मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की पहचान, संस्कृति और संज्ञानात्मक विकास का मूल आधार होती है। किंतु
वैश्वीकरण, शहरीकरण
और प्रमुख भाषाओं के वर्चस्व के कारण अनेक मातृभाषाएँ आज संकट में हैं। ऐसे में
भाषा नियोजन मातृभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन का एक सशक्त माध्यम बनकर सामने आता
है। समाजभाषाविज्ञान के अनुप्रयुक्त पक्ष के रूप में भाषा नियोजन यह सुनिश्चित
करता है कि मातृभाषाओं को केवल सांस्कृतिक प्रतीक न मानकर उन्हें शिक्षा, प्रशासन और जनसंचार के व्यवहारिक क्षेत्रों में भी स्थान
मिले।
मातृभाषा संरक्षण के लिए भाषा नियोजन के अंतर्गत कई स्तरों
पर कार्य किया जाता है। स्थिति नियोजन के माध्यम से मातृभाषाओं को विद्यालयों, स्थानीय प्रशासन और सांस्कृतिक गतिविधियों में मान्यता दी
जाती है। रूप/कोड नियोजन के अंतर्गत लिपि विकास, वर्तनी मानकीकरण, शब्दकोश निर्माण और लोकभाषाओं का प्रलेखन किया जाता है।
वहीं अधिगम नियोजन के द्वारा मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा, पाठ्यपुस्तकों का निर्माण और शिक्षक-प्रशिक्षण सुनिश्चित
किया जाता है। इन प्रयासों से मातृभाषा केवल घरेलू उपयोग तक सीमित न रहकर ज्ञान और
अभिव्यक्ति का प्रभावी माध्यम बनती है।
प्रभावी भाषा नियोजन के अभाव में मातृभाषाएँ धीरे-धीरे
लुप्त होने लगती हैं, जिससे केवल भाषा ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ा लोकज्ञान, साहित्य और सांस्कृतिक स्मृति भी समाप्त हो जाती है। इसके
विपरीत,
सुनियोजित भाषा नीति मातृभाषाओं को सम्मान, अवसर और निरंतरता प्रदान करती है। अतः यह कहा जा सकता है कि
मातृभाषा संरक्षण केवल भावनात्मक विषय नहीं, बल्कि एक सामाजिक और शैक्षिक दायित्व है, जिसे सफलतापूर्वक निभाने के लिए भाषा नियोजन अनिवार्य है।
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