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Monday, April 6, 2020

हिंदी सर्वनाम और क्रिया पदबंध


Sunday, April 5, 2020

अनुवाद के क्षेत्र


अनुवाद के क्षेत्र
मानव समाज की विविध गतिविधियों से संबंधित जितने क्षेत्र हैं, वे सभी अनुवाद के क्षेत्र हैं। मनुष्य के सामाजिक जीवन का मूल आधार भाषा है। भाषा के कारण ही हम अपनी बात अन्य लोगों तक पहुँचा पाते हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई ऐसा व्यक्ति आ जाए तो आपकी भाषा न जानकर कोई अन्य भाषा जानता है तो अनुवाद की आवश्यकता पड़ती ही है। अतः अनुवाद के क्षेत्र के अंतर्गत मानव व्यवहार के सभी क्षेत्र आ जाते हैं। साहित्य को केंद्र में रखते हुए कुछ विद्वानों द्वारा अनुवाद के क्षेत्रों के दो वर्ग किए गए हैं-
(1) साहित्यिक अनुवाद-
इसके अंतर्गत सभी साहित्यिक क्षेत्र आते हैं, जैसे-
कहानी
उपन्यास
कविता
निबंध
नाटक
फिल्म
                आदि।
(2) साहित्येतर अनुवाद
इसके अंतर्गत अन्य सभी क्षेत्र आ जाते हैं, जैसे-
विज्ञान (प्राकृतिक एवं सामाजिक)
वाणिज्य
खेल
कला
कार्यालय
तकनीकी
मीडिया
कृषि
चिकित्सा
            आदि।

अनुवाद की प्रकृति



अनुवाद की प्रकृति
किसी भी कार्य को उसके स्वरूप और प्रकृति के आधार दो रूपों देखा जाता है- विज्ञान और कला। इसके लिए उस क्षेत्र में किए जाने वाले कार्यों के स्वरूप, उसके लिए स्थापित नियमों के स्वरूप वा स्थिति आदि को आधार बनाया जाया है। व्यावहारिक कार्यों से जुड़े शास्त्रों की प्रकृति के संबंध में सदैव यह प्रश्न उठता रहा है कि वह विज्ञान है या कला। इस संदर्भ में अनुवाद को स्थिति को इस प्रकार से देख सकते हैं-
कला के रूप में अनुवाद
कला वह है जिसमें सर्जक किसी रचना का इस प्रकार निर्माण करता है कि उसमें उसकी कल्पना, सहजता, स्वाभाविकता और भावनाओं की झलक मिलती है। इसी कारण कला को व्यक्तिनिष्ठ माना गया है। कोई कलाकृति कैसी होगी, यह कलाकार पर निर्भर करता है। इस दृष्टि से अनुवाद को देखा जाए तो हम पाते हैं कि अनुवाद किसी एक भाषा में कही गई बातों का शब्दशः रूपांतरण नहीं है, बल्कि कई बार उसमें अनुवादक को लक्ष्य भाषा के पाठकों को ध्यान में रखते हुए पुनर्सृजन करना पड़ता है। अनुवाद एक भाषा की सामग्री का दूसरी भाषा की सामग्री में शब्दशः या वाक्यशः रूपांतरण नहीं है। अनुवादक को लक्ष्य भाषा की प्रकृति और यदि अनुवाद किसी साहित्यिक या सामान्य रचना का किया जा रहा है तो लेखक की प्रकृति का ध्यान रखना होता है।
अनुवाद करते समय अनुवादक का पूरा बल इस बात पर होता है कि लक्ष्य भाषा के पाठक को अनूदित कृति पढ़ते समय स्रोत भाषा के पाठक की तरह ही अनुभूति हो। इसके लिए कई बार अनुवादक को अपनी कल्पना, सहजता, सृजनात्मक शक्ति आदि का प्रयोग करना पड़ता है। इसी कारण कहा गया है कि अनुवाद मूल कृति की आत्मा को अनूदित कृति में उतारने की कला है। अतः अनुवाद एक प्रकार से कला भी है।
विज्ञान के रूप में अनुवाद
वह शास्त्र जिसमें अध्येय सामग्री का वस्तुनिष्ठ, क्रमबद्ध और सुसंगठित अध्ययन किया जाता है, विज्ञान है। विज्ञान कोई विषय नहीं है, बल्कि अध्ययन की एक पद्धति है, जिसमें शोधकर्ता की भावनाएँ, सृजनात्मकता, सहजता कोई मायने नहीं रखती, बल्कि लक्ष्य वस्तु नियमों और सिद्धांतों के अनुसार जैसी जान पड़ती है, उसे वैसे ही प्रस्तुत करना होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो अनुवाद में सर्वमान्य सिद्धांत होते हैं। प्रत्येक अनुवादक को अनुवाद करते समय किसी-न-किसी रूप में उनका ध्यान रखना होता है। इसी कारण कुछ विद्वानों द्वारा अनुवाद को अन्य विज्ञानों की तरह विज्ञान माना गया है। कार्यालयी और तकनीकी क्षेत्रों से संबंधित सामग्री का अनुवाद करते समय अनुवादक को तटस्थ रहना पड़ता है और स्रोत भाषा में कोई बात जिस प्रकार कही गई रहती है, उसे लक्ष्य भाषा में वैसे ही रखना पड़ता है।
अनुवाद : एक वैज्ञानिक कला
अनुवादकों और अन्य चिंतकों द्वारा अनुवाद की प्रकृति पर गहन चिंतन किया गया है और यह प्राप्त हुआ है कि न तो विशुद्ध रूप से यह कहा जा सकता है कि अनुवाद एक कला है और न ही यह कहा जा सकता है कि अन्य विज्ञानों की तरह अनुवाद एक शुद्ध विज्ञान है। इसमें दोनों का मिश्रण प्राप्त होता है। इसलिए अनुवाद के संदर्भ में यही कहना उत्तम होगा कि अनुवाद एक वैज्ञानिक कला है।

अनुवाद : स्वरूप और परिभाषा


अनुवाद : स्वरूप और परिभाषा
अनुवाद वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम किसी एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में रुपांतरित करते हैं। अर्थात जो बात किसी एक भाषा में कही गई रहती है उसी बात को हम किसी दूसरी भाषा में पुनःप्रस्तुत करते हैं। यहां पर ध्यान रखने वाली बात है कि अनुवाद दो पाठों के बीच में होता है। अनुवाद की आधारभूत इकाई वाक्य होती है। अतः हम कह सकते हैं कि अनुवाद में एक भाषा के वाक्यों की जगह दूसरी भाषा के वाक्यों को इस तरह से रखा जाता है कि दूसरी भाषा में उस बात को पढ़ या सुन रहा व्यक्ति भी बिल्कुल वैसे समझ जाए, जैसे प्रथम भाषा में उस बात को पढ़ या सुन रहा व्यक्ति समझता है।
जिस भाषा से अनुवाद किया जाता है उसे स्रोत भाषा (source language) और जिस भाषा में अनुवाद किया जाता है, उसे लक्ष्य भाषा (target language) कहते हैं। अतः अनुवाद की प्रक्रिया को इस प्रकार दिखा सकते हैं-
प्रथम भाषा पाठ à अनुवाद à द्वितीय भाषा पाठ
              अथवा
स्रोत भाषा पाठ à अनुवाद à लक्ष्य भाषा पाठ
उदाहरण-
मोहन घर जाता है।            à Mohan goes to home.
मैं डॉक्टर नहीं हूँ।              à I am not a doctor.
तुम आज क्या कर रहे हो? à What are you doing today?
आज छुट्टी है।                   à Today is holyday.
उपर्युक्त चार वाक्यों में हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है। अतः यहाँ पर हिंदी स्रोत भाषा है और अंग्रेजी लक्ष्य भाषा है। यह वाक्य स्तर पर देखने या समझने के लिए किया हुआ अनुवाद है। वाक्य स्तर पर देखने में अनुवाद जितना सरल जान पड़ता है, पाठ स्तर पर यह करने में उतना ही कठिन होता।  इसका कारण यह है कि अनुवाद करते समय केवल भाषाओं की संरचना की दृष्टि से परिवर्तन ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि बहुत सी प्रयोगपरक, समाज-सांस्कृतिक और समतुल्यतापरक बातों का ध्यान रखना पड़ता है। इन सब बिंदुओं की अगले आलेखों में चर्चा की जाएगी।
परिभाषा
अनुवाद एक भाषा की पाठ सामग्री का दूसरी भाषा की पाठ सामग्री में किया जाने वाला रूपांतरण है। इसे परिभाषित करते हुए विख्यात अनुवादशास्त्री नाइडा ने कहा है, “Translating consists in producing in the reception language the closest natural equivalent to the message of the source language first in the meaning and secondary in style.”
इस परिभाषा से स्पष्ट है कि अनुवाद करते समय दोनों भाषओं के पाठों में कथ्य  (अर्थ/संदेश) और अभिव्यक्तिदोनों को अधिक से अधिक समरूप रखना महत्वपूर्ण होता है। इसी प्रकार हिंदी विद्वानों में भोलानाथ तिवारी ने कहा है, “एक भाषा में व्यक्त विचारों को यथासम्भव समान और सहज अभिव्यक्ति द्वारा दूसरी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास अनुवाद है।