चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान का
उद्भव इस समझ से हुआ कि भाषा-विकारों के मूल्यांकन, निदान और उपचार में भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों की निर्णायक भूमिका हो सकती
है। यह अनुशासन भाषावैज्ञानिक मॉडलों और वर्णनात्मक उपकरणों का प्रयोग कर यह समझने
का प्रयास करता है—
§ विविध विकारों से भाषा किस प्रकार प्रभावित होती है
§ भाषा के कौन-से घटक विकृति से संबंधित हो सकते हैं
§ विभिन्न विकारों में भाषिक हानि कैसे भिन्न होती है
डेविड क्रिस्टल उन प्रारंभिक
विद्वानों में हैं जिन्होंने चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान को एक स्वतंत्र
अनुशासन के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, संगठित भाषावैज्ञानिक ढाँचे के बिना भाषा-विकारों की समुचित व्याख्या संभव
नहीं है।
चिकित्सा (क्लिनिकल) भाषाविज्ञान में
भाषाविज्ञान के अलावा कई अन्य ज्ञानाशासन भी कार्य करते हैं, जैसे- वाक् एवं भाषा रोगविज्ञान (Speech and Language
Pathology), तंत्रिका-विज्ञान,
मनोविज्ञान एवं शिक्षाशास्त्र आदि।
इसका मुख्य उद्देश्य भाषावैज्ञानिक
ज्ञान का उपयोग कर नैदानिक अभ्यास को अधिक प्रभावी बनाना है—विशेषतः मूल्यांकन, हस्तक्षेप और
पुनर्वास के क्षेत्रों में। यह अनुशासन इस तथ्य पर बल देता है कि सफल भाषा-चिकित्सा
भाषिक रूप से सूचित (linguistically informed) होनी चाहिए,
न कि केवल अंतर्ज्ञान या सामान्य संप्रेषण रणनीतियों पर आधारित।
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