भारत में भाषा नियोजन (Language Planning in India)
एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य देश की भाषाई विविधता को बनाए रखते हुए
प्रभावी संप्रेषण और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय
संविधान में ‘हिंदी’ को संघ की ‘राजभाषा’ तथा ‘अंग्रेजी’ को सहायक भाषा के रूप में स्वीकार किया, जिससे प्रशासनिक संतुलन बना रहे। साथ ही, आठवीं अनुसूची के अंतर्गत विभिन्न भारतीय भाषाओं को मान्यता
दी गई,
जो समय के साथ बढ़कर 22 हो गई हैं। प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी Einar
Haugen के अनुसार, भाषा नियोजन में भाषा के चयन, संहिताकरण (codification), कार्य-विस्तार (elaboration) और स्वीकृति (acceptance) जैसे चरण शामिल होते हैं। भारत में इन सभी स्तरों पर
योजनाबद्ध प्रयास देखने को मिलते हैं।
भारत में भाषा नियोजन का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
(क) स्वतंत्रता-पूर्व काल
ब्रिटिश शासन के दौरान थॉमस मैकाले (Thomas
Babington Macaulay) की शिक्षा नीति (1835) ने अंग्रेजी को प्रशासन और शिक्षा की भाषा बना दिया। इससे
भारतीय भाषाओं का महत्व कम हुआ, लेकिन साथ ही आधुनिक शिक्षा का प्रसार भी हुआ।
(ख) स्वतंत्रता के बाद
स्वतंत्रता के बाद भाषा नियोजन एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय
मुद्दा बन गया। भारतीय संविधान (1950) ने भाषा संबंधी कई प्रावधान किए, जैसे-
अनुच्छेद 343: संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी (देवनागरी लिपि) को
मान्यता
अंग्रेजी को सहायक राजभाषा के रूप में रखा गया
आठवीं अनुसूची में प्रारंभ में 14 भाषाएँ थीं, जो अब बढ़कर 22 हो गई हैं
इस प्रकार के अनेक प्रबंधों के माध्यम से
भारत ने एक बहुभाषी नीति अपनाई।
3.
भारत में भाषा नियोजन
के प्रमुख आयाम
(क) राजभाषा नीति
स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने हिंदी को प्रोत्साहित
करने के लिए कई संस्थाएँ स्थापित कीं, जैसे-
§ केंद्रीय
हिंदी निदेशालय
§ केंद्रीय हिंदी
संस्थान
§ राजभाषा
विभाग
§ दक्षिण हिंदी
प्रचार सभा आदि।
इसके साथ ही, गैर-हिंदी भाषी राज्यों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए
अंग्रेजी का उपयोग जारी रखा गया।
(ख) त्रिभाषा सूत्र (Three Language
Formula)
आधुनिक भारत में भाषा नियोजन का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा
और नीति निर्माण से जुड़ा है। इस संदर्भ में त्रिभाषा सूत्र विभिन्न भाषाओं के संतुलित अध्ययन को बढ़ावा देता है। इसके
अनुसार तीन भाषाओं में शिक्षा व्यवस्था की बात की गई -
§ मातृभाषा/क्षेत्रीय
भाषा
§ हिंदी या
अन्य भारतीय भाषा
§ अंग्रेजी या
कोई विदेशी भाषा
इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और भाषाई संतुलन बनाए रखना रहा
है।
(ग) अष्टम अनुसूची
अष्टम अनुसूची भारतीय संविधान का वह भाग है, जिसमें भारत की मान्यता प्राप्त भाषाओं की सूची दी गई है।
इन भाषाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त होता है और इनके विकास, संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार के लिए सरकार विशेष प्रयास करती
है। प्रारंभ में (1950) अष्टम अनुसूची में 14 भाषाएँ शामिल थीं। समय के साथ संशोधनों द्वारा इनकी संख्या
बढ़ाकर 22 कर दी गई।
वर्तमान 22 भाषाएँ:
असमिया
बांग्ला
गुजराती
हिंदी
कन्नड़
कश्मीरी
कोंकणी
मलयालम
मराठी
नेपाली
ओड़िया
पंजाबी
संस्कृत
तमिल
तेलुगु
उर्दू
सिंधी
मणिपुरी
बोडो
डोगरी
मैथिली
संथाली
3.
प्रमुख संशोधन (Amendments)
21वां संशोधन (1967) – सिंधी को जोड़ा गया
71वां संशोधन (1992) – कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली
92वां संशोधन (2003) – बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली
(घ) राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National
Education Policy (NEP)
2020) ने प्रारंभिक शिक्षा में
मातृभाषा/स्थानीय भाषा को माध्यम बनाने पर विशेष बल दिया है। इससे न केवल भाषा
अधिगम को सुदृढ़ किया जा रहा है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय ज्ञान परंपराओं को भी
संरक्षण मिल रहा है।
(ङ) तकनीकी और डिजिटल भाषा नियोजन
वर्तमान समय में भाषा नियोजन का विस्तार डिजिटल और तकनीकी
क्षेत्रों तक हो गया है। भारत सरकार का TDIL Programme (Technology
Development for Indian Languages) भारतीय
भाषाओं के लिए तकनीकी संसाधन विकसित कर रहा है, जैसे मशीन अनुवाद, वाक् पहचान और यूनिकोड आधारित लिपि समर्थन। फिर भी, अंग्रेजी के बढ़ते प्रभुत्व, क्षेत्रीय भाषाई असंतुलन और लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण
जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
भारत में भाषा नियोजन की चुनौतियाँ
§ भाषाई
विविधता – सैकड़ों भाषाओं के कारण संतुलन बनाना कठिन
§ हिंदी बनाम
अन्य भाषाएँ – कई राज्यों में हिंदी विरोध आंदोलन हुए, विशेषकर Tamil
Nadu में
§ अंग्रेजी का
प्रभुत्व – शिक्षा और रोजगार में अंग्रेजी का वर्चस्व
§ लुप्तप्राय
भाषाएँ – कई जनजातीय भाषाएँ विलुप्त होने के कगार पर हैं
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