तक ही हम जा पाते हैं। उसके बाद प्रमाण मिलने बंद हो जाते हैं। इससे भाषिक पुनर्निर्माण (linguistic reconstruction) का कार्य शुरू हो जाता है। जितनी दूर तक प्रमाण मिलते हैं, उनका विश्लेषण करके भाषिक परिवर्तनों की एक शृंखला बना लेते हैं। फिर उसी के अनुरूप तार्किक रूप से चलते हुए और पीछे की भाषा का निर्माण करना भाषिक पुनर्निर्माण है। इसके लिए गणित की तरह सूत्रों का प्रयोग किया जाता है। इसी पद्धति के माध्यम से भारोपीय भाषा का पुनर्निर्माण किया गया।
भाषिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को एक उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि कुछ भाषाओं का अध्ययन करते हुए किसी एक भाषा में प और ब ध्वनियाँ मिल रही हैं। किसी दूसरी भाषा में ,, ध्वनियाँ मिल रही हैं। तीसरी में ,, मिल रही हैं। तो इनमें से अध्ययन करके समान ध्वनियों द्वारा पुरानी भाषा की ध्वनियों को प्राप्त किया जा सकता है। क्योंकि समय के साथ कुछ भाषाओं में कुछ ध्वनियाँ विलुप्त हो जाती हैं और कुछ नई ध्वनियाँ जुड़ जाती हैं। जैसे यूरोपीय भाषाओं में मूर्धन्य ध्वनियाँ नहीं हैं, किंतु संस्कृत में हैं। संस्कृत में ये ध्वनियाँ कैसे आईं? यह जानने के लिए हमें संस्कृत के परिवेश का अध्ययन करना होगा। परिवेश के अध्ययन में हम देखते हैं कि द्रविड़ भाषाओं में मूर्धन्य ध्वनियाँ पाई जाती हैं। अतः जैसा कि भाषाओं में आदान की प्रक्रिया होती रहती है और शब्दों के साथ ध्वनियाँ भी आती रहती हैं, तो द्रविड़ भाषाओं के प्रभाव से संस्कृत में मूर्धन्य ध्वनियों का आगमन हुआ है। जब कई शब्दों में एक प्रकार का पैटर्न मिलने लगता है तो नियम बनाए जाते हैं। अतः ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से शोध का एक कार्य हुआ- भाषा परिवारों का गठन और आद्य भाषा का पुनर्निर्माण।
दूसरा कार्य आंतरिक तुलना एवं पुनर्गठन भी होता है। एक भाषा के अंदर हुए परिवर्तनों का अध्ययन एवं शोध इसके अंतर्गत आता है। जैसे हिंदी में जाना से गया रूप कैसे बना? यह समझने के लिए हमें हिंदी के ऐतिहासिक विकास को देखना होगा। संस्कृत में जाना के लिए जैसे- गमन और जैसे- यात्रा; दो धातुएँ मिलती हैं। अतः हो सकता है कि इनके ही योग से जाना का भूतकालिक रूप गया हो गया।
तीसरा कार्य एक भाषा के कालक्रमिक परिवर्तन का अध्ययन है। जैसे- 1000 साल या 500 साल की हिंदी में हुए परिवर्तनों का क्रमिक रूप से अध्ययन करना। उदाहरण के लिए पुरानी हिंदी में जावेगा, आवेगा जैसे शब्दरूप बनते थे, उसके बाद जायेगा, आयेगा बनने लगे और बाद में मानकीकरण हुआ तो हटाकर केवल स्वर रखते हुए जाएगा, आएगा शब्द रूप बनाए जाने लगे। यह अध्ययन भाषा के किसी भी स्तर पर किया जा सकता है। उदाहरण के लिए वाक्य स्तर पर देखें-
 उसने कहा कि वह कल जाएगा।
यह प्रयोग अंग्रेजी के प्रभाव से आया है। भारत में भाषा में परिवर्तन आंतरिक कारणों और बाह्य कारणों दोनों से हुआ है। अतः उन परिवर्तनों और उनके कारणों का अध्ययन किया जाना चाहिए। किसी भाषा के दो पक्ष है- अभिव्यक्ति पक्ष और कथ्य पक्ष। अभिव्यक्ति पक्ष में ध्वन्यात्मक परिवर्तन और कथ्य पक्ष में व्याकरणिक तथा अर्थ में हुए परिवर्तनों का अध्ययन करते हैं। व्युत्पत्तिशास्त्र में भी अर्थ में हुए परिवर्तन को देखा जाता है। अंग्रेजी में यहां तक काम किया गया है कि किसी शब्द का लिखित डॉक्यूमेंट में सबसे पहले प्रयोग कब हुआ। अब किस शब्द के क्या रूप रहे होंगे? या क्या परिवर्तित रूप बने होंगे? का कंप्यूटर के उपयोग से सांख्यिकीय रूप से संभावित बेस्ट आउटपुट देख और चुन सकते हैं।

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