राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) 1968 स्वतंत्र भारत की पहली शिक्षा नीति थी। इसकी घोषणा 24 जुलाई 1968 को
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में की गई थी। यह नीति मुख्य रूप
से कोठारी आयोग (1964-66) की सिफारिशों पर आधारित थी।
इस नीति की प्रमुख विशेषताएं और उद्देश्य निम्नलिखित थे:
1. अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा
इसका मुख्य लक्ष्य 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए
निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना था।
इसका उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत राज्य के नीति
निर्देशक सिद्धांतों को पूरा करना था।
2. शिक्षा का ढांचा (10+2+3)
इस नीति ने पूरे देश में शिक्षा के एक समान ढांचे को अपनाने
का सुझाव दिया, जिसे
10+2+3 प्रणाली के रूप में जाना जाता है (10 वर्ष की स्कूली शिक्षा, 2 वर्ष की इंटरमीडिएट/हायर सेकेंडरी और 3 वर्ष का स्नातक
पाठ्यक्रम)।
3. त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language
Formula)
माध्यमिक स्तर पर त्रि-भाषा सूत्र को लागू करने पर जोर दिया
गया।
इसमें क्षेत्रीय भाषा, हिंदी और अंग्रेजी (या कोई अन्य आधुनिक भारतीय/विदेशी भाषा)
का समावेश शामिल था।
शिक्षा के माध्यम के रूप में क्षेत्रीय भाषाओं के विकास को
प्राथमिकता दी गई।
4. शिक्षकों की स्थिति और प्रशिक्षण
शिक्षकों को समाज का निर्माता मानते हुए उनके सम्मान, वेतन और सेवा शर्तों में सुधार पर बल दिया गया।
शिक्षक प्रशिक्षण (Teacher Training) को बेहतर बनाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए।
5. अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
§ समान अवसर:
शैक्षिक अवसरों की समानता पर जोर दिया गया ताकि पिछड़े वर्गों और विकलांग बच्चों
को भी शिक्षा मिल सके।
§ विज्ञान और
अनुसंधान: विज्ञान और गणित की शिक्षा को अनिवार्य बनाने और अनुसंधान (Research)
को
बढ़ावा देने की बात कही गई।
§ जीडीपी का
निवेश: शिक्षा पर राष्ट्रीय आय (GDP) का 6% खर्च करने का लक्ष्य रखा गया
था।
§ कृषि और
औद्योगिक शिक्षा: देश के आर्थिक विकास के लिए कृषि और व्यावसायिक शिक्षा के
विस्तार पर ध्यान दिया गया।
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