भाषा-नियोजन किसी समाज या राष्ट्र में भाषाओं के विकास,
प्रयोग और मानकीकरण से जुड़ी
नीतिगत तथा व्यावहारिक प्रक्रियाओं का समग्र नाम है। बहुभाषी समाजों यह प्रक्रिया
में विशेष रूप से जटिल हो जाती है। यह केवल भाषायी नहीं,
बल्कि सामाजिक,
राजनीतिक,
शैक्षिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया
है। इसके समस्या-क्षेत्र बहुआयामी हैं, जिन्हें निम्नलिखित प्रकार से समझ
सकते हैं—
1.
स्थिति-नियोजन (Status
Planning) की समस्याएँ
इसके अंतर्गत निम्नलिखित बिंदु महत्वपूर्ण हैं-
§ किस
भाषा को राजभाषा / संपर्क भाषा / शिक्षा की भाषा बनाया जाए?
यह सबसे बड़ा विवादास्पद प्रश्न होता है।
§ बहुसंख्यक
बनाम अल्पसंख्यक भाषाओं के बीच असमानता होने पर टकराव की संभावना बनी रहती है।
§ किसी
एक भाषा को वरीयता देने से अन्य भाषाओं में हाशियाकरण की भावना।
2.
कार्पस-नियोजन (Corpus
Planning) की समस्याएँ
§ भाषा
के मानकीकरण (Standardization) में क्षेत्रीय बोलियों के समावेश
का स्तर।
§ वर्तनी,
व्याकरण और शब्दावली को लेकर एकरूपता का अभाव।
§ आधुनिक
ज्ञान-विज्ञान के लिए नए पारिभाषिक शब्दों के निर्माण की कठिनाई।
3.
अधिगम-नियोजन (Acquisition
Planning) की समस्याएँ
§ मातृभाषा
बनाम द्वितीय भाषा / तृतीय भाषा की शिक्षा कब,
कैसे और किस स्तर तक दी जाए? को लेकर
असमंजस।
§ प्रशिक्षित
शिक्षकों और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण-सामग्री की कमी।
§ ग्रामीण
और शहरी क्षेत्रों में भाषा-शिक्षा की असमान पहुँच।
4.
बहुभाषिकता और भाषायी नीति
§ भाषायी
पहचान से जुड़ी राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता।
§ भाषाओं
के बीच प्रतिस्पर्धा और सत्ता-संबंध।
§ भाषायी
आंदोलनों के कारण प्रशासनिक कठिनाइयाँ।
§ युवा
पीढ़ी का प्रभुत्वशाली भाषाओं की ओर झुकाव।
§ बहुभाषी
प्रशासन में अनुवाद और व्याख्या की जटिलता।
§ नीति
और क्रियान्वयन के बीच अंतर।
§ स्थानीय
भाषाओं का डिजिटल संसाधनों में पिछड़ना।
§ बनाई
गई भाषा-नीतियों की सामाजिक स्वीकृति न मिलना।
अपनी
पुस्तक ‘भाषा
शिक्षण’ में रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव कहते हैं-
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