भाषा नियोजन सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के बजाए मूलतः
समाजभाषाविज्ञान का अनुप्रयुक्त (Applied) पक्ष है। इसमें भाषाओं के सामाजिक प्रयोग, प्रतिष्ठा, मानकीकरण और विकास से जुड़ी समस्याओं के व्यावहारिक समाधान
खोजे जाते हैं। समाजभाषाविज्ञान यह समझने का प्रयास करता है कि भाषा समाज में कैसे
प्रयुक्त होती है। ‘भाषा नियोजन’ उसी समझ के आधार पर नीतियाँ, निर्णय और हस्तक्षेप तैयार करता है। इसका उद्देश्य बहुभाषी
समाजों में संप्रेषण की दक्षता बढ़ाना, भाषायी असमानता कम करना और राष्ट्रीय-सांस्कृतिक एकता को
सुदृढ़ करना होता है।
भाषा नियोजन सामान्यतः तीन स्तरों पर कार्य करता है—स्थिति
नियोजन (किस भाषा को, कहाँ
और किस क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाए), कॉर्पस/कोड नियोजन (भाषा का मानकीकरण, वर्तनी, व्याकरण, शब्दावली का विकास) और अधिगम नियोजन (भाषा शिक्षा, पाठ्यक्रम, शिक्षक-प्रशिक्षण)।
भारत जैसे बहुभाषी समाज में राजभाषा नीति, शिक्षा माध्यम, प्रशासनिक भाषा, तकनीकी शब्दावली का निर्माण, तथा डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं का सशक्तिकरण आदि सभी
भाषा नियोजन के अनुप्रयोग हैं। अतः भाषा नियोजन समाजभाषाविज्ञान को सैद्धांतिक
अध्ययन से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में ले जाकर भाषाओं के संतुलित, न्यायसंगत और प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करता है।
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