इसे संक्षेप में निम्नलिखित प्रकार से
समझ सकते हैं-
(क) प्रारंभिक चिकित्सीय और
तंत्रिकीय आधार
इसके अंतर्गत उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य
में तंत्रिका-विज्ञान में हुए मुख्य कार्य आते हैं। तत्कालीन समय में मस्तिष्क-क्षति
से ग्रस्त रोगियों के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्र
भाषा के विशिष्ट कार्यों से जुड़े होते हैं। इनमें से दो खोजें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं-
Broca's Area (ब्रोका क्षेत्र): पॉल ब्रॉका (1861) ने बाएँ अग्र-मस्तिष्क खंड के एक क्षेत्र की पहचान की, जो वाक्-उत्पादन से संबंधित है। इस क्षेत्र की क्षति से
रोगियों की भाषा अल्प-प्रवाही और श्रमसाध्य हो जाती है। इस क्षेत्र को उनके नाम पर
‘ब्रोका क्षेत्र’ (Broca’s Area) कहा जाता
है। यह मुख्य रूप से भाषा के उत्पादन (production), यानी
बोलने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है। यह मस्तिष्क के फ्रंटल लोब (frontal
lobe) के बाएं हिस्से में स्थित होता है (अधिकांश लोगों में)। इस
क्षेत्र को नुकसान होने से व्यक्ति को बोलने में कठिनाई होती है, हालांकि वह भाषा को समझ सकता है (जिसे ब्रोका अफेज़िया या एक्सप्रेसिव
अफेज़िया कहा जाता है)।
Wernicke's Area (वरनिके क्षेत्र): कार्ल वर्निके (1874) ने बाएँ टेम्पोरल लोब के एक क्षेत्र की पहचान की, जो भाषा-बोध से संबंधित है। इसकी क्षति से भाषा प्रवाही तो
रहती है, किंतु अर्थहीन हो जाती है। इस क्षेत्र को उनके नाम पर
‘वरनिके क्षेत्र’ (Wernicke’s Area) कहा
जाता है। यह मुख्य रूप से भाषा को समझने (comprehension) के
लिए जिम्मेदार है, जिसमें बोली जाने वाली और लिखित भाषा
दोनों शामिल हैं। यह मस्तिष्क के टेम्पोरल लोब (temporal lobe) के पीछे के हिस्से में स्थित होता है। इस क्षेत्र को नुकसान होने से
व्यक्ति धाराप्रवाह बोल तो सकता है, लेकिन उसकी बातों में
अर्थ या समझ की कमी होती है, और उसे दूसरों की बातें समझने
में भी परेशानी होती है (जिसे वरनिके अफेज़िया या रिसेप्टिव अफेज़िया कहा जाता
है)।
ये दोनों क्षेत्र तंत्रिका तंतुओं (nerve fibers) के एक बंडल से जुड़े होते हैं जिसे आर्कुएट
फासिकुलस (arcuate fasciculus) कहा जाता है, जो उनके बीच सूचना के प्रवाह को सुगम बनाता है।
इन खोजों ने भाषा-विकारों के
तंत्रिकीय आधार को स्थापित किया। बीसवीं शताब्दी के मध्य में जनरेटिव व्याकरण के
उदय के साथ भाषा-विकारों और व्याकरणिक क्षमता के संबंध पर नए प्रश्न उठे। चॉम्स्की
द्वारा प्रस्तुत क्षमता (competence) और प्रदर्शन (performance)
का भेद नैदानिक अनुसंधान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ,
जैसे- क्या भाषिक ज्ञान स्वयं क्षतिग्रस्त
होता है?; या उस ज्ञान तक पहुँच बाधित होती है? आदि। इन प्रश्नों ने विकासात्मक और अर्जित भाषा-विकारों की समझ को गहरा
किया। 1970 और 1980 के दशकों में चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान एक स्वतंत्र
अनुशासन के रूप में स्थापित हुआ। इस चरण में भाषाविज्ञानी और चिकित्सक सहयोग करने
लगे। वाक् और भाषा विकारों के मूल्यांकन में भाषिक विश्लेषण को स्थान मिला। न्यूरोइमेजिंग
और प्रयोगात्मक तकनीकें, तंत्रिका-विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बहुभाषिक अनुसंधान में हुई वर्तमान प्रगति के साथ
यह क्षेत्र निरंतर विकसित हो रहा है।
No comments:
Post a Comment