भाषा नियोजन का शिक्षा के क्षेत्र से गहरा और प्रत्यक्ष
संबंध है, क्योंकि शिक्षा वह माध्यम है जिसके द्वारा
भाषा का अधिगम, प्रसार और मानकीकरण सबसे अधिक प्रभावी ढंग से
होता है। बहुभाषिक समाजों में यह एक प्रमुख प्रश्न होता है कि शिक्षा किस भाषा में
दी जाए, जैसे-मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा,
राष्ट्रीय भाषा या किसी वैश्विक भाषा में। इस संदर्भ में भाषा
नियोजन का उद्देश्य ऐसी संतुलित नीति बनाना होता है जिससे सीखने की गुणवत्ता बनी
रहे, सामाजिक समानता सुनिश्चित हो और भाषायी विविधता का
संरक्षण भी हो सके।
शोधों से यह सिद्ध हुआ है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा (Mother tongue) में होने पर बालकों की
संज्ञानात्मक क्षमता, समझ और अभिव्यक्ति अधिक सशक्त होती है।
इसलिए भाषा नियोजन में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा की
भाषा के रूप में अपनाने पर बल दिया जाता है। साथ ही, उच्च
स्तरों पर संपर्क भाषा, राष्ट्रीय भाषा या अंतरराष्ट्रीय
भाषाओं (जैसे अंग्रेज़ी) को क्रमशः शामिल किया जाता है, जिससे
विद्यार्थियों को व्यापक ज्ञान, रोजगार और वैश्विक संवाद के
अवसर मिल सकें। भारत में त्रिभाषा सूत्र (Three language Formula) इसी प्रकार के संतुलित भाषा नियोजन का उदाहरण है। वर्तमान में राष्ट्रीय
शिक्षा नीति 2020 भी इसी को केंद्र में रखती है।
इसके अतिरिक्त, शिक्षा की भाषा से संबंधित भाषा नियोजन केवल माध्यम तक सीमित नहीं रहता,
बल्कि पाठ्यपुस्तकों के अनुवाद, तकनीकी
शब्दावली के विकास, शिक्षक-प्रशिक्षण और डिजिटल शिक्षण
सामग्री के निर्माण तक विस्तृत होता है। यदि भाषा नियोजन प्रभावी न हो, तो शिक्षा भाषायी अभिजात्य तक सीमित हो सकती है और बड़ी जनसंख्या हाशिये
पर चली जाती है। अतः भाषा नियोजन और शिक्षा की भाषा का उद्देश्य ऐसी समावेशी और
व्यावहारिक व्यवस्था विकसित करना है, जो शैक्षिक गुणवत्ता,
भाषायी न्याय और राष्ट्रीय विकास—तीनों को समान रूप से सुदृढ़ करे।
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