नृभाषाविज्ञान के प्रमुख अध्ययन-क्षेत्र
इस प्रकार हैं-
(क)भाषा और संस्कृति (Language and Culture)
नृभाषाविज्ञान का केंद्रीय विषय
भाषा और संस्कृति का संबंध है। प्रत्येक भाषा अपने बोलने वालों की सांस्कृतिक
विशेषताओं को प्रतिबिंबित करती है,जैसे- रक्तसंबंध शब्द, रंग-नाम, लोककथाएँ,
धार्मिक शब्दावली आदि।
(ख) संप्रेषण की नृजातीयता (Ethnography
of Communication)
इसमें विविध वाक् समुदाय (Speech communities), उनके के समाजसांस्कृतिक संदर्भ में घटित
होने वाली वाक् घटनाएँ (Speech events) और उनके संप्रेषणीयता
के मानक (Communicative norms) आदि आते हैं।
(ग) आदिवासी और अलिखित भाषाओं का दस्तावेजीकरण (Documentation of Tribal and Unwritten languages)
नृभाषाविज्ञान विशेष रूप से आदिवासी
भाषाओं, संकटापन्न भाषाओं और मौखिक परंपराओं का
अध्ययन करता है,
ताकि लुप्तप्राय भाषाओं और संस्कृतियों का संरक्षण किया जा
सके।
(घ) भाषा,
अनुष्ठान और परंपरा
किसी समाज के अनुष्ठान, त्योहार,
धार्मिक क्रियाएँ और लोकगीत भाषा के माध्यम से ही संचरित
होते हैं। नृभाषाविज्ञान इन भाषिक व्यवहारों का सांस्कृतिक विश्लेषण करता है।
(ङ) भाषा सापेक्षता (Linguistic Relativity) सिद्धांत
मानवशास्त्रीय भाषाविज्ञान में भाषा-सापेक्षता
(Linguistic
Relativity) का सिद्धांत अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस सिद्धांत के अनुसार
किसी व्यक्ति की सोच और संसार को देखने का दृष्टिकोण उसकी भाषा से प्रभावित होता
है। भिन्न-भिन्न भाषाओं में: समय की अवधारणा अलग होती है, रंगों का वर्गीकरण भिन्न होता है, रिश्तों
के लिए अलग शब्द होते हैं आदि। अतः जिस व्यक्ति की भाषा में जिस प्रकार की
शब्दावली होती है, उसके विचार जाने-अनजाने में उसी प्रकार से
निर्मित होते हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भाषा
केवल विचारों को व्यक्त नहीं करती, बल्कि विचारों
के निर्माण में भी भूमिका निभाती है। इस संबंध में Sapir–Whorf
Hypothesis से हम सभी परिचित हैं, जिसमें कहा
गया है कि भाषा अपने भाषाभाषी की विश्वदृष्टि को प्रभावित करती है। विस्तार से
पढ़ें-
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