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Thursday, February 12, 2026

पर्यावरण भाषाविज्ञान (Eco-Linguistics)

 

इक्कीसवीं शताब्दी अभूतपूर्व पर्यावरणीय चुनौतियों से घिरी हुई है, जैसे- जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का ह्रास, वनों की कटाई, प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन। इन संकटों को प्रायः वैज्ञानिक, तकनीकी अथवा आर्थिक समस्याओं के रूप में देखा जाता है, किंतु विद्वानों का यह भी मानना है कि भाषा स्वयं मानव और प्रकृति के संबंधों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रकृति के बारे में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है, वही समाज की पर्यावरणीय सोच और व्यवहार को दिशा देती है।

इसी संदर्भ में पर्यावरण भाषाविज्ञान (Eco-Linguistics) का उदय हुआ। यह अनुशासन भाषा की उस भूमिका का अध्ययन करता है जिसके माध्यम से पर्यावरण के प्रति मानव का दृष्टिकोण निर्मित, संरक्षित या परिवर्तित होता है। यह विश्लेषण करता है कि भाषा किस प्रकार पर्यावरण-संरक्षण को प्रोत्साहित कर सकती है अथवा पर्यावरण-विनाश को बढ़ावा दे सकती है।

पर्यावरण भाषाविज्ञान : अर्थ और परिभाषा

पर्यावरण भाषाविज्ञान भाषाविज्ञान की वह शाखा है जो भाषा, पारिस्थितिकी और समाज के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करती है। इसमें यह देखा जाता है कि भाषा किस प्रकार पर्यावरणीय मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है, पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण को गढ़ती है और मानव व्यवहार को प्रभावित करती है।

एरन स्टिब (Arran Stibbe) के अनुसार- “Ecolinguistics is the study of language in relation to ecology, including the ways language encourages people to destroy or protect the ecosystems that life depends on.”

(Stibbe, Ecolinguistics: Language, Ecology and the Stories We Live By, 2015)

(पर्यावरण भाषाविज्ञान उस भाषा का अध्ययन है जो पारिस्थितिक तंत्रों के प्रति मानव के व्यवहार को नष्ट करने या संरक्षित करने के लिए प्रेरित करती है, जिन पर जीवन निर्भर करता है।)

पर्यावरण भाषाविज्ञान केवल भाषा का वर्णन नहीं करता, बल्कि एक आलोचनात्मक और नैतिक दृष्टिकोण भी अपनाता है। यह यह मूल्यांकन करता है कि कौन-सी भाषिक संरचनाएँ पर्यावरण के लिए हितकारी हैं और कौन-सी हानिकारक।

पर्यावरण भाषाविज्ञान का ऐतिहासिक विकास (Historical Development of Eco Linguistics)

पर्यावरण भाषाविज्ञान की जड़ें बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मिलती हैं। इसके विकास में निम्नलिखित प्रवृत्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही-

§  पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय आंदोलन, जिन्होंने स्थायित्व (sustainability) की आवश्यकता को उजागर किया।

§  आलोचनात्मक विमर्श विश्लेषण (Critical Discourse Analysis), जिसने भाषा, सत्ता और विचारधारा के संबंधों का अध्ययन किया।

§  प्रणालीगत कार्यात्मक भाषाविज्ञान (Systemic Functional Linguistics), विशेषतः एम. ए. के. हैलिडे का कार्य।

हैलिडे (1990) ने यह तर्क दिया कि पर्यावरणीय संकट आंशिक रूप से भाषिक संकट भी हैं, क्योंकि प्रचलित विमर्श असीम आर्थिक विकास और प्रकृति पर मानव प्रभुत्व को सामान्य बनाते हैं। यही विचार पर्यावरण भाषाविज्ञान की सैद्धांतिक नींव बने।

पर्यावरण भाषाविज्ञान के प्रमुख क्षेत्र (Major Areas of Eco Linguistics)

(क) प्रकृति का भाषिक निरूपण

पर्यावरण भाषाविज्ञान यह अध्ययन करता है कि किसी समुदाय या समाज की भाषा में प्रकृति को किस रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जैसे- प्रकृति को संसाधन’, ‘वस्तुया पूँजीके रूप में, वनों को लकड़ी भंडारके रूप में, नदियों को जल इकाइयोंके रूप में आदि। सामान्यतः हम देखते हैं कि लगभग सभी आदिकालीन समाजों एवं समुदायों की संस्कृति में पर्यावरण को ईश्वर तुल्य महत्व दिया गया है। यह आधुनिकता ही है, जिसने पर्यावरण को इतनी क्षति पहुंचाने का कार्य किया है।

(ख) पर्यावरणीय विमर्श विश्लेषण

पर्यावरणीय विमर्श विश्लेषण में उन क्षेत्रों की भाषा का अध्ययन किया जाता है, जो वर्तमान में पर्यावरण को प्रभावित करते हैं, जैसे- राजनीतिक भाषण, मीडिया रिपोर्ट, विकास नीतियाँ आदि। इसमें कॉर्पोरेट एवं विज्ञापन भाषा आदि का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है। इसमें पर्यावरण भाषाविज्ञानी यह जाँचते हैं कि सतत विकास”, “हरित विकासया पर्यावरण-अनुकूलजैसे शब्द वास्तव में संरक्षण को बढ़ावा देते हैं या केवल पर्यावरणीय क्षति को छिपाने का भाषिक साधन बन जाते हैं।

(ग) भाषा, विचारधारा और पारिस्थितिकी

भाषा केवल यथार्थ का वर्णन नहीं करती, बल्कि विचारधाराओं का निर्माण भी करती है। पर्यावरण भाषाविज्ञान उन विचारधाराओं का विश्लेषण करता है जो असीम विकास, उपभोक्तावाद और मानव प्रभुत्व को स्वाभाविक और वैध ठहराती हैं। इन विचारधाराओं को उजागर कर पर्यावरण भाषाविज्ञान पर्यावरण-विरोधी कथाओं को चुनौती देता है।

(घ) आदिवासी भाषाएँ और पारिस्थितिक ज्ञान

आदिवासी और प्राचीन सभ्यताओं की भाषाओं में समृद्ध पारिस्थितिक ज्ञान निहित होता है, जैसे- वनस्पति और जीवों का सूक्ष्म वर्गीकरण, टिकाऊ भूमि-उपयोग की परंपराएँ, प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित सांस्कृतिक कथाएँ आदि। इन सभी के संकलन और विश्लेषण के माध्यम से पर्यावरण भाषाविज्ञान भाषिक विविधता के संरक्षण को पारिस्थितिक स्थायित्व से जोड़कर देखता है।

पर्यावरण भाषाविज्ञान का अंतरानुशासनिक पक्ष (Interdisciplinary Aspect of Eco Linguistics)

पर्यावरण भाषाविज्ञान एक अंतरानुशासनिक क्षेत्र है, जो कई अनुशासनों से जुड़ा है, जैसे- भाषाविज्ञान और पर्यावरण अध्ययन इसके मूलभूत विषय हैं। इनके साथ समाजशास्त्र, मानवशास्त्र, दर्शन और नैतिकता और जनसंचार भी इसके सहायक विषय हैं।

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