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Wednesday, November 7, 2018

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-7 (अभिहितान्वयवाद-अन्विताभिधानवाद)

अभिहितान्वयवाद-अन्विताभिधानवाद

अभिहितान्वयवाद
पद - मूल घटक   
वाक्य- पदों का समूह
प्रवर्तक - आचार्य कुमारिल
पद के अलावा वाक्य का कोई महत्व नहीं है।
अभिहितानां पदार्थानाम् अन्वयः
(पद अपने अर्थ को कहते हैं और वाक्य में उनका अन्वय हो जाता है। इस अन्वय से ही वाक्य का अर्थ अर्थात वाक्यार्थ व्यक्त होता है।)
  अन्विताभिधानवाद

वाक्य- मूल घटक
वाक्य को तोड़ने पर ही अलग-अलग पदों का अर्थ प्रात होता है।
प्रवर्तक - आचार्य प्रभाकर हैं (कुमारिल भट्ट के ही शिष्य)
अन्वितानां पदार्थानां अभिधानाम्
(वाक्य में पदों के अर्थ समन्वित रूप से विद्यमान रहते हैं। उनके अलग-अलग अर्थ को समझने के लिए वाक्य को तोड़ा जाता है।)


संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-6 (वाक्य के गुण)

वाक्य के गुण

आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि
आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि की संगतता प्राप्त करने वाले पद समूह को वाक्य के रूप में परिभाषित करते हुए कहा गया है-
    आकांक्षा योग्यता सन्निधिश्च वाक्यार्थ ज्ञान
हेतु पद समूहो वाक्यम्
  आकांक्षा : जब किसी शब्द का वाक्य में प्रयोग होता है तो उसे अन्य शब्दों की आवश्यकता होती है, जैसे- वाक्य में कर्ता शब्द के आते ही क्रिया (और सकर्मक क्रियाओं में कर्ता) की आकांक्षा।
योग्यता : वाक्य में प्रकार्य के स्तर पर एक शब्द के साथ दूसरे शब्द के जुड़ सकने की क्षमता।
अर्थमूलक योग्यता
व्याकरणमूलक योग्यता
सन्निधि : वाक्य निर्माण के लिए उच्चरित या अभिव्यक्त शब्दों का एक-दूसरे के पास या समीप ही होना।

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-5 (वाक् (भाषा) के रूप)

वाक् (भाषा) के रूप

चत्वारि वाक् परिमिता पदानि, तानि विदुर्ब्राह्मणा मे मनीषिण:।
  गुहा त्रिणी निहिता नेङ् गयंति, तुरीयं वाचो मनुष्याः वदंति॥
(वाक् के चार रूप होते हैं, इनमें से तीन गुफा में निहित रहते हैं। चौथे रूप का प्रयोग मनुष्य द्वारा बोलने में किया जाता है। )
परा : यह वाक् का अमूर्त मानसिक रूप है। इसका संबंध आत्मा से है। इसका कार्य हमें सर्वशक्तिमान सत्ता (ब्रह्म) से जोड़ना है।

पश्यंती : इसे भाषा का सूक्ष्म रूप कहा गया है। इसका संबंध मनुष्य के हृदय से है, जहाँ भाषिक अभिव्यक्तियों का निर्माण और बोध तो नहीं होता किंतु भाषायी अनुभूति रहती है।
मध्यमा : यह भाषा की चिंतनावस्था है। हम चिंतन करते हुए मन-ही-मन भाषा के जिस रूप का प्रयोग करते हैं, वह मध्यमा है। भाषा के इस रूप का प्रयोग करने के लिए बोलने या सुनने की आवश्यकता नहीं होती।
वैखरी : वैखरी भाषा का व्यक्त रूप है। हम अपने दैनिक व्यवहार में बोलने और सुनने के क्रम में भाषा के जिस रूप का प्रयोग करते हैं, उसे वैखरी नाम दिया गया है।

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-4 (कात्यायन और पतंजलि)

संस्कृत-कालीन भाषा चिंतन-4 (कात्यायन और पतंजलि)
1. कात्यायन और वार्तिक

पाणिनी द्वारा रचित अष्टाधायी में नियम इतने सूत्रवत हैं, कि एक सामान्य विद्वान या अध्येता द्वारा उन्हें पूर्णतः समझ पाना संभव नहीं है।
इसी कारण उनकी व्यवस्थित व्याख्या हेतु कुछ सहायक ग्रंथ भी लिखे गए। इन ग्रंथों को ही वार्तिकनाम दिया गया है।
संस्कृतकाल में कई आचार्यों, जैसे-व्याघ्रमूर्ति, बाडव, क्रोष्टा, भारद्वाज और कात्यायन द्वारा वार्तिकों की रचना की गई।
इन सभी वार्तिककारों में कात्यायनका नाम सर्वोपरि है।
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  कात्यायन का समय पाणिनी (350 ई.पू.) पतंजलि (150 ई.पू.) के बीच का माना गया है।
भोलानाथ तिवारी (2009) : वर्तमान में उपलब्ध वार्तिकों की संख्या लगभग1500.
इनमें से कितने कात्यायन के हैं यह जानने का अभी हमारे पास कोई ठोस साधन नहीं है।
कात्यायन ने पाणिनी के सूत्रों पर कुछ ऐसे व्यवस्थापरक वाक्य लिखे हैं जिनमें सूत्रों में जो कुछ कहा गया है, जो कुछ नहीं कहा जा सका, अथवा जो कुछ नहीं कहा जाना चाहिए इन बातों पर व्यवस्थित चर्चा की गई है। ये वाक्य ही वार्तिक के रूप में प्रसिद्ध हैं।
(रमानाथ शर्मा पाणिनी और उनकी अष्टाध्यायीभाषाशास्त्र के सूत्रधार, 2002)
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आचार्यों द्वारा वार्तिक की परिभाषा
उक्तानुक्तदुरुक्तानां चिंता यत्र प्रवर्तते। तं ग्रंथं वार्तिकं प्राहुर्वार्तिकज्ञाः मनीषीणः।
(अर्थात वार्तिक वह है जिसमें अष्टाध्यायी में उक्त (कहा गया), अनुक्त (नहीं कहा गया) और दुरुक्त (गलत कहा गया) पर विचार किया गया हो)।
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2. पतंजलि और महाभाष्य


  संस्कृत आचार्यों में पाणिनी और कात्यायन के बाद पतंजलि का नाम सर्वोपरि ।
समय : 150 ई.पू. के लगभग ।
रचना : महाभाष्य
इसमें भी पाणिनी के अष्टाध्यायी की तरह आठ अध्याय तथा प्रत्येक अध्याय में चार पाद ।
पाणिनी के उन सूत्रों की व्याख्या, जो समय के साथ अध्येताओं के लिए कठिन हो गए थे।
इस क्रम में कात्यायन के वार्तिकों का भी परीक्षण करते हुए उपयोगी और अनुपयोगी वार्तिकों पर प्रकाश ।
इसके अलावा भाषा के दार्शनिक पक्ष पर भी विचार ।