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चिकित्सा
भाषाविज्ञान (Clinical Linguistics)
भाषा मानव की सबसे विशिष्ट और जटिल
क्षमताओं में से एक है। यह केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि संज्ञान (cognition), सामाजिक
अंतःक्रिया, सांस्कृतिक अंतरण और पहचान-निर्माण का माध्यम भी
है। भाषा के द्वारा मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं, उद्देश्यों और सामाजिक संबंधों को अभिव्यक्त करता है। अतः भाषा-क्षमता में
किसी भी प्रकार का व्यवधान व्यक्ति के शैक्षिक प्रदर्शन, सामाजिक
सहभागिता, भावनात्मक स्वास्थ्य और समग्र जीवन-गुणवत्ता को
गहराई से प्रभावित करता है।
भाषा एक सुव्यवस्थित प्रणाली है, जो अनेक स्तरों पर कार्य करती है- ध्वन्यात्मक, स्वनिमिक, रूपात्मक, वाक्यात्मक,
अर्थात्मक और प्रोक्तीय। सफल संप्रेषण इन सभी स्तरों के समन्वित
कार्य पर निर्भर करता है। जब यह समन्वय न्यूरोलॉजिकल, मनोवैज्ञानिक,
विकासात्मक या सामाजिक कारणों से बाधित होता है, तब भाषा-विकार (language disorders) उत्पन्न होते
हैं। इन विकारों के अध्ययन एवं निवारण से संबंधित भाषाविज्ञान की शाखा चिकित्सा भाषाविज्ञान
कहलाती है।
भाषा-विकार केवल भाषिक समस्याएँ
नहीं हैं; वे संज्ञानात्मक विकास, तंत्रिका-कार्यप्रणाली, शिक्षा और सामाजिक एकीकरण से
गहराई से जुड़े होते हैं। भाषा-विकार से ग्रस्त बच्चों को साक्षरता और कक्षा-अधिगम
में कठिनाई होती है, जबकि वयस्कों में अर्जित भाषा-विकार
(जैसे- अफेज़िया आदि) स्वतंत्रता और सामाजिक पहचान के ह्रास का कारण बन सकते हैं।
परंपरागत रूप से भाषा-विकारों के
अध्ययन और उपचार में चिकित्सा या व्यवहारवादी दृष्टिकोणों का प्रभुत्व रहा। किंतु
ये दृष्टिकोण प्रायः भाषा की आंतरिक संरचना और भाषिक विघटन की प्रणालीगत प्रकृति
को पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं कर पाए। इसी कमी ने चिकित्सा (क्लिनिकल)
भाषाविज्ञान के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
चिकित्सा भाषाविज्ञान का उद्भव (Origin of Clinical
linguistics)
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान का
उद्भव इस समझ से हुआ कि भाषा-विकारों के मूल्यांकन, निदान और उपचार में भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों की निर्णायक भूमिका हो सकती
है। यह अनुशासन भाषावैज्ञानिक मॉडलों और वर्णनात्मक उपकरणों का प्रयोग कर यह समझने
का प्रयास करता है—
§ विविध विकारों से भाषा किस प्रकार प्रभावित होती है
§ भाषा के कौन-से घटक विकृति से संबंधित हो सकते हैं
§ विभिन्न विकारों में भाषिक हानि कैसे भिन्न होती है
डेविड क्रिस्टल उन प्रारंभिक
विद्वानों में हैं जिन्होंने चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान को एक स्वतंत्र
अनुशासन के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, संगठित भाषावैज्ञानिक ढाँचे के बिना भाषा-विकारों की समुचित व्याख्या संभव
नहीं है।
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान में
भाषाविज्ञान के अलावा कई अन्य ज्ञानाशासन भी कार्य करते हैं, जैसे- वाक् एवं भाषा रोगविज्ञान (Speech and Language
Pathology), तंत्रिका-विज्ञान,
मनोविज्ञान एवं शिक्षाशास्त्र आदि।
इसका मुख्य उद्देश्य भाषावैज्ञानिक
ज्ञान का उपयोग कर नैदानिक अभ्यास को अधिक प्रभावी बनाना है—विशेषतः मूल्यांकन, हस्तक्षेप और
पुनर्वास के क्षेत्रों में। यह अनुशासन इस तथ्य पर बल देता है कि सफल भाषा-चिकित्सा
भाषिक रूप से सूचित (linguistically informed) होनी चाहिए,
न कि केवल अंतर्ज्ञान या सामान्य संप्रेषण रणनीतियों पर आधारित।
चिकित्सा भाषाविज्ञान : अर्थ एवं परिभाषा (Clinical
linguistics : Meaning and Definition)
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की वह शाखा है जो भाषावैज्ञानिक संकल्पनाओं, विधियों और सिद्धांतों के माध्यम से भाषा-विकारों का अध्ययन
करती है। इसका मुख्य ध्यान भाषा-हानि के प्रतिरूपों की पहचान और उनकी व्याख्या पर
होता है।
सामान्य भाषाविज्ञान जहाँ आदर्श
वक्ताओं की भाषिक क्षमता का अध्ययन करता है, वहीं चिकित्सा
(क्लिनिकल) भाषाविज्ञान वास्तविक व्यक्तियों की विचलित, विलंबित
या विकृत भाषा का विश्लेषण करता है। डेविड क्रिस्टल (David Crystal, 1981)
के अनुसार-
“Clinical
linguistics is the application of linguistic science to the study of language
disability.”
Perkins
(1995) इसे निम्नलिखित प्रकार से समझाते हैं-
“A
discipline that seeks to describe, analyze, and explain language disorders
using the theoretical and methodological tools of linguistics.”
ode
(2001) इस विषय की अंतरानुशासनिकता के बारे में कहते हैं-
“Clinical
linguistics provides a linguistic bridge between theoretical models of language
and the practical realities of speech and language pathology.”
चिकित्सा भाषाविज्ञान (Clinical Linguistics) और वाक्-दोष चिकित्सा (Speech Therapy)
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान का
विशिष्ट क्षेत्र ‘वाक्-दोष चिकित्सा’ (Speech Therapy) है। ‘वाक्-दोष चिकित्सा’ (Speech
Therapy) की चर्चा स्वतंत्र रूप भी होती है। इन दोनों
की विषयवस्तु परस्पर संबंधित हैं, फिर भी चिकित्सा
(क्लिनिकल) भाषाविज्ञान और वाक्-भाषा रोगविज्ञान एक समान नहीं हैं। इनके मुख्य अंतर
निम्नलिखित प्रकार से देखे जा सकते हैं-
|
चिकित्सा भाषाविज्ञान
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वाक्-दोष चिकित्सा
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सिद्धांत-प्रधान
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अभ्यास-प्रधान
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भाषिक विश्लेषण पर बल
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उपचार और पुनर्वास पर बल
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सभी भाषिक दोषों पर
केंद्रित
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केवल वाक् (स्पीच) पर
केंद्रित
|
चिकित्सा भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग
क्षेत्र (Applied Areas of Clinical Linguistics)
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान का
प्रयोग निम्न क्षेत्रों में किया जाता है-
§ भाषा-विकारों का मूल्यांकन
§ निदान और वर्गीकरण
§ उपचार-योजना का निर्माण
§ प्रगति का मूल्यांकन
§ अनुसंधान और प्रशिक्षण
यह विकासात्मक विकारों (जैसे—Specific Language Impairment, Autism) तथा अर्जित विकारों
(जैसे—Aphasia, Dementia) दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाता है।
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान का
ऐतिहासिक विकास (Historical Development of Clinical Linguistics)
इसे संक्षेप में निम्नलिखित प्रकार से
समझ सकते हैं-
(क) प्रारंभिक चिकित्सीय और
तंत्रिकीय आधार
इसके अंतर्गत उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य
में तंत्रिका-विज्ञान में हुए मुख्य कार्य आते हैं। तत्कालीन समय में मस्तिष्क-क्षति
से ग्रस्त रोगियों के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्र
भाषा के विशिष्ट कार्यों से जुड़े होते हैं। इनमें से दो खोजें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं-
Broca's Area (ब्रोका क्षेत्र): पॉल ब्रॉका (1861) ने बाएँ अग्र-मस्तिष्क खंड के एक क्षेत्र की पहचान की, जो वाक्-उत्पादन से संबंधित है। इस क्षेत्र की क्षति से
रोगियों की भाषा अल्प-प्रवाही और श्रमसाध्य हो जाती है। इस क्षेत्र को उनके नाम पर
‘ब्रोका क्षेत्र’ (Broca’s Area) कहा जाता
है। यह मुख्य रूप से भाषा के उत्पादन (production), यानी
बोलने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है। यह मस्तिष्क के फ्रंटल लोब (frontal
lobe) के बाएं हिस्से में स्थित होता है (अधिकांश लोगों में)। इस
क्षेत्र को नुकसान होने से व्यक्ति को बोलने में कठिनाई होती है, हालांकि वह भाषा को समझ सकता है (जिसे ब्रोका अफेज़िया या एक्सप्रेसिव
अफेज़िया कहा जाता है)।
Wernicke's Area (वरनिके क्षेत्र): कार्ल वर्निके (1874) ने बाएँ टेम्पोरल लोब के एक क्षेत्र की पहचान की, जो भाषा-बोध से संबंधित है। इसकी क्षति से भाषा प्रवाही तो
रहती है, किंतु अर्थहीन हो जाती है। इस क्षेत्र को उनके नाम पर
‘वरनिके क्षेत्र’ (Wernicke’s Area) कहा
जाता है। यह मुख्य रूप से भाषा को समझने (comprehension) के
लिए जिम्मेदार है, जिसमें बोली जाने वाली और लिखित भाषा
दोनों शामिल हैं। यह मस्तिष्क के टेम्पोरल लोब (temporal lobe) के पीछे के हिस्से में स्थित होता है। इस क्षेत्र को नुकसान होने से
व्यक्ति धाराप्रवाह बोल तो सकता है, लेकिन उसकी बातों में
अर्थ या समझ की कमी होती है, और उसे दूसरों की बातें समझने
में भी परेशानी होती है (जिसे वरनिके अफेज़िया या रिसेप्टिव अफेज़िया कहा जाता
है)।
ये दोनों क्षेत्र तंत्रिका तंतुओं (nerve fibers) के एक बंडल से जुड़े होते हैं जिसे आर्कुएट
फासिकुलस (arcuate fasciculus) कहा जाता है, जो उनके बीच सूचना के प्रवाह को सुगम बनाता है।
इन खोजों ने भाषा-विकारों के
तंत्रिकीय आधार को स्थापित किया। बीसवीं शताब्दी के मध्य में जनरेटिव व्याकरण के
उदय के साथ भाषा-विकारों और व्याकरणिक क्षमता के संबंध पर नए प्रश्न उठे। चॉम्स्की
द्वारा प्रस्तुत क्षमता (competence) और प्रदर्शन (performance)
का भेद नैदानिक अनुसंधान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ,
जैसे- क्या भाषिक ज्ञान स्वयं क्षतिग्रस्त
होता है?; या उस ज्ञान तक पहुँच बाधित होती है? आदि। इन प्रश्नों ने विकासात्मक और अर्जित भाषा-विकारों की समझ को गहरा
किया। 1970 और 1980 के दशकों में चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान एक स्वतंत्र
अनुशासन के रूप में स्थापित हुआ। इस चरण में भाषाविज्ञानी और चिकित्सक सहयोग करने
लगे। वाक् और भाषा विकारों के मूल्यांकन में भाषिक विश्लेषण को स्थान मिला। न्यूरोइमेजिंग
और प्रयोगात्मक तकनीकें, तंत्रिका-विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बहुभाषिक अनुसंधान में हुई वर्तमान प्रगति के साथ
यह क्षेत्र निरंतर विकसित हो रहा है।
चिकित्सा भाषाविज्ञान और संज्ञानात्मक
भाषाविज्ञान (Clinical Linguistics and Cognitive Linguistics)
संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान भाषा को
मानव संज्ञान से जुड़ा मानता है। इस दृष्टिकोण से भाषा-विकारों को ‘स्मृति, ध्यान, संकल्पना
निर्माण’ आदि अनेक मानसिक प्रक्रियाओं तथा इनसे संबंधित
समस्याओं के रूप में समझा जाता है। यह दृष्टिकोण डिमेंशिया, अल्ज़ाइमर और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी है।
भाषा-विकारों का वर्गीकरण (Classification of Language Disorders)
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान
में भाषा-विकारों का वर्गीकरण अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे निदान,
उपचार और अनुसंधान में स्पष्टता आती है। भाषा-विकारों को
विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है। इस दृष्टि से दो मुख्य वर्ग देखे जा सकते
हैं- विकासात्मक और अर्जित भाषा-विकार। इन्हें संक्षेप में देखते हैं-
(क) विकासात्मक भाषा-विकार
ये विकार बाल्यावस्था में प्रकट
होते हैं,
जैसे - Specific Language Impairment (SLI), विकासात्मक डिस्लेक्सिया, ऑटिज़्म
स्पेक्ट्रम विकार आदि। इनमें भाषा-अधिगम की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से बाधित होती
है।
(ख) अर्जित भाषा-विकार
ये विकार मस्तिष्क-क्षति, स्ट्रोक या दुर्घटना के पश्चात उत्पन्न होते हैं, जैसे- अफेज़िया, डिसआर्थ्रिया, एप्रैक्सिया
ऑफ़ स्पीच आदि।
अफेज़िया के प्रकार (Types of Aphasia)
अफेज़िया भाषा-विकारों का एक प्रमुख
रूप है। इसके कई प्रकार होते हैं, जिनमें से प्रमुख रूप
इस प्रकार हैं—
§ ब्रोका अफेज़िया
§ वरनिके अफेज़िया
§ कंडक्शन अफेज़िया
§ ग्लोबल अफेज़िया
प्रत्येक प्रकार में भाषा के
विभिन्न स्तर प्रभावित होते हैं।
मोटर स्पीच विकार (Motor Speech Disorder)
इसके दो प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-
(क) डिसआर्थ्रिया : यह वाक्-मांसपेशियों के नियंत्रण में कमी के कारण उत्पन्न होता है।
(ख) एप्रैक्सिया ऑफ़ स्पीच : इसमें वाक्-योजना (speech
planning) प्रभावित होती है, जबकि
मांसपेशियाँ सामान्य रहती हैं।
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान और
अन्य अनुशासन (Clinical Linguistics and Other Disciplines)
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान एक
‘अंतरानुशासनिक क्षेत्र’ है,
जो भाषा-विकारों की जटिल प्रकृति को समझने के लिए विभिन्न
अनुशासनों से अंतर्दृष्टियाँ ग्रहण करता है। भाषा केवल भाषिक संरचना का परिणाम
नहीं, बल्कि मस्तिष्क,
संज्ञान, व्यवहार और सामाजिक
अंतःक्रिया से गहराई से जुड़ी हुई प्रक्रिया है। अतः भाषा-विकारों का समुचित
अध्ययन तभी संभव है जब भाषाविज्ञान के साथ-साथ अन्य संबंधित अनुशासनों का सहयोग
लिया जाए।
1. चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान
और न्यूरोभाषाविज्ञान
‘न्यूरोभाषाविज्ञान’
भाषा और मस्तिष्क के संबंध का अध्ययन करता है। यह यह स्पष्ट करता है कि मस्तिष्क
के कौन-से क्षेत्र भाषा के विभिन्न कार्यों से जुड़े होते हैं। न्यूरोभाषाविज्ञान ‘अफेज़िया के प्रकारों की पहचान, मस्तिष्क-क्षति और
भाषिक हानि के संबंध की व्याख्या और न्यूरोइमेजिंग (fMRI, PET) के निष्कर्षों का भाषिक विश्लेषण’ आदि में
भाषा-विकारों के तंत्रिकीय आधार को स्पष्ट करता है, जबकि चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान उनके भाषिक प्रतिरूपों का विश्लेषण करता
है।
2. चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान और
मनोभाषाविज्ञान
मनोभाषाविज्ञान भाषा-अधिगम, प्रसंस्करण और उत्पादन की मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। इस अनुशासन
से चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान को यह समझने में सहायता मिलती है कि मस्तिष्क में
ध्यान (attention), स्मृति (memory) और सूचना-संसाधन (information processing) आदि भाषा-विकार
की समस्याओं से कैसे जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए Specific Language
Impairment (SLI) और डिस्लेक्सिया के अध्ययन में मनोभाषावैज्ञानिक मॉडल
अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
3. चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान और वाक्-दोष चिकित्सा
वाक्-दोष चिकित्सा चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान का सबसे निकटवर्ती अनुशासन है। चिकित्सा
(क्लिनिकल) भाषाविज्ञान उपचार के लिए भाषिक आधार प्रदान करता है, और वाक्-दोष चिकित्सा उस आधार को चिकित्सीय अभ्यास में रूपांतरित करता है।
4. चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान और
संज्ञानात्मक विज्ञान
संज्ञानात्मक विज्ञान मानव मस्तिष्क
की कार्यप्रणालियों का बहुआयामी अध्ययन करता है। इस क्षेत्र से चिकित्सा
(क्लिनिकल) भाषाविज्ञान को ‘संकल्पना निर्माण,
श्रेणीकरण और अर्थ-निर्माण’ जैसी प्रक्रियाओं
को समझने में सहायता मिलती है।
5. शिक्षा और सामाजिक विज्ञानों से संबंध
भाषा-विकारों का प्रभाव शिक्षा और
समाज पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। अतः शिक्षा, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान आदि भी चिकित्सा
(क्लिनिकल) भाषाविज्ञान के महत्वपूर्ण सहायक अनुशासन हैं।
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भाषा-मूल्यांकन एवं निदान (Language Assessment
and Diagnosis)
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान
में भाषा-मूल्यांकन और निदान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सटीक निदान के बिना न तो
प्रभावी उपचार संभव है और न ही भाषा-विकारों का वैज्ञानिक अध्ययन।
भाषा-मूल्यांकन के प्रमुख उद्देश्य इस
प्रकार हैं-
1.
भाषा-विकार की पहचान
2.
प्रभावित भाषिक स्तरों का निर्धारण
3.
विकार की गंभीरता का आकलन
4.
उपचार-योजना के लिए आधार प्रदान करना
इसके लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित मूल्यांकन
विधियों का प्रयोग होता है-
1. मानकीकृत परीक्षण (Standardized Tests)
ये परीक्षण पूर्व-निर्धारित
मापदंडों पर आधारित होते हैं और तुलनात्मक विश्लेषण में सहायक होते हैं।
2. अनौपचारिक मूल्यांकन : इसमें ‘स्वाभाविक संवाद, कथा-वाचन
और चित्र-वर्णन, जैसी विधियाँ सम्मिलित की जाती हैं।
3. केस-इतिहास (Case History) : केस-इतिहास में निम्नलिखित जानकारियाँ सम्मिलित होती हैं—
§ चिकित्सीय पृष्ठभूमि
§ विकासात्मक इतिहास
§ भाषिक और सामाजिक परिवेश