भाषा मानव बुद्धि के साथ सहजात रूप से जुड़ी हुई शक्ति है। यह शक्ति बुद्धि का
एक भाग भी है और बुद्धि विकास तथा संचरण की वाहक भी। भाषा ही मानव मस्तिष्क को
विचार करने तथा उसे एक-दूसरे के साथ संप्रेषित करने की क्षमता प्रदान करती है। इस
कारण भाषा को जानने-समझने का कार्य स्वतंत्र विषय मात्र के रूप में नहीं रहता, बल्कि यह मानव बुद्धि और ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों से सहज रूप से जुड़
जाता है। भाषाविज्ञान में मानव भाषाओं की व्यवस्था, संरचना और प्रकार्य का जो आधारभूत अध्ययन किया जाता है, उसे हम सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के रूप में जानते हैं। इस अध्ययन का अनुप्रयोग
जिन विविध क्षेत्रों में होता है, वे अनुप्रयोग क्षेत्र
कहलाते हैं। इस आधार पर भाषाविज्ञान के मूलत: दो प्रकार किए जाते हैं- सैद्धांतिक
भाषाविज्ञान और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान। सैद्धांतिक भाषाविज्ञान मानव भाषाओं का
केवल सैद्धांतिक अध्ययन करता है। इससे हम भाषायी इकाइयों और नियमों को तो जान लेते
हैं, किंतु उसका प्रकार्यात्मक और व्यावहारिक पक्ष अभी भी अधूरा रहता है। भाषा मानव
मस्तिष्क,
समाज और ज्ञान-विज्ञान के जिन क्षेत्रों से अपने आप को
जोड़ती है,
उनके साथ मिलकर किया जाने वाला अध्ययन ही इसे संपूर्णता
प्रदान करता है। इस कारण भाषा अध्ययन का एक अन्य पक्ष भी उभर कर सामने आता है-
जिसे हम अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान के रूप में जानते हैं। पारंपरिक रूप से इसे
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत ही रखा जाता रहा है। रवींद्रनाथ श्रीवास्तव
आदि भारतीय भाषावैज्ञानिकों ने भी अपनी पुस्तकों में इस पद्धति का अनुसरण किया है।
इस वर्णन में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के ही दो पक्ष किए जाते हैं- व्यावहारिक
अनुप्रयोग तथा अंतरानुशासनिक अनुप्रयोग। किंतु यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि
भाषाविज्ञान का अंतरानुशासनिक पक्ष कोई अनुप्रयोग नहीं है बल्कि यह अन्य विषयों के
साथ जुड़कर भाषा के बारे में जानने का ही एक विस्तृत उपक्रम है। यही कारण है कि यह
सैद्धांतिक भाषाविज्ञान और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के बीच में स्थापित होने वाली
एक कड़ी के रूप में प्राप्त होता है। अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान (Interdisciplinary
Linguistics) नाम इसके लिए सर्वोपयुक्त है। इसके अंतर्गत समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान,
संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान,
गणितीय भाषाविज्ञान, फॉरेंसिक
भाषाविज्ञान जैसे दर्जन भर से अधिक विषय आ जाते हैं। इन विषयों की अपनी अध्ययन
पद्धति है और इनके स्वयं के अनुप्रयुक्त पक्ष भी हैं, जैसे- क्षेत्र भाषाविज्ञान, भाषा नियोजन और भाषा
सर्वेक्षण जैसे कार्य सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के साथ-साथ समाजभाषाविज्ञान के
अनुप्रयुक्त पक्ष हैं। इसी प्रकार भाषा संबंधी विकारों का विवेचन एवं निवारण
संबंधी उपायों की खोज मनोभाषाविज्ञान का अनुप्रयुक्त पक्ष है। इससे स्पष्ट होता है
कि अंतरानुशासनिक भाषाविज्ञान को सैद्धांतिक और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के
समानांतर एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में ही व्याख्यायित किया जाए।
(संदर्भ : गवेषणा, 142 की भूमिका)
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