भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं है, बल्कि वह मानव समाज,
संस्कृति और चिंतन-प्रणाली का दर्पण भी है। किसी भी समाज की
परंपराएँ,
विश्वास, मूल्य, ज्ञान और विश्व-दृष्टि उसकी भाषा में निहित होते हैं। भाषा और संस्कृति के इसी
घनिष्ठ संबंध के वैज्ञानिक अध्ययन को नृभाषाविज्ञान (Anthropological
Linguistics) कहा जाता है।
‘नृभाषाविज्ञान’
भाषाविज्ञान और मानवशास्त्र (Anthropology) के बीच विकसित एक महत्वपूर्ण अंतरानुशासनिक क्षेत्र है। इसे ‘मानवशास्त्रीय भाषाविज्ञान’ या ‘नृवैज्ञानिक
भाषाविज्ञान’ भी कहते हैं। इसमें भाषा का अध्ययन सामाजिक-सांस्कृतिक
संदर्भ में किया जाता है।
नृभाषाविज्ञान : अर्थ और परिभाषा
नृभाषाविज्ञान को हिंदी और अंग्रेजी
में निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित कर सकते हैं-
“नृभाषाविज्ञान वह शाखा है जिसमें
भाषा को मानव संस्कृति,
सामाजिक व्यवहार, परंपरा और जीवन-शैली
के संदर्भ में अध्ययन किया जाता है।“
“Anthropological Linguistics is the study of language in its cultural context, focusing on how language
both reflects and shapes social life and cultural practices.”
इस विषय में यह समझने का प्रयास करता है कि भाषा
किसी समाज की संस्कृति को कैसे अभिव्यक्त करती है और संस्कृति भाषा को कैसे
प्रभावित करती है। एडवर्ड सपीर (Edward Sapir) ने कहा
है-
“भाषा संस्कृति से पृथक अस्तित्व नहीं रखती।”
इस परिभाषा से स्पष्ट है कि
नृभाषाविज्ञान भाषा को सांस्कृतिक जीवन के अभिन्न अंग के रूप में देखता है।
नृभाषाविज्ञान का ऐतिहासिक विकास
नृभाषाविज्ञान का विकास मुख्यतः 20वीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में हुआ। इसके विकास में निम्न विद्वानों का
महत्वपूर्ण योगदान रहा—
§ फ्रांज बोआस (Franz
Boas) – उन्होंने भाषा को संस्कृति के अध्ययन का अनिवार्य अंग माना।
§ एडवर्ड सैपिर (Edward
Sapir) – भाषा और संस्कृति के गहरे संबंध को स्थापित किया।
§ बेंजामिन ली व्हॉर्फ (Benjamin
Lee Whorf) – भाषा और चिंतन के संबंध पर बल दिया (सैपिर–व्हॉर्फ परिकल्पना)।
इन विद्वानों ने यह सिद्ध किया कि
भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक ज्ञान
की संरचना भी करती है।
नृभाषाविज्ञान के प्रमुख अध्ययन-क्षेत्र
नृभाषाविज्ञान के प्रमुख अध्ययन-क्षेत्र
इस प्रकार हैं-
(क)भाषा और संस्कृति (Language and Culture)
नृभाषाविज्ञान का केंद्रीय विषय
भाषा और संस्कृति का संबंध है। प्रत्येक भाषा अपने बोलने वालों की सांस्कृतिक
विशेषताओं को प्रतिबिंबित करती है,जैसे- रक्तसंबंध शब्द, रंग-नाम, लोककथाएँ,
धार्मिक शब्दावली आदि।
(ख) संप्रेषण की नृजातीयता (Ethnography
of Communication)
इसमें विविध वाक् समुदाय (Speech communities), उनके के समाजसांस्कृतिक संदर्भ में घटित
होने वाली वाक् घटनाएँ (Speech events) और उनके संप्रेषणीयता
के मानक (Communicative norms) आदि आते हैं।
(ग) आदिवासी और अलिखित भाषाओं का दस्तावेजीकरण (Documentation of Tribal and Unwritten languages)
नृभाषाविज्ञान विशेष रूप से आदिवासी
भाषाओं, संकटापन्न भाषाओं और मौखिक परंपराओं का
अध्ययन करता है,
ताकि लुप्तप्राय भाषाओं और संस्कृतियों का संरक्षण किया जा
सके।
(घ) भाषा,
अनुष्ठान और परंपरा
किसी समाज के अनुष्ठान, त्योहार,
धार्मिक क्रियाएँ और लोकगीत भाषा के माध्यम से ही संचरित
होते हैं। नृभाषाविज्ञान इन भाषिक व्यवहारों का सांस्कृतिक विश्लेषण करता है।
(ङ) भाषा सापेक्षता (Linguistic Relativity) सिद्धांत
मानवशास्त्रीय भाषाविज्ञान में भाषा-सापेक्षता
(Linguistic
Relativity) का सिद्धांत अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस सिद्धांत के अनुसार
किसी व्यक्ति की सोच और संसार को देखने का दृष्टिकोण उसकी भाषा से प्रभावित होता
है। भिन्न-भिन्न भाषाओं में: समय की अवधारणा अलग होती है, रंगों का वर्गीकरण भिन्न होता है, रिश्तों
के लिए अलग शब्द होते हैं आदि। अतः जिस व्यक्ति की भाषा में जिस प्रकार की
शब्दावली होती है, उसके विचार जाने-अनजाने में उसी प्रकार से
निर्मित होते हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भाषा
केवल विचारों को व्यक्त नहीं करती, बल्कि विचारों
के निर्माण में भी भूमिका निभाती है। इस संबंध में Sapir–Whorf
Hypothesis से हम सभी परिचित हैं, जिसमें कहा
गया है कि भाषा अपने भाषाभाषी की विश्वदृष्टि को प्रभावित करती है। विस्तार से
पढ़ें-
सपीर-वोर्फ परिकल्पना (Sapir- Whorf Hypothesis)
भारतीय परिप्रेक्ष्य (Indian Perspective)
भारत भाषायी और सांस्कृतिक विविधता
का देश है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं, जिनमें से अनेक जनजातीय और अलिखित हैं। भारतीय संदर्भ में मानवशास्त्रीय भाषाविज्ञान
का विशेष महत्त्व है, क्योंकि:
§ जनजातीय समाजों की भाषाएँ उनके जीवन-दर्शन को समझने में सहायक हैं
§ बहुभाषिकता भारतीय समाज की मूल विशेषता है
§ भाषा और पहचान का संबंध अत्यंत जटिल है
भारतीय भाषाओं का मानवशास्त्रीय
अध्ययन सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण में योगदान देता है। इस प्रकार
स्पष्ट है कि भारतीय परिदृश्य में नृभाषाविज्ञान या मानवशास्त्रीय भाषाविज्ञान की
अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है।
No comments:
Post a Comment