पर्यावरण भाषाविज्ञान के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं-
(क) प्रकृति का भाषिक निरूपण
पर्यावरण भाषाविज्ञान यह अध्ययन
करता है कि किसी समुदाय या समाज की भाषा में प्रकृति को किस रूप में प्रस्तुत किया
जाता है,
जैसे- प्रकृति को ‘संसाधन’,
‘वस्तु’ या ‘पूँजी’
के रूप में, वनों
को ‘लकड़ी भंडार’
के रूप में, नदियों
को ‘जल इकाइयों’
के रूप में आदि। सामान्यतः हम देखते हैं कि लगभग सभी
आदिकालीन समाजों एवं समुदायों की संस्कृति में पर्यावरण को ईश्वर तुल्य महत्व दिया
गया है। यह आधुनिकता ही है, जिसने पर्यावरण को इतनी क्षति पहुंचाने का
कार्य किया है।
(ख) पर्यावरणीय विमर्श विश्लेषण
पर्यावरणीय विमर्श विश्लेषण में उन क्षेत्रों
की भाषा का अध्ययन किया जाता है, जो वर्तमान में
पर्यावरण को प्रभावित करते हैं, जैसे- राजनीतिक भाषण,
मीडिया रिपोर्ट, विकास नीतियाँ आदि। इसमें कॉर्पोरेट
एवं विज्ञापन भाषा आदि का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है। इसमें पर्यावरण
भाषाविज्ञानी यह जाँचते हैं कि “सतत विकास”, “हरित विकास”
या “पर्यावरण-अनुकूल”
जैसे शब्द वास्तव में संरक्षण को बढ़ावा देते हैं या केवल
पर्यावरणीय क्षति को छिपाने का भाषिक साधन बन जाते हैं।
(ग) भाषा, विचारधारा और पारिस्थितिकी
भाषा केवल यथार्थ का वर्णन नहीं
करती, बल्कि विचारधाराओं का निर्माण भी करती है। पर्यावरण भाषाविज्ञान उन
विचारधाराओं का विश्लेषण करता है जो असीम विकास, उपभोक्तावाद और मानव प्रभुत्व को स्वाभाविक और वैध ठहराती हैं। इन
विचारधाराओं को उजागर कर पर्यावरण भाषाविज्ञान पर्यावरण-विरोधी कथाओं को चुनौती
देता है।
(घ) आदिवासी भाषाएँ और पारिस्थितिक ज्ञान
आदिवासी और प्राचीन सभ्यताओं की भाषाओं
में समृद्ध पारिस्थितिक ज्ञान निहित होता है, जैसे- वनस्पति और जीवों का सूक्ष्म वर्गीकरण, टिकाऊ
भूमि-उपयोग की परंपराएँ, प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित
सांस्कृतिक कथाएँ आदि। इन सभी के संकलन और विश्लेषण के माध्यम से पर्यावरण
भाषाविज्ञान भाषिक विविधता के संरक्षण को पारिस्थितिक स्थायित्व से जोड़कर देखता
है।
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