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Sunday, December 10, 2017

वर्डनेट (WordNet)


वर्डनेट अँग्रेज़ी के शब्दों का एक विशाल डाटाबेस है। जार्ज . मिलर (George a. miller) द्वारा 1980 के दशक में इस परियोजना का आरंभ किया गया। इसमें शब्दों को उनके वर्गों, यथा- संज्ञा, विशेषण, क्रिया, क्रियाविशेषण आदि में समूहित करके रखा गया है जिसे संज्ञानात्मक पर्यायों का समुच्चय (सिनसेटSynset) कहा जाता है। प्रत्येक सिनसेट एक प्रकार की संकल्पना का प्रतिनिधित्व करता है। सभी सिनसेटों को संकल्पनार्थी (conceptual-semantic) और शब्दवृत्तिक (lexical) संबंधों द्वारा एक दूसरे से जोड़ा जाता है। वर्डनेट ऑनलाइन प्रयोग के लिए इंटरनेट पर नि:शुल्क उपलब्ध है। इसमें शब्दों एवं सूचनाओं को देखने के लिए एक अंतरापृष्ठ भी दिया गया है – 
 इस अंतरापृष्ठ में कोई भी शब्द या पदबंध इनपुट के रूप में दिया जा सकता है। उसके बारे में आप जो भी सूचनाएँ देखना चाहते हैं उन्हें “Display Options” में चयनित करें, जैसे यहाँ पर ‘Show all’ हाईलाइट है। इसमें सब कुछ प्रदर्शित किया जाएगा। उदाहरण के लिए नीचे ‘science’ शब्द देने के बाद प्राप्त परिणामों को दिखाया जा रहा है
इसमें लिंक S द्वारा सिनसेट या आर्थी संबंधों को प्रदर्शित किया जा रहा है। प्रथम S को क्लिक करने पर आने वाली सूचनाएँ इस प्रकार हैं: 
इसमें science शब्द के अर्थ के प्रयोग एवं विस्तार से जुड़ी अनेक प्रकार की सूचनाएँ दी गई हैं जिन्हें संबंधित लिंक पर क्लिक करके प्राप्त किया जा सकता है।
इस प्रकार देखा जाए तो वर्डनेट संकल्पनाओं एवं उनके बीच निहित संबंधों को व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित करने वाली एक इकाई है। इसमें प्रत्येक शब्द से जुड़ी आर्थी सूचनाओं को ऊपर दिखाए गए लिंकों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। अत: यह संगणकीय आर्थी विश्लेषण के संबंध में एक उपयोगी टूल है।
हिंदी शब्दतंत्र पर आई.आई.टी. मुंबई में पुष्पक भट्टाचार्य के नेतृत्व में कार्य किया गया है।
संदर्भ-
Fellbaum, Christiane (2005). WordNet and wordnets. In: Brown, Keith et al. (eds.), Encyclopedia of Language and Linguistics, Second Edition, Oxford: Elsevier, 665-670
http://wordnet.princeton.edu/

Wednesday, December 6, 2017

भाषा परिवर्तन और उपनिवेशवाद


यूरोपीय देशों में उपनिवेशवाद ने 15वीं शताब्दी के आरंभ से ही अपना व्यापक प्रभाव दिखाना आरंभ कर दिया था। इसका प्रभाव केवल राजनैतिक और सामाजिक ही नहीं रहा बल्कि सांस्कृतिक और भाषाई क्षेत्र में भी व्यापक असर हुआ। भाषा की दृष्टि से बात करें तो इस दौरान सभी प्रमुख यूरोपीय देश अफ्रीका, अमेरिका और एशिया के देशों के संपर्क में आए। इनमें संपर्क के लिए सबसे बड़ा माध्यम और सबसे बड़ी बाधा भाषा ही थी। इसलिए इन नए ज्ञात देशों की भाषाओं के अध्ययन हेतु यूरोपीय लोगों द्वारा व्यापक प्रयास किया गया। उपनिवेशवादी प्रशासक, यात्री, ईसाई मिशनरियाँ और अन्य संबंधित लोगों ने शब्द, व्याकरण और पाठ तीनों ही क्षेत्रों में अपने-अपने स्तर पर अध्ययन-विवेचन किया।
विभिन्न विद्वानों द्वारा सबसे अधिक मात्रा में भाषाओं की तुलनात्मक शब्द सूची पहले तैयार की गई। इससे एक लाभ यह हुआ कि एक से अधिक भाषाओं के बीच संबंध होने पर उसके भी संकेत मिल जाते थे। इसी प्रकार संबंध नहीं होने को भी प्राप्त कर लिया जाता था। इसी अध्ययन पद्धति ने भाषा अध्ययन के क्षेत्र में एक आयाम – तुलनात्मक अध्ययन का सूत्रपात किया, जो बाद में नवव्याकरणविद परंपरा (Neogrammarian tradition) के रूप में उभरकर सामने आई। यह परंपरा उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में अत्यंत प्रचलित रही है।
16वीं शताब्दी के अंत में यह अवधारणा जोर पकड़ने लगी कि अधिकांश यूरोपीय भाषाएँ एक दूसरे संबंधित होकर एक भाषा परिवार की स्थापना करती हैं। इसके बाद इस क्षेत्र में व्यापक कार्य आरंभ हुआ। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले आरंभिक विद्वानों में Andreas Jager (1660 -1730) और William Jones (1746-1794) का प्रमुख योगदान रहा है। विलियम जोंस को ही भारोपीय भाषाओं (Indo-European Languages) में सहसंबंधों की खोज और तुलनात्मक भाषाविज्ञान की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है। 1789 में विलियम जोंस ने कहा था कि संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषाओं में पर्याप्त समानताएँ हैं। इससे यूरोपीय विद्वानों का भारतीय और अन्य प्रमुख एशियाई भाषाओं के अध्ययन के प्रति ध्यान आकर्षित हुआ। इसके बाद अन्य भाषा परिवारों की खोज विभिन्न विद्वानों द्वारा की गई।

उपनिवेशवाद का भाषाविज्ञान के क्षेत्र में केवल इतना ही योगदान नहीं रहा है कि तुलनात्मक अध्ययन और भाषाओं के वर्गीकरण की शुरुवात हुई। बल्कि इसी के कारण अलग-अलग दृष्टिकोण से यूरोपीय भाषाओं के व्याकरण लिखे गए, और जिन देशों में इनका उपनिवेश स्थापित हो चुका था उनकी भाषाओं के व्याकरण भी लिखे गए। इस क्षेत्र में मिशनरियों ने बहुत अधिक कार्य किया। 17वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक उनके व्याकरण अत्यंत प्रभावशाली और उपयोगी रहे। पीजिन और क्रिओल भाषाओं की उत्पत्ति में भी उपनिवेशवादी परंपरा का योगदान रहा है।

भाषा का समकालिक और कालक्रमिक अध्ययन


भाषा का भाषवैज्ञानिक अध्ययन मुख्यत: तीन विधियों से किया जाता है – समकालिक, कालक्रमिक और तुलनात्मक (synchronic, diachronic and comparative). इन तीनों ही विधियों में समकालिक और कालक्रमिक विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। कालक्रमिक अध्ययन को ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अंतर्गत रखा जाता है। भाषा अध्ययन के इतिहास को देखें तो मुख्यत: यही पद्धति आरंभ से चली आ रही थी। इसे ही मूल भाषाविज्ञान के रूप में देखा जाता था। कालक्रमिक और समकालिक अध्ययन में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं था। बीसवीं सदी के आरंभ में सस्यूर द्वारा किए गए चिंतन में इनका स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। दोनों को अलग-अलग रूप में निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा देखा जा सकता है –
1.      कालक्रमिक भाषा अध्ययन में विभिन्न काल बिंदुओं पर किसी भाषा के विकास को देखा जाता है। समकालिक भाषा अध्ययन में एक ही काल बिंदु पर किसी भाषा की स्थिति की विवेचना की जाती है।
2.      कालक्रमिक अध्ययन में भाषा में होने वाले परिवर्तनों पर मुख्य ध्यान दिया जाता है। समकालिक अध्ययन में एक समय विशेष में प्रयुक्त होने वाले भाषिक रूपों पर मुख्य ध्यान दिया जाता है।
3.      कालक्रमिक अध्ययन ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है जबकि समकालिक अध्ययन वर्णनात्मक भाषाविज्ञान के अंतर्गत।
4.       
वैसे देखा जाए तो समकालिक अध्ययन कालक्रमिक और तुलनात्मक दोनों ही अध्ययन प्रणालियों का मूल है। इसका प्रयोग करते हुए ये दोनों प्रकार के अध्ययन अत्यंत सरलतापूर्वक किए जा सकते हैं। इस कारण सस्यूर द्वारा समकालिक अध्ययन पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने कहा है –
"Synchronic linguistics will concern the logical and psychological relations that bind together co-existing terms and from a system in the collective mind of speakers. Diachronic linguistics, on the contrary, will study relations that bind together successive terms, not perceived by the collective mind but substituted for each other without forming a system."
इस प्रकार देख सकते हैं कि सस्यूर द्वारा समकालिक अध्ययन को भाषाभाषी के मन:मस्तिष्क के अधिक समीप माना गया है।





Monday, December 4, 2017

संज्ञानात्मक विकास के चरण : पियाजे (Jean Piaget)



पियाजे (Jean Piaget, 18961980) द्वारा संज्ञानात्मक विकास के बताए गए चरणों को इस प्रकार से देख सकते हैं-
स्तर
आयु (अवधि)
विवरण
इंद्रिय-यंत्र अवस्था
(Sensorimotor stage)
शैशवावस्था {Infancy (0–2 वर्ष)}
Intelligence is present; motor activity but no symbols;
knowledge is developing yet limited; knowledge is based on experiences/ interactions;
mobility allows child to learn new things;
some language skills are developed at the end of this stage.
The goal is to develop object permanence;
achieves basic understanding of causality, time, and space.
पूर्व-क्रियात्मक अवस्था
(Pre-operational stage)
आरंभिक बाल्यावस्था {Toddler and Early Childhood (2–7 वर्ष)}
Symbols or language skills are present;
memory and imagination are developed;
nonreversible and nonlogical thinking;
shows intuitive problem solving;
begins to see relationships;
grasps concept of conservation of numbers;
egocentric thinking predominates.
ठोस क्रियात्मक अवस्था
(Concrete operational stage)
आरंभिक युवावस्था
{Elementary and Early Adolescence (7–12 years)}
Logical and systematic form of intelligence;
manipulation of symbols related to concrete objects;
thinking is now characterized by reversibility and the ability to take the role of another;
grasps concepts of the conservation of mass, length, weight, and volume;
operational thinking predominates nonreversible and egocentric thinking
रूपात्मक क्रियात्मक अवस्था
(Formal operational stage)
युवावस्था और वयस्कावस्था
{Adolescence and Adulthood (12 years and on)}
Logical use of symbols related to abstract concepts;
Acquires flexibility in thinking as well as the capacities for abstract thinking and mental hypothesis testing;
can consider possible alternatives in complex reasoning and problem solving.[18]


संदर्भ-
https://en.wikipedia.org/wiki/Piaget%27s_theory_of_cognitive_development